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किंवदंती बनने को कटिबद्ध

 
Source: राजदीप सरदेसाई   |   Last Updated 00:11(21/10/11)
 
 
 
 
मायावती के दलित स्मारकों पर बहस जारी है। ऐसे में यह कल्पना करना रोचक होगा कि वास्तविक दलित नायक डॉ बाबासाहेब आंबेडकर इस स्थिति में क्या करते। यह तो तय है कि उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री के विपरीत वे अपनी मूर्तियों के निर्माण का हुक्म नहीं देते। आंबेडकर धुर राष्ट्रवादी थे और वे किसी भी किस्म की राजनीतिक व्यक्ति-पूजा को पसंद नहीं करते थे। 1949 में संविधान सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा भी था कि ‘राजनीति में व्यक्ति-पूजा अवमूल्यन और अधिनायकवाद की डगर है।’

आज 62 साल बाद इस बात में कोई संदेह नहीं रह गया है कि मायावती उत्तरप्रदेश में एक अधिनायकवादी नेत्री के रूप में उभरी हैं। इसीलिए वे आंबेडकर, फुले, शाहू और कांशीराम के साथ ही अपनी भी आदमकद मूर्तियां लगवाने का आग्रह कर सकती हैं। और इसीलिए वे धृष्टता के साथ यह दावा भी कर सकती हैं कि दलित प्रेरणा स्थल पर खर्चे गए 675 करोड़ रुपए पूरी तरह पार्टी को मिले अनुदान की राशि है, जबकि तथ्य यह है कि उत्तरप्रदेश सरकार पहले ही विभिन्न दलित स्मारकों और पार्को पर 3000 करोड़ रुपए खर्च कर चुकी है।

यह एक ऐसे राज्य में हो रहा है, जहां 38 फीसदी दलितों ने कभी स्कूल का मुंह भी नहीं देखा, जहां आज भी अनुमानित रूप से 70 फीसदी दलित प्रारंभिक स्तर पर ही स्कूल छोड़ देते हैं और जहां स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में हर साल सैकड़ों बच्चे एंसेफ्लाइटिस के कारण दम तोड़ देते हैं।

निश्चित ही आंबेडकर, जिनके लिए शिक्षा सशक्तीकरण का सबसे बड़ा औजार था, इस अवसर पर मायावती की अनुपयुक्त प्राथमिकताओं की भत्र्सना करते। वे मुख्यमंत्री की अकूत निजी संपत्ति पर भी आलोचनात्मक रुख अख्तियार करते। यह खबर सुनकर तो वे हैरान रह जाते कि मायावती ने अपने सरकारी बंगले का नवीनीकरण कराने के लिए जनता के 51 करोड़ रुपए फूंक दिए। ऐसा नहीं है कि आंबेडकर स्वयं मितव्ययी रहे हों, लेकिन फर्क यह है कि उन्होंने अपनी संपत्ति अपनी विद्वत्ता से अर्जित की थी। उन्होंने इसके लिए राजनीतिक तंत्र का अनुचित दोहन नहीं किया था।

जैसाकि उनके जीवनीकार धनंजय कीर लिखते हैं, ‘आंबेडकर का घर किसी एकांतवासी के घर जैसा नहीं था। उनकी विशाल लाइब्रेरी, उनके सुरुचिपूर्ण कपड़े, उनकी शानदार गाड़ी और दुर्लभ चित्रों का संग्रह उनके विराट व्यक्तित्व के अनुरूप था।’ यह कल्पना करना तो खैर कठिन ही है कि मायावती के पास भी आंबेडकर की ही तरह एक विशाल लाइब्रेरी होगी, लेकिन यदि हैंडबैग उनकी फैशन एसेसरी है, तो आंबेडकर के संदर्भ में यह बात उनके फाउंटेन पेन के बारे में कही जा सकती थी।

जो लोग मायावती द्वारा अपने जन्मदिन का जश्न मनाने के तरीके की आलोचना करते हैं, उन्हें यह याद दिलाना जरूरी है कि आंबेडकर का जन्मदिन भी उनके अनुयायियों द्वारा किसी सार्वजनिक समारोह की तरह मनाया जाता था और उनकी तस्वीरों को पालकियों में रखकर जुलूस निकाला जाता था। एक अर्थ में इस तरह के सार्वजनिक समारोहों का यह भी अर्थ हो सकता है कि अगर सवर्णो के पास अपने नायक और उत्सव हो सकते हैं तो दलितों के पास क्यों नहीं। संभव है आंबेडकर व्यक्ति-पूजा के इन उत्सवों के साथ बहुत सहज न होते हों, लेकिन उन्होंने इस तरह के आयोजनों के प्रतीकात्मक महत्व की कभी अवहेलना भी नहीं की।

इसीलिए मायावती ने अपने इर्दगिर्द जो पर्सनैलिटी कल्ट निर्मित किया है, उसका पूरी तरह उपहास नहीं उड़ाया जा सकता। भारत का उच्च कुलीन वर्ग, जो शादियों पर करोड़ों रुपए खर्च कर देने से पहले एक बार भी नहीं सोचेगा, मायावती की अतिव्ययिता पर जरूर नाक-भौं सिकोड़ सकता है, लेकिन बसपा नेत्री के इस रवैये में एक विशेष पद्धति भी है। यदि सोनिया गांधी के निजी जीवन के आसपास रची गई अगम्यता ने उनके व्यक्तित्व को एक किस्म का रहस्यपूर्ण आभामंडल प्रदान किया है, तो मायावती की दंभपूर्ण शैली ने उनके अनुयायियों में उनकी सम्राज्ञीनुमा छवि निर्मित की है। यदि कांग्रेस के प्रथम परिवार और स्वतंत्रता के नायकों के नाम दर्जनों स्मारक हैं तो ऐसा लगता है कि मायावती भी स्वयं को एक दलित किंवदंती बनाने के लिए कमर कसे हुए हैं।

यदि प्रतिस्पर्धात्मक राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में देखें तो यह संभव है कि आंबेडकर ने मायावती की भव्य परियोजनाओं का अनिच्छापूर्वक ही सही, किंतु अनुमोदन किया होता। आंबेडकर जातिभेद का अंत करना चाहते थे, लेकिन इसके बावजूद दलितों का राजनीतिक वर्चस्व उनका स्वप्न था। हालांकि उनके जीवनकाल में दलितों के लिए सत्ता के दरवाजे बंद ही रहे। उन्होंने इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी की स्थापना की थी, लेकिन उसे ज्यादा सफलता नहीं मिल पाई और वे स्वयं 1952 में चुनाव हार गए थे। उनकी राजनीतिक उपलब्धियां उनकी बौद्धिक क्षमताओं के अनुरूप नहीं हो सकीं। इसके विपरीत मायावती ने यह सिद्ध कर दिया कि एक दलित महिला भी अपने दम पर एक सशक्त राजनीतिक मुकाम हासिल कर सकती है।

यदि आंबेडकर संवैधानिक व्यक्ति थे, तो मायावती एक राजनेत्री हैं और उन्हें गठबंधन बनाने और तोड़ने से कोई परहेज नहीं है। सत्ता प्राप्त करने के लिए अपनाए जाने वाले नैतिक मानदंड हमें थोड़ा परेशान जरूर कर सकते हैं, लेकिन उत्तरप्रदेश के राजनीतिक अखाड़े के खिलाड़ियों के लिए नियम-कायदों को ताक पर रख देना आम बात है।

इसीलिए एक डाकघर कर्मचारी की बेटी मायावती द्वारा चार बार इस राज्य की मुख्यमंत्री बनना अपने आपमें एक उपलब्धि है। देश के संविधान निर्माता के निकट मायावती की मूर्ति आज भले ही असंगत मालूम हो, लेकिन कल वह लाखों दलितों के लिए प्रेरणा भी बन सकती है।

-लेखक आईबीएन 18 नेटवर्क के एडिटर-इन-चीफ हैं।
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
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