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अहंकार को समझ लेना ही अहंकार मिटाने जैसा है

 
Source: पं. विजयशंकर मेहता   |   Last Updated 00:15(03/02/12)
 
 
 
 
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जीने की राह.. पूजा-पाठ, साधना-तपस्या के बाद भी एक दुगरुण ऐसा है जिसके बचे रहने की संभावना बनी रहती है और वह है अहंकार। चूंकि अहंकार बचा रहता है, इसलिए संसार भी बचा रहता है। संसार बचा रहे पूजा के बाद भी, इसमें कोई दिक्कत नहीं है। संसार छोड़ने की जरूरत है ही नहीं, लेकिन परेशानी यह है कि पूजा के समय भी संसार साथ में चलता है।


इसके मूल में अहंकार भी होता है। अहंकार इतना बारीक है कि वह त्याग में उतर जाता है, क्षमा में प्रवेश कर जाता है। कहा जाता है कि अहंकार मिटा दिया जाए, लेकिन ऐसा हो नहीं पाता। दरअसल अहंकार को समझ लेना ही अहंकार को मिटाने जैसा है।


अहंकार को समझने के लिए जीवन में क्षमावृत्ति को बढ़ाया जाए। हमारे अपने लोग जब भूल करते हैं तो हम उनकी बड़ी से बड़ी भूलों को माफ कर देते हैं और दूसरों की छोटी से छोटी भूल पर भी उनके विरुद्ध निर्णय ले लेते हैं। हम क्षमाभाव को भी दो हिस्सों में बांट देते हैं - अपना और पराया। मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि जिनके भीतर क्षमाभाव अधिक होता है, वे कम बीमार पड़ते हैं। ऐसा कहा जाता है कि क्रोध आए तो क्षमा से जीतो, पर कभी-कभी ऐसा करने के बाद भीतर असंतोष का जन्म हो जाता है।


अपनी ही क्षमावृत्ति पर, स्वयं पर क्रोध आने लगता है। यह असंतोष है और इसके पीछे अहंकार है। कई बार तो लोग क्षमा भी अहंकार की तुष्टि के लिए करते हैं। लोग तारीफ करेंगे, इसीलिए क्षमा कर दो। जबकि क्षमा में नि:स्वार्थभाव होना चाहिए और नि:स्वार्थभाव से जो क्षमाभाव पैदा होगा, उसमें वह समझ होगी, जो हमें अहंकार को गलाने में मदद देगी।
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
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