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भारतीय क्रिकेट के नवाब

 
Source: राजदीप सरदेसाई   |   Last Updated 00:37(26/09/11)
 
 
 
 
यह विडंबनापूर्ण ही है कि जब टाइगर पटौदी की मृत्यु की खबर आई, तब क्रिकेट के एक और जलसे की शुरुआत हो रही थी। चैंपियंस लीग टी-20 का शुभारंभ समारोह नए दौर के अनुरूप था : एक कोलाहलपूर्ण मंचसम्मत तमाशा। यदि पटौदी यह जलसा देख रहे होते तो बहुत संभव है कि वे टीवी बंद कर देते। नवाब मंसूर अली खान पटौदी की दुनिया जहानत और नजाकत की दुनिया थी।


वे उस दौर के सुपर सितारे थे, जब टीवी चैनलों का उदय भी नहीं हुआ था। वे ऐसे स्टाइल आइकन थे, जिन्हें कभी रैम्प पर कवायद करने की जरूरत महसूस नहीं हुई। वे ऐसे नवाब थे, जिन्होंने कभी अपनी वंशावली का विज्ञापन नहीं किया। आतुर शावकों के परिदृश्य पर छा जाने से बहुत पहले वे सही मायनों में एक टाइगरञ्ज थे।



एक अर्थ में पटौदी 1960 के दशक के रोमानी स्वप्नों के प्रतीक भी थे। उदात्त पुरुषों और मोहक महिलाओं की वह पीढ़ी नेहरूवादी आदर्शो के प्रति आसक्त थी। यदि इसी दौर में अभिनेता शम्मी कपूर ने अपने अदम्य आवेग से हिंदी सिनेमा को नए सिरे से परिभाषित किया तो पटौदी ने अपने आकर्षक व्यक्तित्व से भारतीय क्रिकेट का चेहरा बदल दिया। उन्होंने क्रिकेट के खेल को एक ‘स्टार वेल्यू’ दी। उन्होंने भारतीय क्रिकेट को आक्रामकता की देहभाषा दी, जो औपनिवेशिक बेड़ियों से मुक्त होने को तत्पर एक राष्ट्र की भावनाओं के अनुरूप थी।


किन्हीं अर्थो में यह एक अनोखी बात ही थी कि भारतीय क्रिकेट में नई क्रांति का सूत्रपात करने वाली ‘जनतांत्रिक’ लहर की कमान पटौदी के हाथ में थी। आखिरकार वे एक छोटी-सी रियासत के नवाब थे और उन्होंने विंचेस्टर और ऑक्सफोर्ड में तालीम हासिल की थी। वे अपनी वंश परंपरा के प्रति सचेत थे और जब प्रिवी पर्सेस समाप्त कर दिए गए, तब उन्होंने वर्ष 1971 में इसके विरोध में गुड़गांव से चुनाव भी लड़ा। जब उन्होंने उसी साल अपनी कप्तानी गंवाई और एक ‘आम आदमी’ अजित वाडेकर ने टीम की कमान संभाली तो पहले-पहल उन्होंने वाडेकर के तहत खेलने से इनकार भी कर दिया था।



इसके बावजूद वे, जैसाकि इतिहासकार मुकुल केशवन ने ठीक ही कहा है, एक ‘रिपब्लिकन राजकुमार’ थे। उन्होंने एक ऐसी क्रिकेट टीम का नेतृत्व किया, जिसमें विभिन्न वर्गो से आए खिलाड़ी खेल रहे थे। जब पटौदी परिदृश्य पर उभरे, तब तक भारतीय क्रिकेट का अपने ‘महाराजाओं’ से नाता कलहपूर्ण ही साबित हुआ था।


ऐसे कई अवसर आए थे, जब सामंतशाही ने गुणवत्ता को दरकिनार कर दिया था। इनमें सबसे मशहूर उदाहरण 1936 का है, जब महाराजा ऑफ विजयनगरम ने ‘जननायक’ लाला अमरनाथ को बीच दौरे से ही घर भिजवा दिया था। लेकिन विज्जी के उलट पटौदी को बल्ला संभालना अच्छी तरह आता था और अपनी काबिलियत में इस भरोसे के कारण ही वे देशभर से नई प्रतिभाओं को तलाश सके और उन्हें तराश पाए।


1960 के दशक में पटौदी की सरपरस्ती में भारतीय क्रिकेट टीम ने बहुत ज्यादा मैच तो नहीं जीते, लेकिन यही वह दौर था, जब पहली बार एक वास्तविक गुणतंत्र का विकास हुआ। भारतीय मध्य वर्ग क्रिकेट के मैदान पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराने लगा था और इसमें मुंबई के मैदानों और जिमखानों का अहम योगदान था। पटौदी ने शहरी मध्य वर्ग की नई पौध को आत्मविश्वास दिया और इसके बावजूद कि उस दौर में भारतीय टीम जीतती कम और हारती ज्यादा थी, उन्होंने टीम में लड़ाई का जज्बा पैदा किया। यह पटौदी का ही अंतबरेध था कि उन्होंने स्पिनरों की चौकड़ी बेदी, प्रसन्ना, चंद्रा और वेंकट को प्रस्तुत किया और उन्हें मैच विजेता गेंदबाजों में बदल दिया। यदि वर्ष १९७१ भारतीय क्रिकेट के लिए टर्निग पॉइंट था तो इस कामयाबी की बुनियाद 1960 के दशक में पटौदी के प्रेरणास्पद नेतृत्व में ही रखी गई थी।


पटौदी का बल्लेबाजी रिकॉर्ड बहुत शानदार नहीं था, लेकिन एक आंख की रोशनी गंवा देने के बावजूद वे क्रिकेट खेलते रहे और दुनिया के सबसे तेज गेंदबाजों का सामना करते रहे, यह तथ्य ही कुछ कम उल्लेखनीय नहीं है। अपने एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था : ‘मैंने अपनी एक आंख गंवाई है, लेकिन अपनी महत्वाकांक्षा नहीं खोई।’ उनके शालीन व्यक्तित्व के पीछे एक जुझारू खिलाड़ी था। वे शायद पहले ऐसे भारतीय क्रिकेटर थे, जो फील्डिंग को ‘एंजॉय’ करते थे। परंपरागत रूप से भारतीय क्रिकेट में नवाब और महाराजा केवल बैटिंग करना पसंद करते थे, जबकि फील्डिंग जैसी कवायदें अन्य नश्वर प्राणियों के लिए थीं।


पटौदी ने इस परिपाटी को बदल दिया। वे जीवन के अन्य आयामों में भी एक ट्रेंड सेटर ही साबित हुए। मुल्क के बंटवारे का खामियाजा उनके परिवार को भी भुगतना पड़ा था, लेकिन उन्होंने बंटवारे के दागों को कभी अपने सेकुलर कॉस्मोपोलिटन व्यक्तित्व पर नुमायां नहीं होने दिया। उन्होंने शर्मिला टैगोर से विवाह कर अनेक रूढ़ियों को चुनौती दी। यह खेल और सिनेमा जगत के सितारों का पहला भारतीय गठबंधन था और यकीनन सबसे सफल भी।


लेकिन अपनी तमाम उपलब्धियों के बावजूद वे हमेशा एक संकोची व्यक्ति ही बने रहे। अचरज नहीं कि क्रिकेट से संन्यास लेने के बाद उनका जीवन तनिक अधिक कठिनाईपूर्ण था। शायद नए भारत की तेज गति ने उन्हें विचलित कर दिया था। उन्होंने राजनीति में भी हाथ आजमाने की कोशिश की, लेकिन वे स्पष्टत: चुनावी भागदौड़ के अभ्यस्त नहीं थे। न ही वे कभी क्रिकेट प्रशासकों के विराट अहंकार के साथ सहज हो सके। पटौदी कभी उन अफसरों के सामने झुकने वाले नहीं थे, जो स्क्वेयर कट और लेट कट का फर्क भी नहीं जानते थे।


यदि आईपीएल गवर्निग काउंसिल के साथ उनके क्षणिक संबंध को छोड़ दें तो वे खेल प्रशासन से दूरी ही बनाए रहे। लेकिन वे प्लेयर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष जरूर बने, जो कि नई पीढ़ी के खिलाड़ियों तक पहुंचने का उनका तरीका था। करोड़ों का कांट्रेक्ट करने वाले आज के खिलाड़ी भले ही खुद को किसी एसोसिएशन का मोहताज न मानें, लेकिन यदि आज क्रिकेटर खूब पैसा कमा पा रहे हैं, तो इसका श्रेय पटौदी जैसे व्यक्तियों को ही जाता है।

(लेखक आईबीएन 18 नेटवर्क के एडिटर-इन-चीफ हैं।)
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
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