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करीब आने की कवायद और मतदाता का गणित

 
Source: एम.जे. अकबर   |   Last Updated 00:09(22/01/12)
 
 
 
 
दक्षिण एशिया की राजनीतिक शैली में किससे निबटना ज्यादा कठिन है : लगाव या फिर रोष? शारीरिक संदर्भ में कहें, तो लगाव से। लोकप्रिय समर्थन के किसी भी प्रदर्शन का प्रमुख मूल भाव ठेल-धकेल ही होता है। फिर चाहे इस्लामाबाद में यूसुफ गिलानी सुप्रीम कोर्ट की अपनी राह पर हों या लखनऊ में मुलायम सिंह यादव विधानसभा की ओर बढ़ने की कोशिश कर रहे हों, समर्थक खुद को अपने नेताओं के हरसंभव करीब जाकर उनके शरीर की गर्मजोशी का एहसास करने का अधिकारी मानते हैं।

सर्वशक्तिमान कैमरे के इस युग में कई बार इस तरह के प्रदर्शनों का लेना-देना नेता से प्यार की बजाय, कैमरे के प्रति प्यार से ज्यादा हो सकता है। हमारे लोकतंत्रों को अमलीजामा पहनाने वाले विशाल जनसमूहों के लिए पर्दे पर आने का यही एकमात्र गंभीर मौका हो सकता है। दूसरा विकल्प क्रिकेट मैचों के दौरान मम्मी की तारीफ करते बैनर उठाना है, लेकिन इसमें पैसा खर्च होता है। जनता का जीवन मुफ्त है।

लेकिन हम ऐसे नेताओं के साथ साफ तौर पर असहज हो जाते हैं, जो स्पर्श के प्रति गर्मजोशी नहीं रखते। भले ही आचरण नहीं, पर आप बर्ताव में अंतर तो पहचान ही सकते हैं। गिलानी गर्मजोश हैं, पर उनके बॉस आसिफ जरदारी ठंडे हैं। लखनऊ में मुलायम सिंह स्पष्ट रूप से गर्मजोशी भरे हैं, पर क्या उन्हें नापसंद मायावती रूखी और उदासीन हैं? मैं तो कहूंगा कि नहीं।


मायावती एक तीसरी श्रेणी से आती हैं, वह जो कई रंगों में सामने आती है। वे तो न्यारी हैं। जाहिर है, महिला नेत्रियों को धक्का-मुक्की से दिक्कत होती है और पुरुष भी ज्यादा करीब जाने का साहस नहीं कर पाते। परंतु इंदिरा गांधी और बेनजीर भुट्टो अपने चाहने वालों से एक इंच का भी फासला त्यागे बगैर गर्मजोश राजनेत्रियां थीं। मायावती साफ तौर पर नजर आने वाली व्यक्त्विगत अभिजातता का पालन करती हैं, जो उनके और अनुगामियों के बीच एक छाया पुल गढ़ता है। आप उनकी अनुमति से ही इस पुल को पार कर सकते हैं।

ऐसा अक्सर नहीं होता कि आप मायावती की तुलना अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा या सच कहें, तो उनके लिए संभावित रिपब्लिकन चुनौती बनने जा रहे मिट रोम्नी से होते देखें। ये तीनों ही ‘निराले’ हैं, हालांकि बिल्कुल अलग-अलग कारणों से।


ओबामा के आलोचक उनके स्पष्ट दिखाई देने वाले श्रेष्ठता भाव को उन लोगों पर बौद्धिक व्यंग्योक्ति कहते हैं, जिन्होंने उन्होंने कुर्सी तक पहुंचाया। पर कम से कम रोम्नी इस विषय को नहीं उठाने वाले हैं। अगर ओबामा ऊंचे मंच के डॉन हैं, तो फिर रोम्नी बोर्डरूम बिलियनेयर हैं, जो महज अर्जित वेतन पर गुजारा करने वालों के लिए एक हल्की सी अवमानना और अवहेलना दिखाते हैं।

पूंजीवाद में चरम उपलब्धि बिना कमाई गई आय होती है, जो कई तरह के लाभांश से मिलती है। यह रोम्नी की वर्तमान संपदा का स्रोत है और यही कारण है कि क्यों वे अपने टैक्स रिटर्न्‍स सार्वजनिक करने के अनिच्छुक हैं। बेशक, उपमहाद्वीप में हमने परिश्रम से न अर्जित की गई आय को एक सर्वथा नया अर्थ दे दिया है : अघोषित नकदी।

रंग-बिरंगी प्रकृति होने के चलते हमने अलग-अलग ब्रांड बनाए हैं : पसीना बहाने वाले ईमानदारी कर्मचारी के पास सफेद धन होता है, निर्लज्ज और बेपरवाह भ्रष्ट के पास काला। बहरहाल, मायावती ने रवानगी का शानदार चक्र खोज निकाला है। वे बगैर श्रम के अर्जित आय पर टैक्स देती हैं। आइए, उन्हें बधाई दें। यह उन्हें बड़े सुंदर ढंग से उन लोगों से अलग करता है, जो अपनी नकदी को जवाबदेही की चिंता के बगैर गुप्त कोषों में रखते हैं।

दक्षिण एशियाई मतदाता के जयगान के लिए जरा रुकें, जो बैलेंस शीट के भीतर परिसंपत्तियों व जवाबदेहियों पर जूझने से पहले सूक्ष्म संतुलन पर वास्तविकताओं की जटिलता की परख करने के लिए पर्याप्त परिपक्व है। पास पहुंचने के लिए उसकी धक्का-मुक्की वोट की गारंटी नहीं है। अगर उसका फैसला उसे बताए कि बेहतर मूल्यांकन भावनाओं के बाहर स्थित होता है, तो वह उदासीन, यहां तक कि ठंडे के साथ भी जा सकता है।

यदि गज साम्राज्ञी, मायावती आर्थिक विकास की पेशकश करती हैं, तो उन्हें सहमति मिलती है। यदि साइकिल सम्राट, मुलायम संवेदनशीलता और गर्मजोशी के फायदों को लेकर वोटर को विश्वास दिलाते हैं, तो उनकी बारी आएगी। द. एशियाई बड़ी बेफिक्री से भावनाएं बरसा सकते हैं, लेकिन वे यह भी अच्छी तरह जानते हैं कि धार कब खुद की हार में बदल जाती है। सोनिया गांधी गर्मजोशी से भरपूर राजनेता नहीं हैं, लेकिन यह बात उनकी चुनावी जीतों के आड़े नहीं आई है।

राहुल गांधी प्रचार अभियान की राह में अपनी छवि को चमकाने के लिए काफी कोशिश कर रहे हैं, लेकिन तनाव साफ नजर आता है। उनकी कोशिश पर कुछ सराहना और कुछ मनोरंजन के साथ गौर किया जा रहा है, लेकिन मतदान के दिन निर्णय बिलकुल अलग वातावरणीय सोच-विचार और कारणों से नियंत्रित होगा।

डॉ. मनमोहन सिंह मिजाज में बेपरवाह और उदासीन-से हैं, लेकिन वे विश्वसनीय हैं। वे रूखे हुए बगैर बौद्धिक हैं और कुछ और होने के जतन भी नहीं करते। वे जानते हैं कि मतदाता के साथ उनकी ‘अरेंज मैरिज’ हुई है और वे इसके लाभों और सीमाओं को समझते हैं।

पर उनके लिए एक गंभीर समस्या है : उनके माहौल में भ्रष्टाचार की दरुगध परोक्ष रूप से उनकी साख पर छाने लगी है। शेक्सपियर ने हर बात पर कुछ न कुछ बात कही है। अपने एक सोनेट में वे कहते हैं, ‘सड़न की बदबू छोड़ने वाली कुमुदनियां खरपतार से कहीं ज्यादा बदतर होती हैं।’ इस दरुगध का नाश करने के लिए उनके पास वक्त है। उन्हें जोर डालना चाहिए कि प्रस्तावित लोकपाल बिल के तहत प्रधानमंत्रियों और राष्ट्रपतियों को बिना किसी प्रतिबंध के लाना चाहिए।

यदि इस पर पाक में स्पष्टता रही होती और कोई राष्ट्रपति विदेशी बैंक खातों सरीखे मुद्दों पर पुलिस के प्रति जवाबदेह रहा होता, तो पिछले गुरुवार सुप्रीम कोर्ट की राह पर प्रधानमंत्री गिलानी के करीब आने की होड़ नहीं मचती। पड़ोसी के पास सबक हैं कि दिल्ली को सीखने की अक्लमंदी रखनी चाहिए। -लेखक द संडे गार्जियन के संपादक और इंडिया टुडे के एडिटोरियल डायरेक्टर हैं।
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
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