संपादकीय.. इंसाफ में इतनी देर हो कि अंधेर का अंदेशा होने लगे, तो असंतोष का गहराना स्वाभाविक ही है। जम्मू-कश्मीर के पथरीबल मुठभेड़ कांड पर जाहिर हुई सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी सेना के टालमटोल वाले रवैये का परिणाम है। सर्वोच्च न्यायालय ने अब साफ कर दिया है कि मामला लटकाने की हद हो चुकी है।
न्यायमूर्ति इस पर खफा थे कि सेना न तो आठ आरोपी अधिकारियों का कोर्ट मार्शल कर रही है, न ही सीबीआई को उन पर आपराधिक मामला चलाने की इजाजत दी है। जजों ने बेलाग कहा कि अब यह बर्दाश्त नहीं है। मामला वर्ष 2000 का है, जब चित्तिसिंहपुरा में 35 सिखों की हत्या कर दी गई थी। उसके पांच दिन बाद सेना ने उस हत्याकांड के पांच दोषियों को मुठभेड़ में मार गिराने का दावा किया। लेकिन इस मुठभेड़ के फर्जी होने का आरोप लगा। तब मृत लोगों की लाशें कब्र से निकालकर उनकी फॉरेंसिक और डीएनए जांच भी हुई।
जांच का निष्कर्ष रहा कि वे पांचों लोग लश्कर-ए-तैयबा के आतंकवादी नहीं, बल्कि निदरेष नागरिक थे। बाद में सीबीआई ने मामले में चार्जशीट दायर की। मगर चूंकि जम्मू-कश्मीर में सशस्त्र बल विशेष अधिकार कानून लागू है, अत: सेना ने अपने अफसरों को उसकी सुरक्षा देते हुए यह दावा किया कि चार्जशीट दाखिल करने के पहले सीबीआई को अनुमति लेनी चाहिए थी। सुप्रीम कोर्ट उसी आदेश के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई कर रहा है, जहां सीबीआई ने आरोप लगाया कि सेना इस मामले को दफना देने की कोशिश कर रही है।
गौरतलब है कि सभी आरोपी अभी भी सेना की सेवा में हैं। उनमें से किसी की गिरफ्तारी नहीं हुई। यह घटनाक्रम जम्मू-कश्मीर में लोगों के असंतोष के प्रमुख कारणों में रहा है, बल्कि पूरे देश में सुरक्षा बलों की जवाबदेही तय करने के संदर्भ में इसे एक टेस्ट केस के रूप में देखा गया है। संतोष की बात है कि आम लोगों का असंतोष अब माननीय न्यायमूर्तियों के माध्यम से व्यक्त हुआ है। अगर यह मामला न्यायिक परिणति तक पहुंचता है, तो उससे भारतीय राज्य-व्यवस्था का नैतिक बल मजबूत होगा।