संपादकीय.. 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में गृह मंत्री पी चिदंबरम के निचली अदालत से बरी हो जाने के महत्वपूर्ण निहितार्थ हैं। इससे फिलहाल राजनीतिक अस्थिरता पर विराम लगेगा। अगर न्यायाधीश ओपी सैनी इस निष्कर्ष पर पहुंचते कि इस घोटाले में चिदंबरम की भूमिका संदिग्ध है, तो सामूहिक जवाबदेही के सिद्धांत के तहत उसकी आंच प्रधानमंत्री तक भी पहुंचती।
इसका दूसरा संदेश यह है कि कानून एवं राजनीति को अलग रखकर देखा जाना चाहिए। अदालतें फैसला आम धारणा से प्रभावित होकर नहीं, बल्कि अकाट्य साक्ष्यों के आधार पर लेती हैं। सुप्रीम कोर्ट के सामने इस बात के सबूत थे कि 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन में घोटाला हुआ, तो उसने उसके तहत दिए गए 122 लाइसेंसों को रद्द कर दिया।
ओपी सैनी की अदालत इस नतीजे पर थी कि इस घोटाले को अंजाम देने में चिदंबरम की कोई आपराधिक भूमिका नहीं है, तो उसने उन्हें बरी कर दिया है। सभी पक्षों को इन दोनों फैसलों को सम्मान से स्वीकारना चाहिए। याचिकाकर्ता सुब्राण्यम स्वामी ने दो आधार पर चिदंबरम के खिलाफ जांच की अपील की थी।
पहला यह कि स्पेक्ट्रम का आवंटन 2001 के मूल्य के आधार पर करने के फैसले में बतौर तत्कालीन वित्त मंत्री चिदंबरम शामिल थे और फिर दो कंपनियों स्वान और यूनिटेक को स्पेक्ट्रम हासिल करने के तुरंत बाद अपने शेयर बेचने की अनुमति देने को उन्होंने हरी झंडी दी थी। लेकिन अदालत में यह प्रमाणित नहीं हो सका कि इन फैसलों के पीछे मकसद दूरसंचार नीति को भ्रष्ट करना और खुद अथवा किसी अन्य को धन संबंधी लाभ पहुंचाना
था।
इसके बावजूद विपक्ष को यह मानने का अधिकार है कि चिदंबरम के बरी होने से यूपीए सरकार की भ्रष्ट छवि नहीं मिटती। लेकिन सरकार को सामूहिक जवाबदेही के तर्क से घेरने के उचित मंच अन्यत्र हैं। अदालतें ऐसे व्यापक एवं मनोगत तर्को के आधार पर मामलों का निपटारा नहीं कर सकतीं। भारतीय न्यायपालिका की ऊंची प्रतिष्ठा इसीलिए है कि वह अपने को राजनीतिक बहसों से ऊपर रखती है। 2जी घोटाले में एक हफ्ते के अंदर दो बार विभिन्न स्तरों पर न्यायालयों ने इसकी पुष्टि की है।