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रिजर्व बैंक का सख्त रुख

Bhaskar News | Nov 01, 2012, 00:13AM IST
 
 

केंद्रीय वित्त मंत्री पी. चिदंबरम की मायूसी जायज है। जब सरकार निवेश बढ़ाकर अर्थव्यवस्था की विकास दर को गति देने की कोशिश में है, निवेशकों को सस्ता कर्ज उपलब्ध कराना उसकी स्वाभाविक प्राथमिकता है।
 
इसीलिए भारतीय रिजर्व बैंक के अपनी नई मौद्रिक नीति का एलान करने से एक दिन पहले चिदंबरम ने राजकोषीय सेहत सुधारने का अपना रोडमैप पेश किया। उनका खास संदेश रिजर्व बैंक के लिए ही था, जो राजकोषीय घाटा कम करने की वकालत करता रहा है।
 
बैंक ने अतीत में जो उपाय सुझाए, उनका पालन करते हुए हाल में सरकार ने पेट्रोलियम पर सब्सिडी घटाई और कई क्षेत्रों में विदेशी निवेश का रास्ता साफ किया। इसलिए सरकार को उम्मीद होगी कि इस बार रिजर्व बैंक ब्याज दरों में कटौती करेगा, ताकि निवेशक कर्ज लेकर निवेश करने के लिए प्रेरित हों। मगर रिजर्व बैंक ने सरकार की मंशा पूरी नहीं की।
 
उसके बाद चिदंबरम ने यह मायूसी भरी टिप्पणी की कि विकास दर बढ़ाने की चुनौती का सामना सरकार को अकेले ही करना होगा। यह बड़ी विडंबना है। सवाल है कि देश की आर्थिक दिशा तय करना सरकार का दायित्व है या रिजर्व बैंक का? हाल के महीनों में सरकार ने लगातार ब्याज दरों में कटौती की वकालत की है। मगर रिजर्व बैंक की दलील है कि महंगाई अर्थव्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती है।
 
जब तक यह काबू में नहीं आती, वह मौद्रिक रियायत देकर मुद्रास्फीति और बढ़ने में सहायक नहीं बन सकता। इस तरह देश महंगाई बनाम विकास दर बनाम राजकोषीय घाटे की एक दुश्चक्र-सी दिखने वाली बहस में फंस गया है। जानकार कहते हैं कि आर्थिक संकट के समय ऐसी उलझनें हालात को और बिगाड़ने का काम करती हैं। मंदी के समय रोजगार बढ़ाने के साथ कर राजस्व बढ़ाने के लिए भी आवश्यक है कि निवेश बढ़े। मगर रिजर्व बैंक रूढ़िवादी वित्तीय नजरिये के साथ चल रहा है।
 
फिलहाल बैंक ने ब्याज दरों में कोई परिवर्तन नहीं किया है। उसने सिर्फ इतनी रियायत बरती कि कैश रिजर्व रेशियो में 25 आधार अंकों की कटौती कर दी, जिससे बैंकों के पास कर्ज देने के लिए अधिक रकम उपलब्ध हो जाएगी। मगर इससे निवेशकों एवं संकटग्रस्त अर्थव्यवस्था की उम्मीदें पूरी नहीं हुई हैं।
 
 
 

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