संरचनाबद्ध बहस की मुश्किलें
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने परमाणु ऊर्जा और जीएम (जेनेटिकली मॉडिफाइड) खाद्यों के बारे में 'संरचनाबद्ध बहस एवं विश्लेषण पर जोर देकर उचित पहल की है। उनकी इस बात से सहज ही सहमत हुआ जा सकता है कि ऐसे जटिल मुद्दों पर चर्चा 'आस्था या भय' से प्रेरित होकर नहीं, बल्कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण एवं समझदारी के साथ होनी चाहिए। भारत जैसे बड़ी आबादी वाले देश में वैज्ञानिक आविष्कारों से प्राप्त सुविधाओं के पूरे उपयोग की जरूरत है। जब आबादी के एक बड़े हिस्से की खाद्य, पेयजल, साफ-सफाई, स्वास्थ्य, ऊर्जा जैसी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने की चुनौती हो, तब वैज्ञानिक शोध एवं नई तकनीक के इस्तेमाल से मुंह मोडऩे का जोखिम नहीं उठाया जा सकता। लेकिन देश में एनजीओ संस्कृति के प्रसार के साथ हर चीज के विरोध की बढ़ती प्रवृत्ति ने हर नई तकनीक के प्रति भय एवं आशंका का माहौल बना दिया है। बहरहाल, अगर इस माहौल के दायरे में आबादी का एक बड़ा हिस्सा आ गया है, तो उसकी कुछ जिम्मेदारी सरकार पर भी जाती है। खासकर परमाणु ऊर्जा एवं जीएम खाद्यों के बारे में स्वतंत्र एवं विश्वसनीय विनियामक एजेंसी के न होने तथा निर्णयों में पारदर्शिता के अभाव ने लोगों के मन में संदेह पैदा किया है। इसकी एक मिसाल नई दवाओं के परीक्षण का मसला भी है, जिस पर अब सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। बिना मरीजों को संबंधित खतरों से वाकिफ कराए किए जा रहे परीक्षणों, ऐसी दवाओं से अनेक लोगों की मौत और पीडि़त परिवारों को उचित मुआवजा न मिलने की ठोस जानकारियां सामने आने के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने भारतीय औषधि महानियंत्रक के तहत आने वाले केंद्रीय औषधि प्रमाणन नियंत्रण संगठन के अधिकार रद्द कर दिए हैं। कोर्ट ने कहा कि दवाओं के अनियंत्रित परीक्षण से मानव जीवन पर कहर ढाया जा रहा है। दरअसल, ऐसी प्रवृत्तियां लोगों के मन में सरकारों के इरादों को संदिग्ध बनाती हैं। अत: अगर सरकार सचमुच वैज्ञानिक भावना के साथ संवाद चाहती है, तो आम जिंदगी से संबंधित मामलों में पारदर्शिता बरतते हुए उसे भरोसेमंद विनियमन की व्यवस्था करनी चाहिए। वरना, कुछ लोग अपनी आस्था के मुताबिक लोगों में भय पैदा करते रहेंगे और नई तकनीक विवादास्पद बनती रहेगी।






