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एक पुनर्जागरण की दरकार

 
Source: जगमोहन   |   Last Updated 00:21(24/01/12)
 
 
 
 
चाहे जो कारण रहे हों, तथ्य तो यही है कि संसद लोकपाल और लोकायुक्त विधेयक २क्११ को पारित करने में नाकाम रही है। अब लंबे समय तक दोषारोपणों का सिलसिला चलता रहेगा, लेकिन हममें से कितने लोग इस बारे में विचार कर रहे हैं कि भ्रष्टाचार के दैत्य को मात्र कानून बना देने और संस्थाएं खड़ी कर देने से परास्त नहीं किया जा सकता? वास्तव में यह मौजूदा संस्कृति की कृत्रिमता का ही तकाजा है कि हम लक्षणों के बारे में तो खूब बहस करते हैं, लेकिन मूल कारणों को नजरअंदाज कर देते हैं। न ही हम किसी तरह की दृष्टि या इतिहास बोध का परिचय देते हैं।

हम यह भुला देते हैं कि वर्ष 1991 के आर्थिक सुधारों सहित आजादी के बाद से अब तक 600 से अधिक सुधार आयोग और समितियां गठित हुई हैं। इन सभी आयोगों और समितियों का गठन प्रशासनिक तंत्र में गुणात्मक परिवर्तन लाने के लिए किया गया था। वर्ष 1964 में केंद्रीय सतर्कता आयोग गठित किया गया और हर मंत्रालय में एक सतर्कता अधिकारी की नियुक्ति की गई।

भ्रष्टाचार रोधी कानूनों में संशोधन किया गया। लोकसेवक की परिभाषा को व्यापक अर्थ दिए गए। काले धन और ‘हवाला’ लेन-देन पर रोक लगाने के लिए आयकर, एक्साइज और कस्टम कानूनों में महत्वपूर्ण सुधार किए गए और विभिन्न वित्तीय नियामक लागू किए गए। लेकिन इन तमाम कवायदों का नतीजा क्या रहा?

वर्ष 1949 के जीप स्कैंडल से लेकर अब तक घोटालों और घपलों की बाढ़ आ चुकी है और अब तो लगता है मानो सारे तटबंध तोड़े जा चुके हों। २जी स्पेक्ट्रम जैसे अभूतपूर्व घोटाले के कारण सरकार को एक लाख ७क् हजार करोड़ रुपयों का नुकसान हुआ। कॉमनवेल्थ खेलों के आयोजन का उद्देश्य दुनिया के सामने देश की चमकीली छवि पेश करना था, लेकिन इन खेलों ने हमारे दामन पर दाग लगा दिया। इस दाग के लिए भी हमें 18 हजार करोड़ रुपए खर्च करने पड़े। बेल्लारी में अवैध उत्खनन ने जहां पर्यावरण को अपूरणीय क्षति पहुंचाई, वहीं राजस्व को भी खासा नुकसान हुआ। ग्लोबल फाइनेंस इंटेग्रिटी की हाल ही की एक रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि भारत का 1.4 लाख करोड़ डॉलर धन विदेशी बैंकों में जमा है।


वर्ष 1955 में जहां काला धन देश के सकल घरेलू उत्पाद का 4.5 फीसदी था, वहीं अब वह ताजा अध्ययनों के अनुसार 50 फीसदी तक पहुंच चुका है। ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल ने अनुमान लगाया था कि भारत में काले धन की मात्रा पूरी दुनिया से भी अधिक है। यहां तक कि लोकसेवा आयोग जैसे वैधानिक संस्थान भी भ्रष्टाचार से अछूते नहीं रह गए हैं।

सेना के एक वरिष्ठ मेजर जनरल का हाल ही में इसलिए कोर्ट मार्शल कर दिया गया था, क्योंकि उन्हें लद्दाख के सियाचिन ग्लेशियर में सैन्य टुकड़ियों को खराब गुणवत्ता का भोजन मुहैया करने का दोषी पाया गया था। मीडिया को स्वच्छता और पारदर्शिता का संरक्षक माना जाता है, लेकिन उसके लिए भी अब ‘पेड न्यूज’ की संस्कृति के तहत न्यस्त स्वार्थो को संरक्षण देना आम हो गया है।

उल्लेखनीय है कि भ्रष्टाचार के इन तमाम मामलों में समाज के लगभग हर महत्वपूर्ण वर्ग के लोग लिप्त रहे हैं, फिर चाहे वे मंत्री या सांसद हों, वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी हों, कॉपरेरेट घरानों के चीफ एक्जीक्यूटिव हों, सैन्य अधिकारी हों या मीडियाकर्मी हों। इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि उनके राजनीतिक आग्रह क्या हैं, विचारधाराएं क्या हैं, वे किस पेशे में हैं या वे किसी स्वायत्त संस्थान से संबद्ध हैं या किसी स्वतंत्र नियामक प्राधिकरण से।

ऐसे में सवाल उठते हैं कि आखिर ऐसा कैसे संभव हो सकता है कि सामाजिक ढांचे का हर अवयव और शासकीय तंत्र का हर घटक एक ही व्याधि से ग्रस्त हो? इन सभी व्याधियों की उत्पत्ति का सामान्य कारण क्या है? और समय-समय पर किए गए उपचारों के बावजूद यह व्याधि बढ़ती ही क्यों चली जा रही है?


मेरा मत यह है कि इन तीनों प्रश्नों का एक ही उत्तर है और वह यह हम एक स्वस्थ परिवेश का निर्माण कर पाने में नाकाम रहे हैं। इसका हमारे मूल्यों और विचारों पर भी असर पड़ा है। राजनीतिक-प्रशासनिक तंत्र से मेरा खासा पाला पड़ा है और मैंने सार्वजनिक क्षेत्र में लंबे समय तक काम किया है, लेकिन मेरे तमाम अनुभवों का निचोड़ यही रहा है कि जब तक भारतीय मानस को परिष्कृत नहीं किया जाता, तब तक प्रशासनिक, आर्थिक या संवैधानिक सुधारों से ज्यादा कुछ अर्जित नहीं किया जा सकता। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद पिछले 65 सालों का हमारा अनुभव भी इस धारणा का समर्थन करता है।


दूषित मानस और अक्षम चेतना के साथ, सामाजिक-सांस्कृतिक अवमूल्यन के परिवेश में एक स्वच्छ प्रशासनिक तंत्र का निर्माण नहीं किया जा सकता। सख्त कानूनों की दरकार है। सुगठित और प्रभावी संस्थान जरूरी हैं। कानून लागू करने वाले और संस्थानों को संचालित करने वाले व्यक्ति विवेकशील, मेधावी और सुप्रशिक्षित होने चाहिए। निवारण के समूचे तंत्र को परिपुष्ट करना आवश्यक है। लेकिन यदि हम नकारात्मक मूल्यों से इसी तरह घिरे रहे तो ये तमाम प्रबंध भी कारगर साबित न होंगे।

इतिहास गवाह है कि लोगों के मन-विचार में आमूलचूल बदलाव आने पर ही कोई सभ्यता खुद को एक महत्वपूर्ण मोड़ के लिए तैयार कर पाई है। यूरोप अगर मध्यकाल से आधुनिकता तक का लंबा सफर तय कर पाया है तो उसके पीछे पुनर्जागरण काल के उदात्त मूल्य थे। पुनर्जागरण की चेतना से ही विज्ञान जन्मा, अन्वेषण की प्रवृत्ति को पोषण मिला और प्रगतिशील विचारों ने बल पाया। रूढ़ियां परास्त हुईं।

समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के आदर्श फ्रांसीसी क्रांति का आधार बन गए। थॉमस पेन, रूसो, वोल्तेयर के लेखन ने बौद्धिक-सांस्कृतिक परिवेश का निर्माण किया। आंतरिक परिवर्तनों की श्रंखला से ही सामाजिक और व्यवस्थागत परिवर्तनों का पथ प्रशस्त हुआ।

१९४७ के बाद हमें भी इसी तरह के मूल्य आधारित परिवर्तनों की जरूरत थी। यह हमारी सबसे बुनियादी जरूरत थी, लेकिन सबसे अधिक उपेक्षा भी इसी की हुई। हमारे नेताओं को समझना था कि उदात्त मूल्यों के संरक्षण के बिना संविधान द्वारा सृजित संस्थाएं एक पारदर्शी तंत्र का निर्माण नहीं कर सकतीं, लेकिन वे यह समझ पाने में नाकाम रहे। -लेखक जम्मू और कश्मीर के पूर्व राज्यपाल हैं।
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
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