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भीतर की आस्तिकता को जीवित रखें

पं. विजयशंकर मेहता | Dec 28, 2012, 00:10AM IST
 
 

मनुष्य के मन में निराशा और चिंताजनक लहरें उठना स्वाभाविक हैं। व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक, राष्ट्रीय अव्यवस्था के दृश्य कभी-कभी हताश कर जाते हैं। क्या होगा भविष्य में? क्या ऐसे ही चलता रहेगा? जैसे प्रश्न अच्छे-अच्छों को बीमार बना देते हैं। इस तरह का लगातार चिंतन मनुष्य को या तो तटस्थ बना देता है, निष्ठुर कर देता है या फिर वह गलत करने पर मजबूर हो जाता है; अनुचित में अनचाही भागीदारी के लिए। ऐसे समय आस्तिकता बहुत काम आती है। आस्तिक होने का अर्थ है अपने अतिरिक्त कोई परमशक्ति है, उस पर भरोसा करना। सृजन का देवता और उसकी शक्तियां निष्क्रिय नहीं हैं। उसने मरने वालों से ज्यादा संख्या जन्म लेने वालों की बना रखी है। इंसानियत जब करवट लेती है तो देवमानव संसार में आते हैं। उनका देव प्रवाह इस वातावरण को फिर शुरू करेगा। आवेश की ऋतु एक ऐसी भी आएगी, जब सत्य सम्मान के साथ सर्वस्वीकृत होगा। अपने भीतर की आस्तिकता को जीवित रखें और योग्य गुरु का सान्निध्य खोज लें। निराश वातावरण में आशा की किरण जिस विचार से आती है, उसके पांच चरण होते हैं। पहले चरण में हम आंतरिक चित्त में विचार शुरू करते हैं। दूसरे में वह धुंधला-सा हमें दिखता है। तीसरे में हम उसी विचार को भीतर बोलने लगते हैं। चौथे चरण में भीतर बोला जा रहा बाहर प्रकट हो जाता है। पांचवां चरण होता है जो बोल दिया गया है, उसकी प्रतिक्रिया को सुना जाना। आस्तिकता से भरे लोगों के पहले चरण में ही यदि गुरु जीवन में है तो वह वहीं से विचार को पकड़ लेता है और पांचवें चरण पर असर दिखा देता है। इसलिए हम आशान्वित रहें कि भविष्य में शुभ जरूर आएगा।
 

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