छत्तीसगढ़ का ऐतिहासिक कदम
छत्तीसगढ़ सरकार के इस दावे से सहज ही सहमत हुआ जा सकता है कि उसने पूरे देश के सामने एक बेहतरीन उदाहरण पेश किया है। राज्य विधानसभा में खाद्य सुरक्षा कानून पास कराना सचमुच एक साहसी और दूरदृष्टि से भरा कदम है। इस कानून ने भोजन पाना हर व्यक्ति का अधिकार बना दिया है। इसका लाभ राज्य की लगभग 90 फीसदी आबादी को मिलेगा।
इस तरह सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) को दुरुस्त कर पहले ही सारे देश का ध्यान आकर्षित कर चुकी रमन सिंह सरकार ने अब वह वैधानिक मॉडल सामने रखा है, जिसका अनुकरण अगर अन्य राज्यों की सरकारें भी करें और उस पर ईमानदारी से अमल हो, तो देश भुखमरी व कुपोषण की समस्याओं से उबर सकता है।
छत्तीसगढ़ के कानून में कई प्रगतिशील तत्व हैं। मसलन, इसमें लाभ लक्ष्य-केंद्रित समूहों को देने के बजाय इसके दायरे को व्यापक (यूनिवर्सल) रखा गया है, राशन कार्ड घर की सबसे उम्रदराज महिला के नाम बनेगा, पीडीएस के तहत अनाज पाने की इकाई परिवार होगा, पीडीएस अनाज का गबन होने पर अधिकारियों को दंडित किया जाएगा, आंगनवाड़ी के तहत गर्भवती एवं दूध पिलाने वाली माताओं की तथा मध्याह्न भोजन के जरिए 6-14 वर्ष के छात्रों की खास देखभाल होगी और हॉस्टल में रहने वाले तमाम छात्र/छात्राएं सब्सिडी प्राप्त अनाज पाने के हकदार होंगे/होंगी।
गौरतलब है कि 2009 के आम चुनाव से पहले खाद्य सुरक्षा कानून बनाने का वादा कांग्रेस पार्टी ने किया था। प्रधानमंत्री ने लाल किले से वादा किया था कि देश के किसी भी नागरिक को भूखा नहीं रहने दिया जाएगा। लेकिन यूपीए सरकार अब तक इस मुद्दे पर असमंजस एवं अगर-मगर में फंसी हुई है। जनकल्याण बनाम वित्तीय रूढि़वाद के अंतर्विरोध का हल ढूंढऩे में वह अब तक नाकाम है।
इस बीच छत्तीसगढ़ सरकार ने यह ऐतिहासिक कानून पास करवाते हुए एलान कर दिया है कि इस पर आने वाले खर्च को वह अपने बूते उठाने को तैयार है। जाहिर है अगर खाद्य सुरक्षा कानून से कोई राजनीतिक फायदा मिलना हो, तो इसमें उसने यूपीए पर बढ़त बना ली है। जो उदाहरण केंद्र को पेश करना था, उसे छत्तीसगढ़ ने सामने रख दिया है। केंद्र अब चाहे तो इससे सीख ले सकता है।






