पुत्र को पिता से मिली स्नेह भरी सीख
Bhaskar News
| Dec 26, 2012, 00:12AM IST
कई वर्ष पूर्व एक युवक विदेश में अध्ययन के लिए गया। उसके पिता भारत में थे और काफी संपन्न थे। अपने पुत्र को बैरिस्टर बनाने की चाह में उन्होंने उसे विदेश पढ़ने के लिए भेजा था। पुत्र के हृदय में अपने पिता के लिए बहुत आदर था और पिता भी पुत्र को अत्यधिक स्नेह करते थे।
एक दिन उस युवक के पास पिता का पत्र आया। उसमें लिखा था कि तुम्हें मैं जो पैसा भेजता हूं, उसे किन-किन मदों पर व्यय करते हो। इसका पूरा हिसाब मुझे भेजा करो। यह बात पढ़कर युवक को ठेस लगी। उसने सोचा कि पिता मुझ पर विश्वास नहीं करते हैं, इसी कारण हिसाब मांग रहे हैं।
वह काफी देर तक इस बात पर विचार करता रहा और अंत में उसने तय किया कि पिताजी को लिख दूं कि यदि आपको मुझ पर विश्वास नहीं है तो भविष्य में मुझे पैसा न भेजें। मैं अपनी कुछ व्यवस्था कर लूंगा, अन्यथा भारत लौट आऊंगा।
हालांकि वह जानता था कि इससे पिता को दुख पहुंचेगा, किंतु स्वाभिमान के वशीभूत हो उसने पिता को पत्र लिख दिया। पिता बड़े समझदार थे। उन्होंने दुखी होने के स्थान पर अपने स्वाभिमानी पुत्र पर गर्व किया और अगले पत्र में लिखा कि उनका इरादा उसके स्वाभिमान को ठेस पहुंचाने का नहीं था। केवल यह जानना था कि इतना व्यय कैसे हो जाता है, ताकि पुत्र के लिए हमेशा उसकी व्यवस्था करें। पिता की वात्सल्य भरी चिट्ठी ने पुत्र के मन का क्षोभ दूर कर दिया।
ये युवक थे- पं. जवाहरलाल नेहरू और पिता पं. मोतीलाल नेहरू। दरअसल युवावस्था आवेशी होती है। अत: निर्णय में विवेक कम, व्यग्रता अधिक दिखाई देती है। ऐसे में अभिभावकों का परिपक्व और स्नेह से भरा मार्गदर्शन आवश्यक होता है।






