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सिर्फ अपराध मानकर रेप जैसी घटनाओं का हल न खोजें : आमोद कंठ

आमोद कंठ | Dec 18, 2012, 10:26AM IST
 
 

पूर्व आईपीएस अधिकारी आमोद कंठ कहते हैं कि राष्‍ट्रीय राजधानी दिल्ली में मेडिकल छात्रा से चलती बस में सामूहिक बलात्कार की घटना बहुत शर्मनाक है, खतरनाक है। इसके बारे में पुलिस को ही नहीं, हर किसी को सोचने की जरूरत है। दिल्ली शहर, जहां इतनी बड़ी संख्या में पुलिस बल मौजूद हो, इसके बावजूद शहर में इस तरह की घटना बहुत बड़ी बात है। दिल्ली में 500 से अधिक पुलिस कंट्रोल रूम की गाडिय़ां मौजूद हैं, इतनी संख्या शायद किसी शहर में नहीं है। ऐसा भी नहीं है कि पुलिस काम नहीं करती। एक तरफ इस घटना में महिलाओं की सुरक्षा और उसमें पुलिस की भूमिका का सवाल है, दूसरी तरफ यह सवाल है कि कैसे समाज में हम रह रहे हैं, किन लोगों के बीच हम रह रहे हैं?
 
यह सार्वजनिक वाहनों में यात्रियों की सुरक्षा का भी सवाल है। निजी वाहनों, ऑटो रिक्शा, टैक्सी आदि की तुलना में सार्वजनिक वाहन, मुख्यत: बसें ज्यादा सुरक्षित होनी चाहिए। ये युगल जिस बस में बैठे, वह उसको सुरक्षित समझते हुए बैठे। सार्वजनिक वाहनों में यात्रियों की सुरक्षा पर यह बहुत बड़ा आघात है। सार्वजनिक यातायात से जुड़े लोगों को इस बात पर सोचना चाहिए कि इस शहर में सार्वजनिक यातायात कितना सुरक्षित है क्योंकि तमाम लोग सार्वजनिक यातायात पर भरोसा करते हैं। ये लोग पेशेगत अपराधी नहीं है, लेकिन वे ऐसे लोग हैं जिनके मन में पाशविकता, अपराध की भावना है। उन्होंने यह सोचकर इस घटना को अंजाम दिया कि वे इस घटना को अंजाम देकर निकल जाएंगे।
 
महिला अपराधों के प्रति समाज की उदासीनता इस तरह की घटनाओं का कारण बनती है इसलिए हर किसी को इस पर सोचना होगा। एक पूर्व पुलिस अधिकारी की हैसियत से मेरा
यह मानना है कि समाज अपने अनुसार ही पुलिस पैदा करता है। समाज और पुलिस में बहुत बड़ा फर्क नहीं होता। मैंने पांडिचेरी में काम किया। वहां की पुलिस एक अलग ढंग की थी, जिसमें अरविंदो आश्रम, तमिल कल्चर और फ्रेंच कल्चर का असर था। दिल्ली के समाज में ऐसा कुछ है, जो पुलिस के चरित्र को इस तरह का बनाता है। यहां आम लोगों के सामने भी महिलाएं सुरक्षित नहीं है। इस शहर में महिलाओं के लिए पर्याप्त इज्जत नहीं है। उनको लेकर एक बेरुखी है। महिलाओं को लेकर समाज के आचरण में एक छिछोरापन है। मात्र सख्ती से इसका इलाज नहीं होगा। निश्चित तौर पर पुलिस और समाज को ऐसी घटनाओं के प्रति सख्ती बरतनी चाहिए।
 
महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों को रोकने के लिए जितने तरह के प्रयास और प्रयोग दिल्ली में किए गए, ऐसे अन्यत्र नहीं किए गए। पूरी एक शृंखला है काम करने वालों की, पूरी प्रणाली की। दिल्ली के हर जिले में एक क्राइसिस इंटरवेंशन सेंटर चलता है, जब इस तरह की घटना घटती है तो स्वयंसेवी संस्थाओं के साथ मिलकर पुलिस उसके सभी पहलुओं पर काम शुरू कर देती है। प्रयास संस्था ने भी इसमें अहम भागीदारी की है। दिल्ली में पुलिस के पास ऐसे तमाम उपाय मौजूद हैं, जिनका उपयोग करके महिलाओं को सुरक्षित किया जा सकता है। इसके बावजूद ऐसे अपराध हो जाते हैं। इस पर हम सबको मिलकर सोचना है कि ऐसा क्या करना चाहिए, जिससे इस तरह की घटनाओं पर अंकुश लगे। हमें महिलाओं और बच्‍चों, जिनमें लड़कियां भी शामिल हैं, की सुरक्षा की जिम्‍मेदारी लेनी चाहिए और समाज को अपने विश्वास में लेकर पुलिस को अपनी पूरी सुरक्षा प्रणाली को सक्रिय करना चाहिए। सिविल सोसाइटी के संगठनों से लेकर मीडिया को महिलाओं के प्रति होने वाले अपराधों के खिलाफ जागरूकता फैलाने के लिए अभियान चलाना चाहिए।
 
दिल्ली में ऐसी घटना का घटित होना इसलिए ज्यादा घातक है कि दिल्ली में तैयारियां हैं, संसाधन हैं। तमाम आयोग, संगठन और संस्थाएं यहां से कार्य करती हैं। देश की राजधानी होने की वजह से यहां की पुलिस की जिम्‍मेदारी बढ़ जाती है। यह एक तरफ बेहद आधुनिक है, वहीं दूसरी तरफ यह एक छोटे गांव की तरह भी है, जहां तमाम तरह की खापनुमा पाबंदियां भी हैं। समाज में स्वस्थ स्त्री-पुरुष संबंधों का न होना भी इस तरह की घटनाओं का कारण बनता है। तमाम खुलेपन के बावजूद युवाओं में तरह-तरह की कुंठाएं भी हैं। यह एक विविधता वाला शहर है, इसलिए इसमें हर ढंग की घटनाएं होती हैं। यहां यह स्पष्ट कर देना जरूरी है कि अन्य अपराधों से यौन अपराध भिन्न हैं। इसके पीछे कहीं न कहीं परिवार का संस्कार, परिवेश का संस्कार, संगत की आदतों का असर आदि तमाम कारक होते हैं। इसका किसी वर्ग या क्षेत्र से कोई सीधा संबंध नहीं है। कई बार परिवेश के संस्कार अवसर पाकर इस तरह की घटनाओं को अंजाम देते हैं। चूंकि हमारे यहां कोई मूल्याधारित शिक्षा व्यवस्था नहीं है, इसलिए शिक्षा के बढ़ते प्रसार के बावजूद ऐसी घटनाएं घट जाती हैं। युवा वर्ग को यह समझना पड़ेगा कि लड़के-लड़की में फर्क नहीं है। लड़कियां उतना ही काम कर सकती हैं, जितना पुरुष कर सकते हैं। एक-दूसरे को समझें और स्वस्थ रिश्ते कायम करें। इस तरह की घटनाओं को सिर्फ क्राइम मानकर उनका हल न खोजें, बल्कि सामाजिक और व्यक्तिगत तौर पर इसको गलत मानकर इसका बहिष्कार करें और कहें कि इस तरह की घटना अस्वीकार्य है।
 
(गंगा सहाय मीणा से हुई बातचीत पर आधारित)
 

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