खाद्य सुरक्षा : वाजिब चिंताएं
Source: Bhaskar News | Last Updated 00:25(10/02/12)
शरद पवार ने प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा कानून को लागू करने के रास्ते में मौजूद मुश्किलों की एक ठोस तस्वीर पेश की है। उन्होंने कहा कि अब यह सुनिश्चित करने का वक्त आ गया है कि देश के हर नागरिक को दो वक्त पूरा भोजन मिले। लेकिन इसके लिए कृषि के ढांचे और अनाज वितरण की व्यवस्था में सिरे से बदलाव की जरूरत होगी।
सबको भोजन मिले, इसके लिए अनाज की पैदावार में लगातार वृद्धि जरूरी है। उसके लिए सिंचाई, बिजली, खाद एवं बीज में भारी निवेश की जरूरत पड़ेगी। फिर अनाज के सुरक्षित भंडारण की व्यवस्था करनी होगी।
इसके बाद सार्वजनिक वितरण प्रणाली को दुरुस्त करने की चुनौती है, जिसके जरिए लक्ष्य समूहों तक अनाज पहुंचाया जाएगा। पवार की इस बात से कौन असहमत होगा कि आज कृषि मंडियों, राज्य सरकारों की खाद्य संबंधी एजेंसियों, उनकी कर्मचारी क्षमता, पीडीएस निरीक्षण तंत्र की गुणवत्ता एवं भंडारण की व्यवस्थाएं नाकाफी हैं।
इनमें सुधार की चुनौती जितनी बड़ी है, अगर केंद्र एवं राज्य सरकारों ने उसी के अनुरूप गंभीरता नहीं दिखाई तो सबको खाद्य सुरक्षा देना महज सपना ही रह जाएगा। इन सब कार्यो के लिए धन चाहिए। राज्यों के कृषि एवं खाद्य मंत्रियों के उसी सम्मेलन में जहां पवार ने ये बेलाग बातें कहीं, प्रणब मुखर्जी ने बेहिचक यह बयान दिया कि राजकोष पर सब्सिडी के बढ़ते बोझ से उनकी नींद उड़ रही है।
अर्थव्यवस्था में गिरावट के साथ कर वसूली के घटते अनुमानों के बीच वित्त मंत्री का फिक्रमंद होना अस्वाभाविक नहीं है। खाद्य सुरक्षा कानून को लागू करने पर खाद्य सब्सिडी में 30 हजार करोड़ रुपए से भी ज्यादा की बढ़ोतरी का अनुमान है।
अगर उसके साथ उन तमाम पहलुओं को जोड़ा जाए, जिन्हें कृषि मंत्री ने इस कानून की सफलता के लिए जरूरी बताया है, तो यह खर्च इससे काफी ज्यादा हो सकता है। स्पष्ट है, सबको खाद्य सुरक्षा देना एक ऐसा सपना है, जिसे साकार करना कठिन चुनौतियों से भरा है। कांग्रेस पार्टी के इस वादे और उस पर अमल की राह में मौजूद सीमाओं के बीच संतुलन बैठाना मनमोहन सिंह सरकार के लिए दुरूह साबित हो रहा है।