मतभेदों के बावजूद मजबूत रिश्ता
Bhaskar News
| Dec 26, 2012, 00:17AM IST
व्लादिमीर पुतिन को भारत-रूस संबंधों को पटरी पर लाने का श्रेय है। सोवियत संघ के विखंडन के साथ दोनों देशों की पुरानी दोस्ती लड़खड़ा गई थी। राष्ट्रपति बनने के बाद पुतिन ने पुरानी गर्मजोशी एक हद तक बहाल की।
इस संदर्भ में उनकी साल 2000 की भारत यात्रा को ऐतिहासिक माना जाता है। उसी के बाद दोनों देशों के बीच सालाना शिखर बैठक की परंपरा शुरू हुई, जिसकी 12वीं कड़ी पुतिन की ताजा भारत यात्रा के साथ जुड़ी है। बहरहाल, पुतिन के दौर में भारत-रूस संबंध सहयोगात्मक तो रहे हैं, लेकिन ये उस गति से नहीं फले-फूले हैं, जिसकी सद्भावपूर्ण रिश्तों वाले दो बड़े देशों के बीच अपेक्षा रहती है।
गौरतलब है कि आज भी दोनों के बीच सालाना व्यापार तकरीबन 11 अरब डॉलर का ही है, जबकि भारत और चीन का आपसी कारोबार 60 अरब डॉलर की सीमा पार कर चुका है। इस बीच भारत-रूस संबंधों में कुछ पेचीदा मुद्दे भी खड़े हुए हैं। इस हफ्ते पुतिन की दिल्ली यात्रा के दौरान उन पेंचों को खोलने में कोई सफलता मिली, इसके संकेत नहीं हैं।
कुडनकुलम परमाणु परियोजना के नए रिएक्टरों पर भारत के परमाणु दुर्घटना उत्तरदायित्व कानून लागू होने, 2जी घोटाले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के तहत रूसी कंपनी सिस्तेमा का लाइसेंस रद्द होने और भारत के अमेरिका से बढ़ते रक्षा संबंधों को लेकर रूस की शिकायत सामने आती रही है।
उधर भारत लड़ाकू विमान वाहक बेड़े गोर्शकोव को सौंपने में होती देरी और पाकिस्तान के प्रति रूस की बढ़ती गर्मजोशी को लेकर चिंतित रहा है। पुतिन की यात्रा के दौरान इन मुद्दों पर गतिरोध नहीं टूटे। इसके बावजूद रक्षा, ऊर्जा एवं आम व्यापार के क्षेत्र में सहयोग के हुए कई समझौते इस बात का प्रमाण हैं कि मतभेदों और मुश्किलों के बावजूद दोनों देशों की दोस्ती का अपना गतिशास्र है, जो समय की कसौटी पर खरी उतरी है।
20,000 करोड़ रुपए के नए रक्षा सौदों का करार और दोनों देशों के बीच एक-दूसरे के यहां निवेश को बढ़ाने के लिए दो अरब डॉलर का निवेश सहायता संघ बनाने के ताजा फैसले अहम हैं। इनसे आपसी संबंधों की जमीन भविष्य में और मजबूत होगी, यह उम्मीद की जा सकती है।






