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जब मन्नत में हो खोट तो प्रभु भी क्या करें!

अनुज खरे | Jul 24, 2012, 01:03AM IST
 
 

‘आज भी अधिकांश कलयुगी भक्त ही आए’, प्रभु के सामने मन्नत के धागे वाले प्रभारी ने अरज किया। वैसे ऊंची पहाड़ी पर मंदिर है। बड़ी मान्यता है। मुरादें पूरी होती हैं। साल में जब मेला लगता है तो सैकड़ों लोग उमड़ आते हैं। रोजमर्रा में 20-25 लोग तो चले ही आते हैं। मंदिर के सामने खड़ा है एक पेड़। उधर मंदिर में मुराद मांगी, इधर निकलकर पेड़ पर मन्नत का धागा बांधा। अटा पड़ा है पेड़ धागों से। मेले वाले दिन तो भारी रेलमपेल।

दूर-दूर से आते हैं श्रद्धालु। मेला भर उठता है पहाड़ी के नीचे। मेला देखा। खाया-पकाया। थककर रात को वहीं सो गए। बाकी दिन भी पर्याप्त संख्या में श्रद्धालु पहुंच ही जाते हैं मंदिर। कहते हैं कि चमत्कारी है मंदिर, जहां सबकी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।

सो, भगवान भी अपनी क्रेडिबिलिटी को सतर्क। भले ही कलयुग हो, भगवान के घर कोई देर-सबेर नहीं है। रात में धागा प्रभारी से धरवा लेते हैं पूरा हिसाब। एक-एक धागे की कैफियत पूछते हैं। पूरी तरह जांच-परख करते हैं, तब होती है कोई एकाधा मन्नत पूरी। लोभ-लालच के धागे तो भगवान एक नजर में ही ताड़ जाते हैं। धागा प्रभारी तक ऐसे धागे भगवान के सामने लाने में हिचकता है। लेकिन आदेश है, सो हर दिन बांधे गए हर धागे का हिसाब कृपानिधान के सामने बखानता है। ‘हां प्रभु! उसी कंजी आंखों वाले तोंदू का धागा है। अपने ताऊ की जायदाद अपने नाम कराने के चक्कर में है। चांदी के मुकुट का लालच दे गया
है।’

‘धूर्त कहीं का! डालो धागा डस्टबिन में’, प्रभु झटके में फैसला करते हैं। धागा प्रभारी तत्परता से पालन करता है। ‘ये नीला वाला?’ ‘वो जो आया था न जोड़ा, जहां पत्नी कर रही थी प्रार्थना! उसी का है।’ प्रभु को याद हो आया। सुबह ही तो आया था। पति तो हाथ जोड़े खड़ा था, पत्नी ही बुदबुदा रही थी। पति ने पूछा भी था तो कैसे चट से बोली थी- ‘क्यों बताएं? मन्नत बताई नहीं जाती।’ और मन्नत भी तो देखो क्या थी- ‘प्रभु आपका लाख-लाख धन्यवाद। पति सुंदर है। घर सलोना है। बस खूसट सास से छुटकारा दिलवा दो। घर की चाबी मेरी कमर में लगवा दो। भंडारा करवाऊंगी।’

‘वही घर-घर की कहानी’, प्रभु हल्के-से मुस्करा भर देते हैं। ‘डस्टबिन में डालूं!’ इसी बीच धागा प्रभारी निवेदन कर देता है। झटके से टूट जाती है प्रभु की तंद्रा। ‘फौरन से पेश्तर’ प्रभु पेडिंग नहीं रखते कुछ। ‘अब ये हरा धागा?’ ‘वो युवती आई थी न, जो अपनी सौत से बचाने की प्रार्थना कर रही थी। उसी ने बांधा है।’

‘वो जो अंग्रेजी में आ रहे विचारों को हिंदी में ट्रांसलेट करके हमें सुना रही थी?’ ‘हां प्रभु, कितनी नादान थी। सर्वशक्तिमान के सामने खड़ी है और सोचती है कि प्रभु अंग्रेजी नहीं जानते। ये मनुष्य भी प्रभु।’ ‘खैर, क्या डिमांड थी?’ प्रभु ने धागा प्रभारी को डपट दिया। ‘पति के जीवन से सौत निकल जाए, पूरी तरह से उसी का शिकंजा कस जाए।’ ‘अरे उसकी तो अभी शादी ही नहीं हुई है,’ प्रभु करेक्शन करते हैं।

‘फिर?’ ‘ फिर क्या, अरे इसे भी डस्टबिन में डाल!’ प्रभु आधे घंटे में ही अधिकांश धागों का हिसाब कर देते हैं। ‘अब ये तेरे हाथ में क्या चमक रहा है?’ प्रभु अचानक धागा प्रभारी से पूछते हैं। ‘कृपानिधान, वो छोटी-सी बच्ची आई थी, जो अपनी नानी के लिए प्रार्थना कर रही थी। मोतियाबिंद का ऑपरेशन हुआ है जिनका। चाहती थी नानी की आंखें उसके जैसी नीली और खूबसूरत हो जाएं। क्या करूं?’

‘ला मेरे हाथ में दे’, प्रभु ने हाथ में धागा लिया और मुग्ध होकर उसे निहारने लगे। धागाप्रभारी भक्त की भावना में डूबे प्रभु को जी-भरकर निहारना चाहता है। उसे पता है कि भगवान के चेहरे पर एेसे अलौकिक भाव किसी चमत्कार से कम नहीं हैं। वह जानता है कि कलयुग में भगवान के चेहरे पर एेसे अलौकिक भाव कभीकभार ही आते हैं।
 
 
 

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