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अभिव्यक्ति की आजादी और रुश्दी

 
Source: मरकडेय काटजू   |   Last Updated 00:13(03/02/12)
 
 
 
 
सलमान रुश्दी प्रकरण ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संबंध में कुछ महत्वपूर्ण सवाल खड़े कर दिए हैं, जिन पर गंभीरतापूर्वक मनन किया जाना चाहिए। मैं इस हालिया विवाद के संदर्भ में पांच बिंदुओं पर अपनी बात कहना चाहूंगा।

पहली बात। हर लोकतांत्रिक व्यवस्था में अभिव्यक्ति की आजादी का अधिकार महत्वपूर्ण है। लोकतंत्र की प्रगति के लिए लिखने, बोलने और अपनी असहमति व्यक्त करने की आजादी जरूरी है। इसके बिना विचारों का विकास नहीं हो सकता। संक्रमण के इस दौर में भारत सहित अन्य विकासशील देश आधुनिक विचारों को आजमा रहे हैं और यह उनके लिए बहुत महत्वपूर्ण है। किंतु चूंकि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, इसलिए उसे यह अनुमति नहीं दी जा सकती कि उसकी स्वायत्तता से सामाजिक ताने-बाने को किसी तरह की क्षति पहुंचे।

इसीलिए भारतीय संविधान की धारा 19 (1)(अ) द्वारा जहां देशवासियों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान की गई है, वहीं 19 (2) में यह भी उल्लेख किया गया है कि धारा 19 (1)(अ) द्वारा प्रदान किए गए अभिव्यक्ति के अधिकार पर राज्य, सार्वजनिक व्यवस्था, भद्रता और नैतिकता के हित में प्रतिबंध भी लगाए जा सकते हैं। सार्वजनिक हित अभिव्यक्ति की आजादी का एक अनिवार्य घटक है। दूसरे शब्दों में इन दोनों के बीच संतुलन साधना बहुत जरूरी है। लेकिन यह संतुलन किस बिंदु पर जाकर साधा जाए, यह जरूर एक महत्वपूर्ण प्रश्न है। मेरा दूसरा बिंदु इसी संबंध में है।


संतुलन किस बिंदु पर साधा जाए, इस संबंध में विचार करते समय किन्हीं अमूर्त धारणाओं के स्थान पर विशिष्ट ऐतिहासिक संदर्भो को ध्यान में रखना होगा। ‘द सैटेनिक वर्सेज’ में सलमान रुश्दी ने परोक्ष रूप से ही सही, लेकिन इस्लाम और हजरत साहब के बारे में कुछ आपत्तिजनक बातें कही थीं। इस तरह के सनसनीवाद से रुश्दी ने लाखों डॉलर्स भले ही कमा लिए हों, लेकिन इससे मुस्लिमों की संवेदनाओं को गहरी क्षति पहुंची।

कुछ लोग रुश्दी को इसलिए महान लेखक मानते हैं, क्योंकि उसने बुकर पुरस्कार जीता है। इस संबंध में मैं यह कहना चाहूंगा कि साहित्य के पुरस्कार अक्सर रहस्यपूर्ण होते हैं। अभी तक लगभग सौ लेखकों को साहित्य का नोबेल पुरस्कार दिया जा चुका है, लेकिन इनमें से अस्सी से ज्यादा लेखकों के नाम भी किसी को याद नहीं होंगे, जबकि कई अन्य महान लेखकों को यह पुरस्कार नहीं दिया गया। इसलिए मेरा मत है कि बुकर पुरस्कार जीतने से ज्यादा कुछ साबित नहीं होता।


तीसरी बात। यह दुखद है कि जयपुर साहित्य समारोह रुश्दी प्रकरण के कारण चर्चाओं में रहा और इस वजह से भारत व विश्व के अन्य लेखकों पर अपेक्षित रूप से चर्चा नहीं हो पाई। उम्मीद थी कि साहित्य समारोह में कबीर, प्रेमचंद, शरत चंद्र, मंटो, काजी नजरुल इस्लाम, गालिब, फैज जैसे भारतीय और डिकेंस, बर्नार्ड शॉ, अपटन सिंक्लेयर, वॉल्ट विटमैन, विक्तोर ह्यूगो, फ्लॉबेर, बाल्जाक, गेटे, शिलर, टॉल्सटाय, दॉस्तोएव्स्की, गोर्की जैसे विदेशी लेखकों पर गंभीर विमर्श होगा। लेकिन इसके स्थान पर सारा ध्यान सलमान रुश्दी प्रकरण पर ही केंद्रित रहा। इस बात को लेकर भी काफी हायतौबा मचाई गई कि अभिव्यक्ति की आजादी को क्षति पहुंचाई जा रही है।

प्रधानमंत्री ने हाल ही में कहा था कि देश के ४२ फीसदी बच्चों का कुपोषित होना राष्ट्रीय शर्म है। पिछले पंद्रह सालों में देश में ढाई लाख किसानों ने आत्महत्या की है। बेरोजगारी की समस्या विकराल होती जा रही है। गरीबी और अभावों का बोलबाला है। महंगाई बढ़ रही है।

शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास जैसी बुनियादी जरूरतों का संकट है, वहीं दूसरी तरफ देश में ऐसे ४९ अरबपति भी हैं, जिनकी संपत्ति डॉलरों में है। अमीर और गरीब के बीच की खाई बहुत चौड़ी हो गई है। क्या साहित्य को इन समस्याओं के बारे में बात नहीं करनी चाहिए या हम केवल रुश्दी महोदय की अभिव्यक्ति की आजादी के बारे में ही बात करते रहेंगे? भारतीय बहुजन के लिए स्वतंत्रता का अर्थ है भूख, अशिक्षा, बेरोजगारी और तमाम तरह की वंचनाओं से स्वतंत्रता, रुश्दी की स्तरहीन किताबें पढ़ना नहीं।

ऐसा नहीं है कि विवाद की लहर पैदा करने वाली सभी किताबें स्तरहीन होती हैं। वोल्तेयर, रूसो, थॉमस पेन जैसे लेखकों की रचनाओं ने अपने समय में सक्रिय हस्तक्षेप किया था, लेकिन ‘मिडनाइट्स चिल्ड्रन’ और ‘द सैटेनिक वर्सेज’ जैसी किताबों की सामाजिक प्रासंगिकता भला क्या है? मैं पहले भी कह चुका हूं कि कई भारतीय आज भी हीनता बोध से ग्रस्त हैं और वे सोचते हैं कि लंदन या न्यूयॉर्क में बैठकर लिखने वाला हर लेखक महान है, जबकि भारत में और खासतौर पर क्षेत्रीय भाषाओं में लिखने वाला हर लेखक उनकी तुलना में दोयम है।

चौथी बात यह कि भारत बहुलताओं का देश है। बड़े पैमाने पर विदेशी और खासतौर पर उत्तर-पश्चिमी प्रवासी भारत आए और यहीं के होकर रह गए। भारत में जाति, धर्म, भाषा और नस्लों की विविधता के कारण हमारे लिए एकमात्र कारगर पद्धति धर्मनिरपेक्षता और सर्वधर्म समभाव ही है, जिसे हमारे संविधान ने भी मान्य किया है।

धर्म आस्था का विषय है, तर्क का नहीं। चूंकि भारत में धर्म आज भी लोगों के जीवन में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है, इसलिए यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर किसी भी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को आहत न किया जाए। रुश्दी की किताब ने मुस्लिमों की धार्मिक भावनाओं को गहरी ठेस पहुंचाई है। ऐसे में यह विचारणीय है कि जयपुर में उन्हें इतना महत्व दिए जाने के पीछे क्या कारण था?

पांचवीं और अंतिम बात यह कि भारत संक्रमण के दौर से गुजर रहा है। वह सामंतवाद से आधुनिक औद्योगिक समाज बनने की ओर अग्रसर है। यूरोप का इतिहास गवाह है कि किसी भी देश के लिए संक्रमण का दौर बड़ा विकट व चुनौतीपूर्ण होता है। भारत बहुत कठिनाई से और अनेक त्याग करने के बाद सामंतवाद के अंधकारपूर्ण युग से बाहर निकल पाया है। क्या उसे पुन: पीछे धकेल दिया जाना चाहिए?

मेरा स्पष्ट मत है कि अभिव्यक्ति की आजादी का प्रयोजन तार्किक और वैज्ञानिक विचारों का प्रसार होना चाहिए, किसी धर्म का अपमान करना नहीं, क्योंकि इसी तरह हम संक्रमण की इस स्थिति का अच्छी तरह सामना कर पाएंगे। -लेखक भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष और सर्वोच्च अदालत के पूर्व न्यायाधीश हैं।
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
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