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दादू की एक रोमांचक दास्तान

रस्किन बॉन्ड | Sep 28, 2012, 23:34PM IST
 
 

मेरे दादू के जीवन से जुड़े अनेक रोमांचक किस्से हैं, जो हमें आज भी याद आते हैं। उन्होंने इंडियन रेलवे ज्वाइन करने से पहले कुछ समय ईस्ट अफ्रीकन रेलवे में भी काम किया था और उसी दौरान उनकी एक बार शुतुरमुर्ग से जबरदस्त मुठभेड़ हुई थी, जिसे वह ताउम्र नहीं भूले। दादू वहां एक छोटे-से कस्बे में रहते थे, जहां से उनका कार्यस्थल तकरीबन 12 मील दूर था। वह एक दुर्गम इलाका था और दादू घोड़े पर सवार होकर वहां तक आना-जाना करते थे।


एक दिन दादू का घोड़ा बीमार पड़ गया। उनका कार्यस्थल पहुंचना बहुत जरूरी था, लिहाजा वह पैदल ही एक शॉर्टकट रास्ते से वहां के लिए निकल पड़े। यह रास्ता एक शुतुरमुर्ग के बाड़े से होकर जाता था, जहां से गुजरना खतरे से खाली नहीं था। ऐसा इसलिए क्योंकि उस वक्त शुतुरमुर्ग का प्रजननकाल चल रहा था और ऐसे में नर शुतुरमुर्ग बेहद उग्र हो जाते हैं। दादू इस बात से वाकिफ थे, लिहाजा उन्होंने अपने प्यारे डॉगी को भी साथ ले लिया था। आपको जानकर ताज्जुब होगा कि बड़े से बड़ा शुतुरमुर्ग भी छोटे-से कुत्ते को देखते ही दुम दबाकर भाग लेता है।


बहरहाल, बाड़े के नजदीक पहुंचने पर दादू ने इसके भीतर नजर दौड़ाई। वहां थोड़ी दूर पर ही कुछ शुतुरमुर्ग नजर आए। चूंकि उनका प्यारा डॉगी भी साथ था, लिहाजा वह बेखौफ बाड़े के भीतर चले गए। वह तकरीबन आधा मील ही चले होंगे कि उन्हें एक खरगोश दिखाई दिया। खरगोश को देखते ही डॉगी ने भौंकते हुए उसके पीछे दौड़ लगा दी। उन्होंने उसे वापस बुलाने की काफी कोशिश की, लेकिन सब फिजूल। डॉगी की आवाज से शुतुरमुर्गो में खलबली मच गई और वे इधर-उधर भागने लगे। अचानक दादू को तकरीबन 100 गज की दूरी पर एक विशाल नर शुतुरमुर्ग नजर आया, जो लगातार उन्हें घूर रहा था। अचानक उसने अपने पंख फैलाए, पूंछ ऊपर उठाई और दादू की ओर दौड़ लगा दी। यह देखकर दादू तुरंत पलटे और बाहर की ओर भागने लगे। लेकिन यह तो मानो खरगोश और कछुए की रेस थी। दादू के सोलह-सत्रह कदम उस विशाल प्राणी के दो-तीन कदमों के बराबर थे। बचने का सिर्फ एक ही रास्ता था- किसी झाड़ के पीछे छुप शुतुरमुर्ग को झांसा दिया जाए।


लिहाजा दादू तुरंत अपनी दिशा बदलते हुए पास ही स्थित झाड़ियों के पीछे जाकर दुबक गए और अपनी उखड़ी सांसों को संभालने लगे। शुतुरमुर्ग से बचने के लिए बहुत सावधानी की जरूरत थी। उन्हें किसी भी सूरत में शुतुरमुर्ग की घातक किक के आगे नहीं आना था। शुतुरमुर्ग आगे की ओर कुंग-फू स्टाइल में इतनी जोर से किक मारता है कि व्यक्ति की हड्डी-पसली एक हो जाए और उसके पैने नाखून आपको लहूलुहान कर सकते हैं।


बुरी तरह थके मेरे दादू मन ही मन ऊपरवाले से मदद की गुहार लगा रहे थे, तभी उस शुतुरमुर्ग ने उन्हें देख लिया। उन्हें वहां दुबका देख शुतुरमुर्ग दोगुनी शक्ति से भर गया और उनकी ओर छलांग लगा दी। दादू ने किसी तरह बाजू में हटते हुए अपना बचाव किया। तभी न जाने कहां से दादू में नई जान आ गई और उन्होंने उछलकर उसका एक पंख पकड़ लिया।


अब डरने की बारी शुतुरमुर्ग की थी। वह बचने के लिए तेजी से गोल-गोल घूमने लगा। उसकी रफ्तार इतनी तेज थी कि दादू के पैर जमीन से उखड़ने लगे। लेकिन उन्होंने शुतुरमुर्ग का पंख नहीं छोड़ा। शुतुरमुर्ग गोल-गोल घूमते हुए तेजी से पंख फड़फड़ा रहा था। दादू की हालत बहुत खराब हो चुकी थी। लगातार खिंचाव पड़ने की वजह से उनकी बांह में तेज दर्द उठने लगा था और लगातार घूमने की वजह से उनका सिर भी चकराने लगा था। लेकिन वह जानते थे कि पकड़ ढीली करते ही उनकी शामत आ जाएगी। शुतुरमुर्ग लगातार चक्करघिन्नी बना हुआ था और उसे देखकर लगता था, मानो वह कभी थकेगा ही नहीं।


तभी अचानक शुतुरमुर्ग एक पल के लिए रुका और उल्टी दिशा में घूमने लगा। इस अप्रत्याशित पलटी से न सिर्फ दादू की उसके पंखों से पकड़ छूट गई, वरन वह छिटककर जमीन पर लुढ़क गए। उनकी आंखों के आगे अंधेरा छाने लगा था। वह कुछ समझ पाते, इससे पहले ही शुतुरमुर्ग उनके सिर के पास आकर खड़ा हो गया। दादू को अपना अंत निकट नजर आने लगा। उन्होंने डर के मारे चेहरे को हथेलियों से ढंक लिया। लेकिन आश्चर्य, शुतुरमुर्ग ने हमला नहीं किया।
उन्होंने चेहरे से हाथ हटाकर देखा तो पाया कि शुतुरमुर्ग अपना एक पैर उठाकर उन्हें जोरदार किक लगाने की पोजीशन में है। दादू की डर से घिग्घी बंध गई। वह उस वक्त कुछ करने की स्थिति में नहीं थे। तभी अचानक एक आश्चर्यजनक घटना घटी। शुतुरमुर्ग ने दादू के ऊपर ताना हुआ अपना पैर हौले-से नीचे किया और तेजी से पलटकर वहां से भाग गया। दादू की हैरानी का ठिकाना नहीं था। तभी उन्होंने अपने प्यारे डॉगी के भौंकने की आवाज सुनाई दी और अगले ही पल वह उनके सामने हाजिर था।


कहने की जरूरत नहीं, दादू ने उसे गोद में उठाकर खूब लाड़-दुलार किया। उस वक्त उनके लिए वह डॉगी किसी देवदूत से कम नहीं था। इसके बाद दादू ने शुतुरमुर्ग के बाड़े को पार करने तक एक पल के लिए भी डॉगी को खुद से अलग नहीं किया।


रस्किन बॉन्ड

पद्मश्री से सम्मानित ब्रिटिश मूल के साहित्यकार
 
 
 

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