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फौरी इंसाफ या अराजकता?

dainikbhaskar | Dec 27, 2012, 12:15PM IST
 
 

बिहार के अररिया जिले में दो लोगों की आंख में तेजाब डाल दिया गया। दोनों अपराधी बताए गए हैं, जिनकी कथित हरकतों से आजिज आकर तीन ग्रामीणों ने यह कदम उठाया।
 
बीते शनिवार को झारखंड के खूंटी जिले में पांच लोगों को ग्रामीणों ने पीट-पीटकर मार डाला। उन पर लड़कियों व महिलाओं के साथ छेडख़ानी का आरोप था। उनमें से एक दुष्कर्म के इल्जाम में तीन महीने पहले जेल में था और जमानत पर रिहा हुआ था। उनकी हरकत से लोग गुस्से में थे, जिसका इजहार उन्होंने लाठियों एवं पत्थरों से उनकी पिटाई करते हुए जान लेकर किया।
 
दिल्ली में एक तेईस वर्षीय युवती से दुष्कर्म एवं बर्बरता की हृदयविदारक घटना के बाद सड़कों पर लोगों के उमड़े आक्रोश में भी तुरंत न्याय की मांग तेजी से उठी है। ये घटनाएं (या जनभावना) कानून-व्यवस्था की मशीनरी के प्रति बढ़ते अविश्वास की झलक देती हैं।
 
पुलिस जिस तरह पीडि़तों के साथ व्यवहार करती है, जघन्य अपराधों की जांच में भी जैसी लापरवाही दिखाती है और न्यायपालिका में देरी का जैसा आलम है, उससे आम लोगों में असहाय होने का भाव पैदा होना अस्वाभाविक नहीं है। लेकिन यह विचारणीय है कि क्या इसकी प्रतिक्रिया में कानून अपने हाथ में लेना उचित है?
 
एक परिपक्व समाज के रूप में हमें यह गंभीरता से सोचने की जरूरत है कि क्या ऐसा कर हम समाज के दूरगामी भविष्य को सुरक्षित कर रहे हैं? भारतीय न्याय व्यवस्था आधुनिक सिद्धांत पर आधारित है, जिसमें दोष साबित होने तक सबको निर्दोष माना जाता है। दोष साबित करने की प्रक्रिया में सबूत, गवाही, दलील और जिरह वे औजार हैं, जो नागरिक अधिकारों के संरक्षण के लिए जरूरी हैं।
 
एक फैसले के खिलाफ उच्चतर स्तर पर अपील का अधिकार न्याय प्रक्रिया में भूल निवारण और निर्णय में मनोगत विश्लेषण की गुंजाइश को दूर करने के लिए जरूरी है।
 
इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि भारत में ये सारी प्रक्रियाएं जंग खा गई हैं, जिससे न्याय-तंत्र की गति अस्वीकार्य स्तर तक सुस्त हो गई है। उन्हें दुरुस्त करना जरूरी है। जनहस्तक्षेप की इसमें सर्वप्रमुख भूमिका है। मगर जागरूक जनता को तात्कालिकता में नहीं, पूरे परिप्रेक्ष्य एवं दूरदृष्टि के साथ सोचना चाहिए।
 

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