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टैक्स वसूली की उलझनें

Bhaskar news | Mar 06, 2013, 01:45AM IST
 
 

जिस  बजट में वित्त मंत्री का पूरा ध्यान देशी और विदेशी निवेशकों को लुभाने पर था, उसके कर मूल्यांकन एवं वसूली संबंधी नए प्रावधानों ने जायका बिगाड़ दिया। उनमें से एक पर सफाई देकर पी. चिदंबरम उसे निष्प्रभावी बना चुके हैं।
 
अब सवाल है कि क्या बीते वर्ष की तरह इस बार भी उन्हें कर चोरी के खिलाफ किए गए सख्त प्रावधानों को वापस लेना पड़ेगा? स्पष्टीकरण उन्होंने मॉरीशस रूट से आने वाले विदेशी निवेश पर दिया है, जिसका निहितार्थ यह है कि ऐसे मामलों में कर छूट पहले की तरह जारी रहेगी। इसके अलावा वित्त मंत्री ने 50 लाख रुपए से अधिक के उत्पाद शुल्क की चोरी को गैर-जमानती अपराध बनाने, सर्विस टैक्स न चुकाने पर गिरफ्तारी तथा ऐसे कई सख्त प्रावधान बजट में किए हैं।
 
पिछले साल तत्कालीन वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने भी अपने बजट में कर वसूली में सख्ती का इरादा दिखाया था, मगर उस पर मची हाय-तौबा और संसद में विरोध के बाद उन्हें अपने कदम वापस खींचने पड़े। स्पष्टत: यह प्रश्न सरकार की एक बड़ी उलझन बन चुका है। कर-वंचना एक वास्तविक समस्या है। टैक्स चोरी न हो, यह उचित अपेक्षा है। खासकर जब सरकार अपने राजकोष की सेहत को बहाल करने की जद्दोजहद में है, तब अधिक से अधिक कर वसूली की उसकी चिंता को समझा जा सकता है। चालू वित्त वर्ष में कर वसूली का लक्ष्य करीब 30 हजार करोड़ रुपए पीछे रह गया है।
 
मगर मुश्किल यह है कि कर देने वाले तबके संपन्न और सक्षम हैं। सरकार उनके विरोध के आगे देर तक टिक नहीं पाती। वैसे करदाता समूहों की इस शिकायत में दम है कि अगर सरकार का मकसद कर चोरी रोकना है, तो सख्त उपायों से इसमें ज्यादा कामयाबी नहीं मिलती। इसलिए कि अक्सर कठोर प्रावधानों को अधिकारी अपनी आमदनी बढ़ाने का जरिया बना लेते हैं। अपील की व्यवस्था इतनी लचर और लेट-लतीफ है कि सरकारी विभागों की ज्यादती से इंसाफ पाना आम नागरिक के लिए दुरूह साबित होता है। यानी टैक्स वसूली के मामले में सख्त व्यवस्था अक्सर विपरीत परिणाम देने लगती है। जाहिर है, समस्या जितनी कठिन है, हल उससे भी मुश्किल है। लेकिन सरकार को देर-सबेर यह समाधान ढूंढ़ना ही होगा।  
 

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