महज चेहरे बदले हैं चरित्र नहीं

इस मंत्रिमंडलीय फेरबदल में कौन-सा चमत्कार हुआ? सिर्फ सलमान खुर्शीद के विदेश मंत्री बनने के अलावा कौन-सा ऐसा काम हुआ, जिसे देखकर कहा जा सके कि इस सरकार से अब जरा बेहतर कामकाज की उम्मीद की जा सकती है।
विदेश मंत्रालय को योग्य मंत्री की तलाश काफी पहले से थी। हालांकि उसके अभाव में मंत्रालय का कामकाज बड़ी योग्यतापूर्वक शिवशंकर मेनन और रंजन मथाई चला ही रहे थे। अब सलमान खुर्शीद के आ जाने से पड़ोसी देशों के मामलों में अनेक नई पहल की जा सकेंगी, लेकिन क्या कोई ऐसी पहल सलमान कर सकेंगे, जो कांग्रेस की बाजी पलटा दे? यह मंत्रिमंडलीय फेरबदल मुख्य रूप से इसीलिए हुआ है कि 2014 में कांग्रेस की बाजी पलट जाए।
विदेश नीति के क्षेत्र में ऐसी पहल इस समय सिर्फ पाकिस्तान को लेकर हो सकती है। यदि भारत और पाकिस्तान के महासंघ की घोषणा हो जाए तो कांग्रेस इस घोषणा की नाव पर बैठकर चुनाव की वैतरणी पार कर सकती है, लेकिन ऐसे ऐतिहासिक फैसले सिर्फ विदेश मंत्री नहीं कर सकता। प्रधानमंत्री की पहल के बिना इस दिशा में बढऩा भी मुश्किल है और ऐसी पहल प्रधानमंत्री तभी कर सकता है, जबकि उसमें नेतृत्व की विलक्षण क्षमता हो।
जहां तक ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे युवा मंत्रियों को स्वतंत्र प्रभार देने का प्रश्न है, तो यह अच्छा कदम है और उनसे आशा भी की जाती है कि वे अपने-अपने मंत्रालयों में कुछ उल्लेखनीय उपलब्धियां अर्जित करके दिखाएंगे ताकि अगर भविष्य में कभी कांग्रेस की सरकार बने तो उन्हें पूरे मंत्री का पद मिल सके। मगर आश्चर्य है कि जयपाल रेड्डी से पेट्रोलियम मंत्रालय छीन लिया गया। इस मंत्रालय पर मुनाफाखोर उद्योगपतियों की काली छाया हमेशा मंडराती रहती है।
रेड्डी ने बड़ी दृढ़ता से उसकी सफाई की थी और राष्ट्र की प्राकृतिक संपदा की समुचित सुरक्षा की थी। उनके हटने का अर्थ क्या यह नहीं होगा कि यह सरकार कभी विश्व-पूंजीपति अमेरिका के दबाव में काम करती है या भारतीय पूंजीपतियों के आगे घुटने टेकती रहती है? सरकार में साहस और पहल की कमी है, इसका प्रमाण जयराम रमेश और कपिल सिब्बल से छीने हुए विभागों से भी मिलता है।
रमेश ने 'निर्मल भारत' यानी यथायोग्य शौचालयों का अभियान चलाया था। यह अभियान सफल हो जाता, तो वे भारत ही नहीं, समूची तीसरी दुनिया के 'हीरो' बन जाते और कपिल सिब्बल मानव संसाधन में कुछ अच्छी पहल भी कर रहे थे। ऐसा लगता है कि यह सरकार भेड़चाल चलने वाले नेताओं को ज्यादा पसंद करती है। मणिशंकर अय्यर, रेड्डी और रमेश जैसे मौलिक बुद्धि वाले नेताओं से यह परहेज करती है। बाइबिल में ठीक ही कहा गया है कि जिहोवा परमेश्वर ने इस संसार को अपने ही स्वरूप के अनुसार गढ़ा है यानी जैसा शीर्ष नेतृत्व, वैसा शेष नेतृत्व!
ऊपर से नीचे तक नेतृत्व का जो स्वरूप बन रहा है, वह डूबती नाव को उबारने लायक है क्या? पवन बंसल को रेल, कमलनाथ को संसदीय मामले, वीरप्पा मोइली को पेट्रोलियम और शैलजा को सामाजिक न्याय के विभाग देकर सरकार ने यह आशा जरूर जगाई है कि उसके कामकाज का स्तर गिरेगा नहीं, लेकिन क्या यह उलटफेर कांग्रेस पार्टी के लिए विशेष लाभप्रद सिद्ध होगा? ये मंत्री दक्षतापूर्वक काम करेंगे, लेकिन क्या वे कुछ ऐसा करेंगे, जिससे करोड़ों मतदाताओं के मन से मनमोहन-सरकार की यह छवि दूर हो जाए कि वह आजादी के बाद की सबसे भ्रष्ट सरकार है? क्या इस मंत्रिमंडलीय परिवर्तन से कोई ऐसे संकेत मिलते हैं कि देश में चल रही भ्रष्टाचार विरोधी आंधी थम सकेगी? क्या नए मंत्री आंदोलनकारियों द्वारा छोड़ी जा रही फुलझडिय़ों पर भारी पड़ेंगे? फेरबदल के बाद प्रधानमंत्री ने कहा कि जो मंत्री हटे हैं, वे पार्टी में महत्वपूर्ण काम करेंगे। इन सात हटे हुए मंत्रियों की इज्जत क्या रहेगी? कांग्रेसियों से ज्यादा यथार्थवादी राजनीतिज्ञ दुनिया में कहीं नहीं हैं। वे सत्ता के पुजारी होते हैं। इन हटे हुए मंत्रियों की कीमत कटे हुए बालों से भी कम रह जाएगी। अब पता नहीं, इनके हटने से पार्टी कैसे मजबूत होगी?
2014 के चुनाव के बाद भी पार्टी या सरकार (यदि बनी तो) की शक्ल क्या होगी, इसके भी संकेत इस फेरबदल से नहीं मिले हैं। यदि राहुल गांधी को मंत्री बना दिया जाता तो लोग समझते कि शायद भ्रष्टाचार के कीचड़ में धंसी यह सरकार अब आगे बढ़ेगी और राहुल के पुण्य से कोई चमत्कार हो गया तो सरकार तिबारा बनेगी और राहुल उसका नेतृत्व करेंगे, लेकिन अब भी अपने आप को पार्टी तक सीमित रखकर इस मंत्रिमंडलीय फेरबदल को उन्होंने फीका कर दिया है। 22 नए मंत्रियों पर अकेले राहुल का मंत्री बनना भारी पड़ता। सिर्फ चेहरे बदलने से क्या होगा, चरित्र भी तो बदलना चाहिए।
इस फेरबदल से न कांग्रेस और न सरकार के चरित्र में कोई उल्लेखनीय परिवर्तन हुआ है। हां, दक्षिणी प्रांतों को प्रचुर प्रतिनिधित्व मिला है। पूर्वी भारत की उपेक्षा हुई है। कांग्रेस शायद इस तर्क पर भरोसा कर रही है कि आंध्र, कर्नाटक और केरल के ज्यादा मंत्री बना देने से वहां उसे लोकसभा सीटें ज्यादा मिलेंगी। डर यही है कि जो नए मंत्री अभी बने हैं, कहीं उनके विरुद्ध भी भ्रष्टाचार के नए बम न फूटने लगें। नए मंत्रियों की शपथ ने प्रांतीय स्तरों पर ईष्र्या-द्वेष फैलाया है, इसके संकेत अभी से मिलने लगे हैं।
इसका अर्थ यह नहीं है कि यह फेरबदल सर्वथा अनावश्यक था। आवश्यक तो वह इतना ज्यादा था और अब भी है कि पार्टी व सरकार का चेहरा भी बदल जाए और चरित्र भी! ये दोनों काम एक साथ कैसे हों? यह तभी हो सकता है, जबकि पार्टी नेतृत्व और सरकार सीधे जनता से जुड़े हों। दो में से कोई एक तो जुड़ा हो। यहां दोनों ही आसमान से उतरे हैं। कांग्रेस में जमीन से जुड़े हुए नेताओं की कमी नहीं है। लेकिन उन्हें कौन पूछता है? कांग्रेस देश की सबसे पुरानी पार्टी है और दीवार पर लिखी इबारत को वह साफ-साफ पढ़ सकती है, लेकिन इस इबारत को पोंछने की क्षमता आज किसमें है? इसीलिए ये सतही फेरबदल, चाहे सरकार में हों या पार्टी में, उसका संकटमोचन नहीं कर सकते।
वेदप्रताप वैदिक
प्रसिद्ध राजनीतिक चिंतक






