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बड़े काम की चीज है हमारी यह नाक

भगवान उपाध्याय | Jul 21, 2012, 02:00AM IST
 
 

नाक को आप तारीफ की हकदार कहेंगे या तमाम विवादों की कसूरवार? दरअसल, यह सवाल इसलिए पूछ रहा हूं क्योंकि दोनों ही मसलों से आए दिन हम सभी दो-चार होते रहते हैं। नाक को दूसरे अर्थो में आदमी की इज्जत और अकड़ से भी जोड़कर देखा जाता है। ऊंची नाक वाला यानी अकड़ रखने वाला। और नाक कटना, यानी इज्जत चली जाना।

नाक में दम करना, नाक का सवाल, नाक का बाल और नाक-भौं सिकोड़ना जैसे मुहावरों और शब्दों के कारण नाक अक्सर चर्चा में रहती है। नाक हमारे चेहरे की खूबसूरती में चार चांद लगाती है। कल्पना कीजिए कि हमारे चेहरे पर नाक नहीं होती तो चेहरा कैसा लगता। नाक की महिमा का बखान प्रख्यात व्यंगकार हरिशंकर परसाई ने भी किया है। अपने व्यंग्य ‘दो नाक वाले लोग’ में वे कहते हैं कि कुछ बड़े आदमी जिनकी हैसियत है, इस्पात की नाक लगवा लेते हैं और चमड़े का रंग चढ़वा लेते हैं।

वैसे तो नाक हमारे शरीर में पाया जाने वाला एक अंग है। इससे हम सांस लेने और छोड़ने का काम करते हैं। लेकिन बाद में इससे हैसियत नापने का काम भी होने लगा है। चलिए, अब नाक की उन खूबियों पर बात करते हैं, जिनके कारण वह तारीफ की हकदार है। नाक के कारण ही हम सुगंध और बदबू का अंतर समझ पाते हैं। हमारी नाक ही हमें बताती है कि पड़ोसी के घर क्या पक रहा है? अपने घर के किचन की सुगंध हमें उतनी नहीं आती है, जितनी पड़ोसी के घर की। पड़ोसी के घर की तरफ से आती हवा हमें बता देती है कि आज वहां बासमती चावल पका है। यदि उनके घर में तुअर की दाल में देसी घी का तड़का लगा है तो एक बार आंख बंद करके लंबी सांस लेने का मन जरूर करता है। इस दाल में हींग का इस्तेमाल होने पर महक बढ़ जाती है।

मुझे तो बचपन में नानी द्वारा सुखाकर रखी गई मैथी की भाजी की सुगंध बहुत भाती थी। यह भाजी दाल में मिलाने पर पूरा घर मैथी की सुगंध से महक उठता था। सूंघकर ही पता चल जाता था कि बाबूजी आज बाजार से आम लाए हैं। सुगंध के सहारे ही हमारी नाक हमें आम की डलिया तक पहुंचा देती थी।

यह नाक का ही प्रताप है कि धनिया, मिर्च, हल्दी और अन्य मसालों के तीखेपन का हम अनुमान लगा सकते हैं। अजवाइन को आप कितना ही छुपाकर रखें, जरा-सी हवा मिलने पर नाक के माध्यम से आपको इसका पता चल जाएगा। जच्च वाले घर में अजवाइन के लड्डू बनने पर पड़ोसी भी लंबी सांस लेने से नहीं चूकते। फ्राई हो रहे आमलेट और मटन की महक को सूंघकर इन्हें नहीं खाने वाले लोग भी इनके बनने का अनुमान लगा लेते हैं।

बरसात आने की सूचना भी माटी की सौंधी महक ही देती है। कल्पना कीजिए कि नाक नहीं होती तो फूलों की सुगंध का क्या होता? क्या परफ्यूम और डियो के विज्ञापन बनते? क्या खुशबू वाले साबुनों के इतने अच्छे विज्ञापन दिखाई देते? रूम फ्रेशनर, रूम स्प्रे की खोज हो पाती? करोड़ों रुपयों के खुशबू के कारोबार का क्या होता? आपको पता होगा कि नाक के कारण राम-रावण युद्ध हुआ था। यदि लक्ष्मण सूर्पणखा की नाक नहीं काटते तो रावण सीता अपहरण नहीं करता। सीता का अपहरण नहीं होता तो न तो लक्ष्मण को शक्तिबाण लगता, न हनुमान को संजीवनी बूटी लानी पड़ती और न ही रावण का इस तरह अंत होता। नाक को समर्पित इन पंक्तियों पर गौर करें-

मानुष नाक राखिए, नाक है तो कद ऊंचा। नाक कटी तो इज्जत जाए और कहलाए बूचा ।।
 
 
 

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