बहस ही रास्ता
Bhaskar News
| Aug 25, 2012, 00:35AM IST
कथित कोयला घोटाले में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को निशाना बनाकर भाजपा ने इस हफ्ते संसद की कार्यवाही रोकी तो उसका कम से कम एक सहयोगी दल इसमें मन से उसके साथ नहीं दिखा। उधर मीडिया के एक बड़े हिस्से में खुद भाजपा आलोचना का केंद्र बन गई। वहां इस तरह के सवाल उठे कि क्या बहस रोककर भाजपा कुछ छिपाना चाहती है? चूंकि अब यह तथ्य सामने है कि छत्तीसगढ़ एवं राजस्थान की तत्कालीन भाजपा सरकारों ने कोयला खदानों की खुली नीलामी का विरोध किया था, इसलिए ऐसी चर्चाओं को बल मिला है कि संसद में बहस होने पर यूपीए सरकार पर भाजपा का निशाना कमजोर पड़ सकता है।
बहरहाल, बचाव की मुद्रा में जाने को चाहे कांग्रेस मजबूर हो या भाजपा, आम जनभावना यही है कि इस पर संसद में बहस हो, जिससे तमाम तथ्य सामने आएं। टेलीविजन पर लाइव प्रसारण के युग में संसद में पेश होने वाले तथ्य एवं तर्क लोगों की राय बनाने में सीधे मददगार होते हैं। लोग देखना चाहते हैं कि आखिर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) ने जिन गड़बड़ियों का जिक्र अपनी रिपोर्टो में किया है, उसकी जड़ें कहां हैं और उन पर अपने बचाव में सरकार को क्या कहना है? सरकार के बचाव की धज्जियां उड़ाने में विपक्ष कितना सक्षम है और उसकी क्या तैयारी है, लोग इसे जानना चाहते हैं। यह तभी हो सकता है जब इस पर संसद में चर्चा हो।
इसलिए आवश्यक है कि संसद को चलने दिया जाए। चूंकि यूपीए सरकार में मनमोहन सिंह के नेतृत्व पर कोई पुनर्विचार नहीं है, इसलिए उनके इस्तीफे तक संसद रोकने की रणनीति से कुछ हासिल नहीं होगा। उल्टे इससे सरकार को अपनी जवाबदेही से बचने का मौका मिलेगा और बहुत से जरूरी विधायी कार्य रुक जाएंगे, जिनका बुरा असर हमारी संकटग्रस्त अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।






