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सांपों की समझें अहमियत
खुशवंत सिंह
| Jul 21, 2012, 02:00AM IST

इसी तरह एक बार एक अजगर धरमपुर और कसौली के रास्ते में मेरी गाड़ी के नीचे आकर इस दुनिया से कूच कर गया। यह तो हुई अपने देश की बात, लेकिन विदेशों में भी मेरे साथ ऐसे कई हादसे हुए हैं। एक बार मैं इंग्लैंड में वेल्विन गार्डन सिटी (हर्टपोर्डशायर) स्थित अपने होस्टल से साइकिल पर सवार होकर डेलकॉट टेनिस क्लब की ओर जा रहा था, तभी एक एड्डर सांप मेरी साइकिल के नीचे आ गया। उत्तरी इटली में भी इसी तरह एक बार एक बड़ा-सा सांप मेरे हाथों कुचलकर मर गया। दिल्ली और कसौली में तो शाम को सैर करते वक्त कई बार मेरा सांपों से आमना-सामना हुआ है।
वैसे कई बार मैंने इन्हें बचाया भी है। एक बार कुछ लड़के हाथों में लाठियां व पत्थर लेकर सांप को मारने के लिए उसके पीछे भाग रहे थे। मैंने उन्हें रोका और हमारे प्राकृतिक संतुलन को बरकरार रखने में सांपों की अहम भूमिका के बारे में उन्हें लंबा-चौड़ा लेक्चर सुना दिया। यदि तमाम सांपों को मार दिया जाए तो दुनियाभर में चूहों के अलावा ऐसे कीड़े-मकोड़ों की भरमार हो जाएगी, जिनका ये सांप भक्षण करते हैं। हाल ही में एक पत्रिका में मैंने रोमुलस विटेकर का एक खूबसूरत लेख पढ़ा था, जो मद्रास जू में एक सर्प उद्यान चलाने के अलावा बंगाल की खाड़ी के तटीय इलाके में एक सर्प व घड़ियाल उद्यान भी चलाते हैं। उनके लेख को पढ़ने के बाद लगा कि मुझे भी सांपों के बचाव के बारे में कुछ लिखना चाहिए।
हमारे देश में सर्प की तकरीबन 300 प्रजातियां पाई जाती हैं। इनमें से सिर्फ चार तरह के सांप जहरीले होते हैं - कोबरा, करैत, वाइपर और रसैल वाइपर। हमारे यहां हर साल तकरीबन ४५,000 लोग सांपों के काटने की वजह से काल के गाल में समा जाते हैं। यदि हम ग्रामीण डिस्पेंसरियों में सर्पदंश का सीरम आसानी-से उपलब्ध करा सकें, तो मौतों का यह आंकड़ा काफी हद तक कम हो सकता है। सांप के काटने के फौरन बाद व्यक्ति के शरीर में इस सीरम को इंजेक्ट करना जरूरी होता है। इसमें जरा-सी भी देर व्यक्ति की जान ले सकती है।
इस बात को हमेशा ध्यान में रखें कि सांप कभी पहले से इंसानों पर हमला नहीं करते। वे सिर्फ आत्मरक्षा के लिए ऐसा करते हैं, जब इंसानों द्वारा उन पर हमला किया जाता है। आप उन्हें सम्मान दें, वे आपको सम्मान देंगे। हमारे प्राचीन लोग ऐसा करते भी थे। वे इन्हें ‘नाग देवता’ मानते हुए इनकी पूजा करते थे।
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कवि संपादक :
मेरे पास आने वाली मासिक पत्रिकाओं में ‘पोएट्स इंटरनेशनल’ भी शामिल है, जिसके संपादक बेंगलुरु के मोहम्मद फखरुद्दीन हैं। इस पत्रिका में दुनियाभर से इतने सारे कवियों द्वारा अपनी रचनाएं प्रकाशन के लिए भेजी जाती हैं कि विश्वास नहीं होता कि संपादक इतनी रचनाओं का संयोजन कैसे करते हैं। जेन परंपरा की हायकू कविता शैली बड़ी चर्चित है और ‘पोएट्स इंटरनेशनल’ में अनेक हायकू कविताएं प्रकाशित होती हैं, लेकिन मैं अभी तक इस कविता शैली को समझ नहीं पाया हूं। हालांकि पत्रिका के जून 2012 के अंक में खुद संपादक की एक कविता प्रकाशित हुई है, जो बहुत रोचक होने के साथ ही मार्मिक भी है।
कविता इस प्रकार है :
अंधेरी रात में घने जंगल में धंसे
शहर की रोशनी से दूर खुले आकाश के तले
मैंने पाया अपने को एकाकी।
मैं कुछ भी वहन नहीं कर सकता था
सिवाय उस तनाव के जो हावी था मेरे जेहन पर।
अंधेरा मुझे डरा रहा था लेकिन
मेरे भीतर के साहस ने मेरे विचारों को किया पोषित।
असहाय हो जाना भी हमें बनाता है मजबूत।
सहसा मैंने सुनी किसी इंजिन की घरघराहट
उस आवाज का पीछा करते हुए
मैंने खोज निकाली एक पगडंडी।
मैंने पाया एक पुरानी जर्जर बस
राहगीरों की तक रही है राह।
मेरी खुशी का न था कोई ओर-छोर।
बस की खिड़की के भीतर से
एक हाथ बढ़ा मेरी ओर।
जिसे थाम मैं चला आया भीतर और
एक व्यक्ति के पीछे जाकर
संभालने लगा अपनी सीट।
मैं तनिक लड़खड़ाया तो उसने भी बढ़ाया मदद का हाथ,
जैसे सुबह बढ़ती है दिन की अनिश्चितताओं की ओर।
मैंने महसूस किया : ऐसी अतल खोहें हैं, जिनमें हम गुम जाते हैं
और कुछ हाथ ऐसे हैं, जो हमेशा बुला लेते हैं हमें वापस।
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नजर का फेर :
महिला (गुस्से-से)- आपने मेरे पति का यह कैसा इलाज किया है? आपसे इलाज करवाने के बाद वह मेरी ओर देखते भी नहीं।’
डॉक्टर : नाराज न हों मोहतरमा। मैंने तो सिर्फ उनकी आंखों की रोशनी ठीक की है।
(सौजन्य : विपिन बख्शी, दिल्ली)
लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं।






