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आंसू, मुस्कराहटें और लेखन

रस्किन बॉन्ड | Jul 03, 2012, 01:15AM IST
 
 

मैं अपने आपको खुशकिस्मत समझता हूं, क्योंकि पिछली लगभग आधी सदी से मैं वह काम करके अपनी आजीविका कमा रहा हूं, जिससे मुझे प्यार है। जी हां, यह काम है लेखन।

कभी-कभी मैं सोचता हूं कि शायद मैंने कुछ ज्यादा ही लिख दिया है। हां, ऐसा हो जाता है कि आपका लेखन एक आदत में ढल जाए और एक सीमा के बाद आप खुद को दोहराने लगें। यह भी संभव है कि कहने का तरीका बदल जाए, लेकिन विचार, स्मृतियां, चरित्र, परिवेश, घटनाएं लगभग वही या वैसी ही रहें। यूं भी कलाकारों और संगीतकारों की तुलना में लेखकों पर खुद को दोहराए जाने का आरोप कुछ ज्यादा ही लगाया जाता है।

टर्नर से कभी किसी ने नहीं कहा कि उन्होंने सूर्यास्तों के इतने सारे चित्र क्यों बनाए, या गोगां को किसी ने नहीं टोका कि वे सुंदर ताहिशियन महिलाओं के चित्र ही क्यों बनाते रहे, या हुसेन से ही किसी ने नहीं कहा कि इतने सारे घोड़ों के चित्र बनाने की भला क्या जरूरत आन पड़ी थी। संगीत की दुनिया में भी अगर देखें तो पाएंगे कि पुचिनी का एक ऑपेरा दूसरे से बहुत भिन्न नहीं है। शोपां के नॉक्चर्न एक जैसी थीम पर रचे गए हैं। आधुनिक सुगम संगीत में भी एक ही किस्म की मेलोडी जरा से वेरिएशन के साथ बार-बार दोहराई जाती है।

लेकिन लेखकों को इतनी रियायत नहीं मिलती। शायद वे जिस विधा में काम कर रहे होते हैं, यह उसकी भी एक सीमा है। लेखकों पर अपने चरित्रों को दोहराने का आरोप इसलिए लगता है, क्योंकि वे व्यक्तियों के बारे में लिख रहे होते हैं, रंगों या ध्वनियों पर काम नहीं कर रहे होते हैं। हेमिंग्वे की दुनिया जेन ऑस्टन की दुनिया से बहुत भिन्न है, लेकिन इसके बावजूद लेखन के प्रति उनके रवैये में यह बात समान मिलेगी कि उनके द्वारा रचे गए चरित्र उनके ही मनोभावों का विस्तार थे। फर्क इतना ही है कि जेन ऑस्टन ने अपना पूरा जीवन एक छोटी-सी जगह पर बिता दिया, जबकि हेमिंग्वे किसी घुमंतू यायावर की तरह पूरी दुनिया का चक्कर काटते रहे।

किसी भी लेखक के लंबे कॅरिअर में यह लगभग तय है कि कभी न कभी वह खुद को दोहराएगा। लेखक के दिमाग में नए विचार आने के बावजूद पुरानी विषयवस्तुएं भी बनी रहती हैं। लेकिन सबसे जरूरी यही है कि लिखते रहा जाए। दुनिया को सतर्क नजरों से देखा व सुना जाए और शब्दों तथा उनके विन्यास की सुंदरता को निहारा जाए। और जैसाकि लेखकों के साथ ही कलाकारों और संगीतकारों पर लागू होता है कि हम अपने कौशल पर जितना काम करेंगे, उतनी ही हमारी प्रतिभा निखरती चली जाएगी।

मेरे लिए लिखना दुनिया का सबसे सरल काम और सबसे बड़ा सुख है। किसी मनोभाव या विचार को शब्दों में व्यक्त कर पाना एक ऐसा हुनर है, जिससे मैं बहुत प्यार करता हूं। मैं अपने दिन की योजना कुछ इस तरह बनाता हूं कि उसमें कुछ न कुछ लिखने की गुंजाइश बनी रहे, फिर चाहे वह कोई छोटी-सी कविता, कोई एक पैराग्राफ, कहानी का एक हिस्सा, निबंध या कोई बड़ा लेख ही क्यों न हो। इसकी वजह यह नहीं है कि लेखन मेरा पेशा है, बल्कि यह है कि मुझे इससे बहुत खुशी मिलती है।

मेरे आसपास की दुनिया (चाहे पहाड़ हो या मेरी खिड़की से नजर आने वाली चहल-पहल भरी सड़क) लोगों, दृश्यों, विचारों से भरी पड़ी है और मैं उस गुजरते हुए लम्हे को हमेशा के लिए थाम लेने के लिए उसे लिख लेता हूं। मेरे लेखन में मेरी जिंदगी की मुस्कराहटें और आंसू समाए हुए हैं। यदि मुझे रोज लिखने की आजादी नहीं होती तो जीवन मेरे लिए असहनीय हो जाता। हालांकि ऐसा भी नहीं है कि मेरे द्वारा लिखी गई हर चीज सहेजने लायक होती है। मेरी पांडुलिपियों के अनेक पृष्ठ छपने से पहले ही मेरे कूड़ेदान में समा चुके होते हैं। मैं हमेशा अपनी उम्मीदों पर खरा नहीं उतरता, जाहिर है मैं हमेशा दूसरों की उम्मीदों पर भी खरा नहीं उतर सकता।

लेखन की मेरी थ्योरी यह है कि हमारे विचार एकदम स्पष्ट होने चाहिए और शब्द साफ पानी की धारा की तरह बहने चाहिए। और यदि शब्द किसी पहाड़ी झरने की तरह बहते हों तो कहने ही क्या। निश्चित ही हमें अनेक बाधाओं का सामना करना पड़ता है, लेकिन इसी तरह हम उनसे जूझना सीखते हैं। यदि लेखन के दौरान हमारी गति किसी गंदली नदी की तरह सुस्त पड़ जाए, तो यही बेहतर होगा कि हम वहीं रुक जाएं। लेखक को बार-बार अपने स्रोत, अपने उद्गम की ओर लौटकर जाना पड़ता है, ताकि वह अपने स्पष्ट विचारों को फिर से पा सके।

मैं एक दिन में एक या दो घंटे से अधिक नहीं लिखता। यदि मैं लेखन को इससे ज्यादा समय दूं तो मेरे शब्द बोझिल होने लगते हैं और मैं यह कतई नहीं चाहता। मुझे अपने लिए एक साफ नदी चाहिए।
लेकिन लेखन के लिए स्पष्ट विचार और शब्द संपदा के साथ ही अच्छे मूड की भी जरूरत होती है। मुझे यकीन है कि जब स्टर्न ने ‘शैंडी’ लिखा होगा, तब वे खुशी से उछल रहे होंगे। ‘वुदरिंग हाइट्स’ पढ़कर पता चलता है कि एमिली ब्रोंते जिंदगी को कितनी शिद्दत से प्यार करती थीं। डिकेंस हर शब्द को इस तरह लिखते थे, जैसे यह उनका आखिरी शब्द हो। कॉनराड के लेखन में समुद्र का-सा विस्तार और बेचैनी है। महान लेखक वही होते हैं, जिन्हें अपने अहसासों को शब्दों में पिरोने का हुनर आता है।

एक बार एक स्कूली लड़के ने मुझसे पूछा : ‘क्या आप गंभीर लेखक हैं?’ मैंने जवाब दिया : ‘मैं गंभीर होने की पूरी कोशिश करता हूं, लेकिन लिखने की खुशी बार-बार मुझे गंभीर होने से रोक देती है।’ फिर मैं सोचता हूं कि क्या एक खुशमिजाज लेखक को गंभीरता से लिया जा सकता है? पता नहीं। लेकिन यह तो तय है कि जिस दिन मैंने लेखन को ही अपनी जिंदगी माना था, तब वह एक बेहद गंभीर फैसला था।

लेकिन इसके लिए नौकरी, सुरक्षा, सहूलियत, घर-परिवार जैसी कुर्बानियां देनी पड़ती हैं। यदि मैंने पच्चीस वर्ष की उम्र में ब्याह कर लिया होता तो क्या तब मुझे मिला एक बहुत अच्छी नौकरी का प्रस्ताव इतनी आसानी से ठुकरा पाता? यदि मैं वह नौकरी कर लेता तो आज मुझे पेंशन मिल रही होती, लेकिन पेंशन की किसे टेंशन है? सबसे जरूरी बात यह है कि मैंने अपनी जिंदगी आजादी के साथ बिताई है और लगातार लेखन किया है, चाहे आजीविका के लिए ही सही। लेखक की जिंदगी पर पकड़ कभी ढीली नहीं होनी चाहिए। बहुत-से लेखक एक सुरक्षित भविष्य की चिंता में जीवन में समझौते कर लेते हैं। मुझे खुशी है कि मैंने ऐसा नहीं किया और यही कारण है कि मैं अपने आपको खुशकिस्मत समझता हूं।
 
 
 

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