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हौसला अफजाई से हर्ज नहीं

खुशवंत सिंह | Jul 14, 2012, 00:49AM IST
 
 


कभी-कभी तो मैं अपनी ही रचनात्मकता से चकित रह जाता हूं। यहां मैं यह बात अपने लेखन के संदर्भ में कह रहा हूं। मेरी पिछली छह किताबों के विमोचन पर मैंने एक ही घोषणा बार-बार दोहराई है और वह यह है कि यह मेरी आखिरी किताब होगी। जाहिर है यह बात सच साबित नहीं होती और ऐसी हर घोषणा के बाद मेरी एक और किताब छपकर आ जाती है।

सौभाग्य से कई जाने-माने, प्रसिद्ध और वीआईपी यानी अति विशिष्ट व्यक्तियों से मेरी जान-पहचान है और मुझे इसका भी फायदा मिलता है। मैं उन्हें अपनी किताब के विमोचन कार्यक्रम में निमंत्रित करता हूं। मेरी किताब का विमोचन करने वालों में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, अमिताभ बच्चन, जयपुर की महारानी स्वर्गीय गायत्री देवी जैसे नाम शामिल हैं। जाहिर है नामचीन हस्तियों द्वारा किसी किताब का विमोचन करने पर उस किताब को फायदा पहुंचता है।

मुझे याद है जब प्रधानमंत्री की पत्नी श्रीमती गुरशरन कौर ने मेरी किताब ‘हाइम्स ऑफ द गुरुज’ (पेंगुइन से प्रकाशित) का विमोचन किया था तो उसका पहला संस्करण रातोंरात बिक गया था और मुझे उसके प्रचार के लिए एक धेला भी खर्च नहीं करना पड़ा था। यहां तक कि विमोचन कार्यक्रम का खर्च भी होटल ला मेरिडयन की मालिक हरजीत कौर ने वहन किया था। बहरहाल, चाहे आप यकीन करें या न करें, लेकिन मेरी एक और किताब आ रही है। यह मेरे दो साप्ताहिक कॉलम में प्रकाशित हुई सामग्री का संकलन है, जिसे पेंगुइन वाइकिंग की नंदिनी मेहता ने संपादित किया है। उन्होंने इस किताब को नाम दिया है : ‘खुशवंतनामा’।

हालांकि अब मैं इतना बूढ़ा हो चुका हूं कि बाहर होने वाले कार्यक्रमों में नहीं जा सकता। यहां तक कि मुझे एक कमरे से दूसरे कमरे में ले जाने के लिए भी सहारे की जरूरत पड़ती है। फिर भी मैं यह कल्पना करके अपना दिल बहलाता हूं कि शायद अपनी अगली किताब के विमोचन में स्ट्रेचर पर पहुंचूंगा। वह वाकई एक दिलचस्प नजारा होगा। इस तरह के विमोचन कार्यक्रम लेखक का हौसला बढ़ाने वाले होते हैं और मुझे उम्र के इस मोड़ पर भी हौसला अफजाई से किसी तरह का कोई परहेज नहीं है।

.......................पुलिस और कविता :

राजबीर देसवाल हरियाणा के पुलिस प्रमुख हैं। एक पुलिस अधिकारी के रूप में जहां वे राज्य में कानून-व्यवस्था बनाए रखने का काम करते हैं, वहीं कवि और लेखक भी हैं। मैं इससे पहले भी उनके बारे में लिख चुका हूं। उनकी पहली किताब हरियाणवी ह्यूमर के बारे में थी। हालांकि पंजाबी चुटकुलों से उनकी तुलना नहीं की जा सकती। मैंने एक लंबे अरसे से कोई नया हरियाणवी लतीफा नहीं सुना, जबकि पंजाबी चुटकुले एक के बाद एक सामने आते ही रहते हैं। हाल ही में मुझे एक लेटेस्ट पंजाबी चुटकुला सुनने का मौका मिला। यह चुटकुला मुझे प्रतिष्ठित वकील और ‘पद्मविभूषण’ से सम्मानित फली नरीमन ने भेजा था। उन्होंने सुझाया कि अगर मुंबई के पहले हवाई अड्डे का नाम सांता क्रुज है तो दूसरे हवाई अड्डे का नाम ‘बंता क्रुज’ रखा जाना चाहिए।

बहरहाल, राजबीर के खजाने में हरियाणवी ह्यूमर के अलावा भी बहुत कुछ है। वे देश के अनेक प्रतिष्ठित अंग्रेजी दैनिक अखबारों के लिए कॉलम लिखते हैं। उनके कॉलम के संकलनों की एक किताब छपी है, जिसका शीर्षक है : ‘होलीपोल : डीकेज बुक्स फॉर ऑल’। यह बहुत ही रोचक और पठनीय किताब है और हरियाणवी ठसक को पसंद करने वाले पाठकों को यह निराश नहीं करेगी। उनकी नई किताब उनकी विभिन्न गजलों का संग्रह है। ......................

बंदर और लंगूर :

बंदर अद्भुत जीव होते हैं। मैंने एक बार की गर्मियां कसौली में बिताई थीं। मैं शाम को बरामदे में बैठा रहता था। ठीक सामने एक बगीचा था। अपराह्न् को जैसे ही बगीचा धूप में नहा जाता, ३क्-४क् की तादाद में बंदर वहां चले आते। वे एक-दूसरे के साथ खेलते रहते, लड़ते-झगड़ते और एक-दूसरे को काटते रहते। कभी-कभी उनमें से कोई एक मेरे पास चला आता और इस तरह दांत दिखाता मानो मुझसे पूछ रहा हो : ‘तुम यहां क्या कर रहे हो?’ मैं डंडा उठा लेता, जो हमेशा मेरे साथ रहता था।

मैं उन्हें जवाब देता : ‘मैं तो चुप रहूंगा, लेकिन मेरा डंडा तुम्हें जरूर बता देगा कि मैं यहां क्या कर रहा हूं।’ मैं डंडा लहराता और वे तितर-बितर हो जाते। लेकिन बरामदे में बैठकर बंदरों को निहारने का क्रम जारी रहता। आज भी बंदरों के प्रति मेरे मन में उत्साह कम नहीं हुआ है। जब भी टीवी पर बंदरों से संबंधित कोई कार्यक्रम आता है तो मैं उसके सामने डटकर बैठ जाता हूं। बंदर आमतौर पर पालतू जानवर नहीं होते, लेकिन वे बहुत अच्छे पेट्स साबित हो सकते हैं।

एक बार मेरे माली को बंदर का एक छोटा-सा बच्चा मिला, जिसे उसकी मां छोड़ गई थी। वह उसे उठा लाया। धीरे-धीरे बंदर के बच्चे का माली से बहुत लगाव हो गया। वह माली की गर्दन के इर्द-गिर्द अपनी बांहें डाल देता और उससे चिपका रहता। रात को वह उसकी गोद में ही सोता था। हालांकि बगीचे में बंदरों के अनेक झुंड आते थे, लेकिन वह बंदरों के साथ जाने के बजाय माली के परिवार के साथ रहना ही पसंद करता था।

एक समय था जब मुझे बंदरों के बारे में बहुत जानकारी हुआ करती थी। तब मुझे यह भी पता होता था कि कुछ बंदरों के चेहरे लाल और कुछ के काले क्यों होते हैं, लेकिन अब मैं यह भूल गया हूं। यदि किसी पाठक को पता हो तो वह मुझे बता सकता है। मैं उसका शुक्रगुजार रहूंगा। लंगूर बंदरों से बड़े और अधिक ताकतवर होते हैं, लेकिन वे बंदरों की तुलना में अधिक भद्र भी होते हैं। बंदर लंगूरों से भयभीत रहते हैं और जैसे वे किसी लंगूर को देखते हैं, फौरन वहां से रफूचक्कर हो जाते हैं।

 

लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं।

 
 
 

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