विशेष संपादकीय: जस्टिस ए.के. गांगुली के लिए गुरुवार का दिन भले ही कोर्ट में आखिरी दिन रहा मगर उनका यह फैसला ऐतिहासिक बन गया है। इससे ना सिर्फ कॉरपोरेट कानून प्रभावित होगा बल्कि लंबे समय में इसका असर सरकार की नीति और कॉरपोरेट के कामकाज पर भी होगा। यह सर्वविदित है कि सरकारी ठेके और लाइसेंस देने में भ्रष्ट तरीके अपनाए जाते हैं, कानून तोड़े जाते हैं, पक्षपात होता है और आमतौर पर जो कंपनी ज्यादा ‘देती’ है उसे ज्यादा ‘मिलता’ है।
गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने 122 टेलीकॉम लाइसेंस इसलिए रद्द कर दिए क्योंकि इन्हें जारी करते समय नीतियों का ठीक पालन नहीं हुआ और भ्रष्ट मंत्री ने रिश्वत लेकर लाइसेंस बांटे। पहली बार सुप्रीम कोर्ट ने किसी नीति और उसकी खामियों पर सीधी टिप्पणी की है। कोर्ट ने ‘पहले आओ-पहले पाओ’ नीति को गलत और घातक करार दिया है।
रद्द होने वाले लाइसेंस को लेकर बहुत लोगों को चिंता है, और इसके दूरगामी प्रभाव भी होंगे। अगर लाइसेंस आवंटन में नीति का सही तरीके से पालन नहीं होता है तो भविष्य में यह फैसला लाइसेंस रद्द करने का आधार बन सकता है। आने वाले वर्षो में अनेक मामलों में इस फैसले को उद्धृत किया जाएगा।
कानून की थोड़ी जानकारी रखने वाला भी यह समझ सकता है कि भविष्य में बड़े कॉन्ट्रैक्ट रद्द हो सकते हैं। खासकर अगर नीति का सही-सही पालन नहीं हुआ हो तो। फ्रॉड के आधार पर लाइसेंस रद्द करने के कई फैसले हुए हैं। एक बहुचर्चित फैसला ईस्ट इंडिया कॉटन एसोसिएशन बनाम सीसीई केस में 5 नवंबर 1997 को आया था। लेकिन नीति का अनुपालन नहीं होने के कारण लाइसेंस रद्द हुआ हो, ऐसे फैसले ना के बराबर हैं।
इससे कॉरपोरेट जगत पर नीति के पालन में अतिरिक्त सतर्कता बरतने का दबाव बढ़ेगा। घरेलू और बहुराष्ट्रीय कंपनियां सरकार से कॉन्ट्रैक्ट हासिल करने में ज्यादा सावधानी बरतेंगी क्योंकि अब उन्हें कानून का डर रहेगा। कानून का डर होना अच्छी बात है। यह उद्यमियों को शॉर्टकट अपनाने से रोकता है। यह स्वान टेलीकॉम जैसी कंपनियों को सिर्फ लाइसेंस खरीद और बेचकर मुनाफा कमाने से रोकेगा। इस कंपनी ने 1,537 करोड़ रुपये में लाइसेंस खरीदा और एतिसालात को 4,500 करोड़ में हिस्सेदारी बेच दी।
यह फैसला राजनीतिज्ञों को भी नीतियों के गलत इस्तेमाल या उनकी गलत व्याख्या करने से रोकेगा। नीति पर अमल हो, इस पर अब नेताओं से ज्यादा कॉपरेरेट्स को चिंता होगी। दूरसंचार मंत्री के पद पर रहते हुए ए. राजा ने कंपनियों को आशय पत्र जमा करने के लिए सिर्फ 45 मिनट का समय दिया। यही नहीं, 1600 करोड़ रुपये की बैंक गारंटी के लिए भी उन्हें कुछ घंटे का ही वक्त मिला।
कुछ विश्लेषकों की शिकायत है कि यह फैसला विदेशी निवेशकों के सेंटिमेंट पर नकारात्मक असर डालेगा। लेकिन ऐसा कहने वाले लोग विदेशी निवेशकों को नहीं समझते। जब फैसला आया तब विदेशी निवेशक शेयर बाजार में खरीदारी कर रहे थे। विदेशी कंपनियां अब भारत में लाइसेंस ‘खरीदने’ में अधिक सावधानी भरा रुख अपनाएंगी, खासकर पिछले दरवाजे से।
अपने भारतीय साझीदार के साथ अब वे ज्यादा छानबीन करेंगी। यह फैसला साबित करता है कि भारत में कानून का शासन चलता है। एतिसालात जैसी सरकारी नियंत्रण वाली कंपनियों को भी भारत में निवेश करते वक्त सावधान रहना होगा। इससे पॉलिसी बनाने में पारदर्शिता अपनाने में भी मदद मिलेगी क्योंकि नौकरशाह नेताओं को नीति का उल्लंघन करने की इजाजत नहीं देंगे।
इससे टेलीकॉम सेक्टर को भी फायदा होगा। कुछ कमजोर ऑपरेटर बाहर हो जाएंगे और बाजार में सिर्फ गंभीर और वितीय रूप से मजबूत ऑपरेटर ही बने रहेंगे। सुप्रीम कोर्ट का फैसला यह साबित करता है कि सिर्फ सरकार को नहीं बल्कि कॉपरेरेट्स को भी सरकारी नीति का पालन सुनिश्चित करना होगा, क्योंकि इसका अगर पालन नहीं हुआ तो उसका असर अब कंपनियों पर पड़ सकता है।