विज्ञापन
 
 
 
 

वंचित और वर्चस्वशाली का भेद

 
Source: हर्ष मंदर   |   Last Updated 01:44(28/10/11)
 
 
 
 
जलते घरों की आंच ठंडी होने और सड़कों पर बहते रक्त के सूख जाने के काफी समय बाद भी जख्म भरते नहीं हैं, क्योंकि पीड़ितों को अपना शेष जीवन उस खौफ के साये में बिताना पड़ता है, जो उनके जेहन में पैठ चुका है। हमने इस तरह के दृश्य कई बार देखे हैं, जब किन्हीं लोगों पर महज उनकी जातीय या भाषिक पहचान के आधार पर हमला बोल दिया गया हो।

इस तरह की नृशंस वारदातों का एक पहलू यह भी है कि हमारे हुक्मरान भी नागरिकों को समानतापूर्ण संरक्षण प्रदान करने का अपना संवैधानिक दायित्व भुला बैठते हैं। ऐसा इसलिए नहीं होता कि उनके पास जनादेश की शक्ति नहीं है, बल्कि इसलिए होता है क्योंकि वे उन पूर्वग्रहों और पक्षपातपूर्ण दृष्टियों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो समाज और सत्तातंत्र में हर जगह व्याप्त नजर आती हैं।

एक जिला अधिकारी के रूप में मैंने अक्सर दंगों और सांप्रदायिक वैमनस्य की घटनाओं का सामना किया है और मैंने पाया है कि यदि राज्यसत्ता सक्रियतापूर्वक और सतर्कतापूर्वक कार्रवाई करे तो सांप्रदायिक तनाव की स्थिति कभी भी चंद घंटों से अधिक समय तक नहीं बनी रह सकती। लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा नरसंहार की स्थिति को नियंत्रित न कर पाने के नैतिक अपराध को वस्तुत: अपराध ही नहीं माना जाता। जांच आयोगों द्वारा दोषी ठहराने के बावजूद उन्हें यदा-कदा ही दंडित किया जाता है।

उल्टे इस तरह के अधिकारी और पुलिसकर्मी शान का जीवन बिताते हैं क्योंकि उन्हीं के कारण घृणा की चुनावी फसल काटने वाले सत्ताधीश अपना अस्तित्व बनाए रख पाते हैं।

दंडमुक्ति की इसी संस्कृति का लाभ वे असामाजिक तत्व भी उठाते हैं, जो वैमनस्य की स्थिति का फायदा उठाते हुए हत्या, लूटखसोट और दुराचार की घटनाओं में शरीक होते हैं। राज्यसत्ता और प्रशासनिक तंत्र की निष्क्रियता में उनके लिए भी यह संदेश निहित है कि वे खुलेआम कोई जुर्म कर सकते हैं, जिसके लिए उन्हें कभी दंडित नहीं किया जाएगा। हमारे पुलिस और न्याय तंत्र में जरूरी सुधार लंबे समय से अपेक्षित हैं और जब तक ऐसा नहीं होगा, तब तक इस तरह की प्रवृत्तियां पोषित होती रहेंगी।

जाहिर है, इन प्रवृत्तियों के पीछे यह सोच काम करती है कि यदि ‘शांतिकाल’ में कोई व्यक्ति किसी की हत्या कर देता है और इस वारदात का कोई गवाह नहीं है, तब भी इस बात की पूरी संभावना रहती है कि उस व्यक्ति को सजा मिलेगी। लेकिन अगर वह सांप्रदायिक दंगों के दौरान दिनदहाड़े सैकड़ों लोगों की नजर के सामने दस लोगों को मौत के घाट उतार देता है तो उसके दंडित होने की संभावना कम ही है।

इस तरह की टारगेटेड हिंसा के अनेक पहलुओं और घटनाओं का जायजा लेने के बाद हमने पाया है कि वारदातों के स्वरूप और देशकाल में चाहे जितना अंतर हो, लेकिन न्याय प्रक्रिया को ताक पर रखकर वारदात को अंजाम देने की पद्धति लगभग समान है। दोषियों को बचाने की प्रक्रिया हिंसा के फौरन बाद ही प्रारंभ हो जाती है। सक्रियता दिखाने के नाम पर वंचित वर्गो के लोगों को ही गिरफ्तार किया जाता है।

पुलिस हत्यारों और लुटेरों के नाम दर्ज नहीं करती और भीड़ का हवाला देती है, जिसका कोई नाम और पहचान नहीं होती। पीड़ितों द्वारा आग्रह करने पर उल्टे उन पर ‘क्रॉस केस’ दर्ज कर लिए जाते हैं। प्रभावशाली समूहों के लोग गिरफ्तार होते भी हैं तो उन्हें जल्द ही जमानत मिल जाती है, जबकि ‘क्रॉस केस’ में पकड़े गए वंचित समुदाय के लोग कभी-कभी सालों तक जेल से बाहर नहीं निकल पाते।

एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में वर्चस्वशालियों और वंचितों के लिए न्याय के अलग-अलग मानदंड होना चिंतनीय है। यही वह प्रवृत्ति है, जो अदालत के बाहर होने वाले ‘समझौतों’ को जन्म देती है। इसका यह अर्थ होता है कि पीड़ित ‘हॉस्टाइल’ या ‘प्रतिगामी’ हो जाए यानी अपने द्वारा लगाए गए आरोपों से मुकर जाए, जिसका फायदा आरोपी को मिलता है। अगर ‘समझौतों’ से बात न बने तो पीड़ित को केस वापस लेने के लिए डराया-धमकाया जाता है। ऐसी स्थिति में पुलिस की भूमिका सवालों के दायरे में रहती है। कई केस तो ट्रायल से पूर्व ही ठंडे बस्ते में डाल दिए जाते हैं।

यह बात सच है कि टारगेटेड हिंसा पर लगाम कसने के लिए राज्य अधिकारियों को अधिक अधिकार प्रदान करने के लिए नए कानूनों की जरूरत नहीं है, किंतु विडंबना तो यही है कि वैधानिक ग्रंथों में उल्लेखित अपराधों के लिए मौजूदा कानूनों के बावजूद हालात जस के तस हैं। राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एनएसी) के सांप्रदायिक और लक्ष्यित हिंसा विधेयक में कुछ नए अपराधों को चिह्न्ति और परिभाषित किया गया है, किंतु उन्हें भारतीय दंड संहिता के तहत भी दर्ज किया जा सकता है।

खैर, भविष्य में टारगेटेड हिंसा की घटनाओं पर रोक लगाने के लिए ऐसे कानून की दरकार है, जो इस तरह की किसी घटना में संबंधित अधिकारी की पक्षधरता को प्रश्नांकित करे। एनएसी के मसौदा विधेयक में अधिकारियों के उत्तरदायित्व का यह बिंदु ही केंद्रीय महत्व का है। उम्मीद की जा सकती है कि यदि इस तरह का कानून अस्तित्व में आता है तो सामूहिक हिंसा की वारदातों पर किंचित अंकुश लग सकता है।

मैंने देश के कई हिस्सों में जाकर दंगा पीड़ितों के परिवार से बात की है और यह पाया है कि वे न्याय प्रक्रिया की विसंगतियों से सबसे ज्यादा आहत हैं। वे कहते हैं : ‘माफ कर देना तो दूर की बात है, हम उस घटना को भूल भी कैसे सकते हैं, जब हम रोज देखते हैं कि हमारी बेटियों के साथ ज्यादती करने वाले और हमारे बेटों का कत्ल कर देने वाले लोग खुली हवा में सांस ले रहे हैं और मजे से आजाद घूम रहे हैं। ऐसे में हम कैसे मान लें कि हम भी वर्चस्वशालियों की ही तरह इस देश के सामान्य नागरिक हैं?’

(लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं।)


(लेखक राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के सदस्य हैं।)
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
आपके विचार

 
 
कोड :
9 + 7

 
 
विज्ञापन
 

बड़ी खबरें

 
 
 
 
 
 
 
 
 

रोचक खबरें

 
 
 
 
 
 
 
 
 

बॉलीवुड

 
 
 
 
 
 
 
 
 

जीवन मंत्र

 
 
 
 
 
 
 
 
 

क्रिकेट

 
 
 
 
 
 
 
 
 

बिज़नेस

 
 
 
 
 
 
 
 
 

जोक्स

 
 
 
 
 
 
 
 
 

पसंदीदा खबरें

 
 
 
 
 
 
 
 
 

फोटोगैलरी

Most Viewed

Controversies that rocked B-town
Amazing Body Paintings
Just Added

करियर कॉलेज में फेयरवेल पार्टी के दौरान स्टूडेंट्स ने बिखेरे रंग
Bollywood Stars at Cannes
 
 
 
विज्ञापन
 
 
| Email  Print Comment
| Email  Print Comment
(2)
Latest | Popular