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भ्रष्टाचार पर लगाम नहीं!

Bhaskar News | Dec 08, 2012, 00:13AM IST
भ्रष्टाचार  विरोधी जोरदार जनभावना के बावजूद वास्तव में ऐसी कोई प्रगति नहीं हुई, जिससे इस बुराई पर काबू पाए जाने का संकेत मिले। उल्टे अन्ना आंदोलन में ठहराव के साथ राजनीतिक व्यवस्था भ्रष्टाचार विरोधी सख्त उपाय करने के अपने वादे से मुकर गई।
 
लोकपाल उसकी सबसे अहम मिसाल है, जिसका गठन कब होगा, ये तय नहीं है। नतीजा है कि दुनिया में एक भ्रष्ट देश के रूप में भारत की छवि गहराती जा रही है। गैर-सरकारी संस्था ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल (टीआई) की ताजा रिपोर्ट इस बात की तस्दीक करती है। उसके ताजा भ्रष्टाचार धारणा सूचकांक के मुताबिक 176 देशों की सूची में भारत 94वें नंबर पर है।
 
पिछले साल भारत 95वें स्थान पर था। लेकिन यह कोई सुधार नहीं है, क्योंकि इस बार टीआई ने भ्रष्टाचार धारणा को मापने का अलग फॉमरूला अपनाया। अगर सूचकांक पिछले फॉमरूले से बनता, तो भारत 96वें नंबर पर आता। यानी पिछले साल से एक पायदान नीचे! टीआई ने ताजा सूचकांक दस अलग-अलग रिपोर्टो का औसत निकालते हुए तैयार किया है।
 
उनमें विश्व बैंक का मूल्यांकन भी शामिल है। अफसोस की बात है कि इस सूची में भारत चीन से भी नीचे आया है, जबकि चीन के बारे में आम धारणा है कि वहां भ्रष्टाचार ऊपर से नीचे तक व्याप्त हो गया है। एक और चिंताजनक तथ्य यह है कि जबसे इस वार्षिक सूचकांक को जारी करने की परिपाटी बनी, भारत का स्थान इसमें गिरता ही गया है। 2007 में भारत 72वें नंबर था।
 
2010 में वह 87वें और 2011 में 95वें नंबर पर जा पहुंचा। पिछले दो साल में बड़े घोटालों के खुलासे ने भ्रष्टाचार को भारत में एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना दिया। भ्रष्ट व्यवस्था के कारण हर कदम पर परेशान आम आदमी ने अपना गुस्सा सड़कों पर आकर जताया। इसके बावजूद अगर हालत में कोई सुधार नहीं हुआ, तो इससे निराशा महसूस होना स्वाभाविक है। लेकिन उससे संघर्ष का रास्ता छोड़ देने की जरूरत नहीं है।
 
टीआई की ताजा रिपोर्ट ने राजनीतिक व्यवस्था पर दबाव बनाए रखने की जरूरत पर फिर से रोशनी डाली है। हम इस समस्या की अनदेखी नहीं कर सकते, क्योंकि इसका सीधा संबंध हमारी एवं भावी पीढ़ियों की खुशहाली से है।
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