महज आंसू बहाना काफी नहीं

दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में जिंदगी के लिए जंग लड़ रही गैंगरेप की शिकार २३ वर्षीय युवती की सलामती के लिए सारा देश दुआ कर रहा है। यह सिर्फ कृत्य की बर्बरता नहीं थी, जिसकी वजह से लोगों का गुस्सा फूट पड़ा। बल्कि जिन आम परिस्थितियों में उसके साथ यह सब हुआ, उससे भी लोग आक्रोशित हो गए। वह अपने बॉयफ्रेंड के साथ रविवार की शाम एक मॉल में फिल्म देखने गई थी और वे दोनों रात तकरीबन साढ़े नौ बजे वापस घर जाने के लिए एक बस में सवार हुए। रंगीन शीशों वाली उस फर्जी यात्री बस में पहले से ही छह व्यक्ति मौजूद थे, जिन्होंने उसके साथ दुराचार किया, उसके बॉयफ्रेंड पर हमला किया और दोनों को घायलावस्था में बगैर कपड़ों के सड़क पर फेंककर चले गए।
उस युवती ने जिस तरह की भावना दिखाई, उसे देखते हुए इस गाथा को बर्दाश्त करना और भी मुश्किल है। वह उन अपराधियों से बहादुरीपूर्वक लड़ी, जिसकी उसने भारी कीमत चुकाई। डॉक्टरों को उसकी आंतें बाहर निकालनी पड़ीं, जिसकी वजह से वह लंबे समय तक कुछ खा या पी नहीं सकेगी। हालांकि उसकी जीने, प्यार करने और लडऩे की भावना में जरा-भी कमी नहीं आई है। होश में आने के बाद उसने अपने बॉयफ्रेंड के बारे में पूछा और वह यह भी जानना चाहती थी कि उस पर हमला करने वाले लोग पकड़े गए या नहीं। उसने अपनी मां को लिखा, '...मैं जीना चाहती हूं।Ó
यदि बाकी देशवासियों में भी उसकी तरह इच्छाशक्ति हो, तो हम राष्ट्रीय वेदना के इस पल को एक टर्निंग प्वाइंट बना सकते हैं। लेकिन यह इतना आसान भी नहीं है। जेसिका लाल के हत्यारे मनु शर्मा (हरियाणा कांग्रेस के एक प्रमुख कांग्रेसी नेता का बेटा) के खिलाफ उपजे जनाक्रोश को याद करें? या फिर रुचिका गिरहोत्रा नामक एक स्कूली छात्रा के साथ छेड़छाड़, परेशान करने और आत्महत्या के लिए उकसाने के प्रमुख आरोपी हरियाणा पुलिस के पूर्व प्रमुख एसपीएस राठौर के मामले पर गौर करें? कागजों पर तो मनु शर्मा आजीवन कारावास में था। लेकिन हकीकत में वह जब-तब पैरोल पर छूटता रहता था (एक बार तो ६० दिनों तक) और एक बार तो एक डिस्कोथेक में पार्टी मनाते हुए देखा गया। एसपीएस राठौर जेल से बाहर हैं और सीबीआई ने उनके खिलाफ तीन में से दो केसों को बंद कर दिया है। ऐसे में पीडि़ता के परिजन भी आखिरकार हताश हो गए और कहा, 'हमने सोचा था कि सिस्टम बदल चुका है। लेकिन नहीं, सिस्टम नहीं बदला है और न ही बदल सकता है।'
चूंकि मौजूदा केस से जुड़े छह आरोपियों का किसी राजनेता या वरिष्ठ नौकरशाह से जुड़ाव नजर नहीं आता, लिहाजा लगता यही है कि उन्हें सजा मिलेगी और वे जेल में ही रहेंगे। लेकिन इतना काफी नहीं है। न ही यह कहना पर्याप्त है कि 'चौकसी बढ़ाएं', 'हमारी ईमानदारी व समर्पण को प्रदर्शित करें' या 'हालात सुधारें'। सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे और दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित तक अपनी बात पहुंचाने में इसी तरह के जुमले इस्तेमाल किए।
वास्तव में हम अपने राजनेताओं और वरिष्ठ अधिकारियों से एक ऐसी कार्ययोजना की अपेक्षा करते हैं, जो एक निर्धारित समयावधि में निश्चित नतीजे दे सके। इसके बजाय हमें उनकी ओर से कोरी बयानबाजियां और रात में लोक परिवहन की बसों की संख्या में इजाफा करने से लेकर सड़कों पर गश्त बढ़ाने जैसी गतिविधियों की सूचियां ही मिल रही हैं। यह सब करना ठीक है, लेकिन इनसे क्या ऐसे नतीजे मिलेंगे जो हम चाहते हैं? आखिर हम किस तरह के नतीजे चाहते हैं?
चलिए आंकड़ों से शुरुआत करते हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक अन्य अपराधों की तुलना में दुष्कर्म के मामले में आरोप सिद्ध होने की दर हैरतनाक ढंग से काफी कम है। पिछले साल अदालत के समक्ष लाए गए रेप के महज 26.4 फीसदी मामलों में आरोपी को सजा सुनाई गई, जबकि बाकी अपराधों के 41 फीसदी मामलों में भारतीय दंड संहिता के तहत आरोपी को सजा सुनाई गई। यह विसंगति अस्वाभाविक है। मसलन यदि आप ब्रिटेन के आंकड़ों को देखें तो वहां बाकी आपराधिक मामलों और रेप के केस में दोष सिद्ध होने की दरों में कोई फर्क नहीं है। वास्तव में वहां रेप के मामलों में सजा सुनाए जाने की दर (58 फीसदी) बाकी आपराधिक मामलों में सजा की दर (57 फीसदी) से भी ज्यादा है। भारत में इस संदर्भ में गंभीर विसंगति के लिए एक ही स्पष्टीकरण हो सकता है कि कानून अनुपालन मशीनरी रेप के मामलों को अंजाम तक पहुंचाने में ज्यादा दिलचस्पी नहीं लेती, संभवत: उस विकृत सामाजिक लोकाचार की वजह से जिसमें दुष्कर्म का ज्यादातर दोष पीडि़त पर डाला जाता है।
इतना ही नहीं, इसी विकृत सामाजिक लोकाचार की वजह से रेप के दर्ज मामलों की संख्या कृत्रिम रूप से कम रहती है। यह आंकड़ों से साफ नजर आता है। भारत में पिछले साल रेप के दर्ज मामलों की संख्या 22,172 है, जो हत्या के दर्ज मामलों की संख्या 33,334 से एक तिहाई कम है। यह देखकर हैरत होती है। एक और अंतरराष्ट्रीय मिसाल लें। अमेरिका में रेप के दर्ज मामलों की संख्या हत्या के दर्ज मामलों से चार से छह गुना तक अधिक है।
ऐसे में हमारा देश केंद्रीय गृह मंत्री तथा केंद्रीय गृह सचिव से दो बातें सुनना चाहेगा। एक तो यह कि अन्य आपराधिक मामलों की तुलना में रेप के मामलों पर सजा सुनाए जाने की दरों में इतनी विसंगति क्यों है? और दूसरा यह कि क्या उसके पास ऐसी कोई कार्ययोजना है, जिससे रेप के मामलों में साल-दर-साल कमी आए और आखिरकार (मान लें कि पांच साल) इस समस्या को पूरी तरह खत्म किया जा सके। उम्मीद है कि इससे रेप के उन मामलों में भी कमी आएगी, जिनकी रिपोर्ट दर्ज नहीं हो पाती। हम इस पर चर्चा करें कि सुझाए गए उपायों से क्या वांछित नतीजे प्राप्त होंगे और यदि ऐसा नहीं होता तो किसे जिम्मेदार ठहराया जाए। हम आंसू बहाना बंद करें और आंकड़ों, समयसीमा और जवाबदेही के बारे में चर्चा करें।








