अभी तक किसी को पता नहीं कि लोकपाल का भविष्य क्या होगा? संसद उसे 22 दिसंबर तक पास कर पाएगी या नहीं? यदि वह पास हो गया तो उसके बाद वह कैसा दिखेगा? वह लोकपाल होगा या धोकपाल होगा या जोकपाल होगा? यदि वह जनलोकपाल जैसा नहीं हुआ तो क्या सरकार और अन्ना टीम में जबर्दस्त मुठभेड़ होगी? क्या जेपी और वीपी सिंह का दौर हम दुबारा देखेंगे?
रविवार को जंतर-मंतर पर हुए जलसे ने नया जलवा जरूर पैदा किया। पहली बार राजनीतिक दलों के नेता अन्ना के मंच पर आए। इसका अर्थ क्या निकला? यही कि अविश्वास जरा घटा। नेताओं और आंदोलनकारियों के बीच जो तू-तू-मैं-मैं चलती रहती थी, उसकी जगह संवाद शुरू हुआ। यहां प्रश्न यह उठता है कि आंदोलनकारियों और नेताओं का एक मंच पर इकट्ठा होना क्या संसद का अपमान है? मैं तो समझता हूं कि यह संसद का सम्मान है। उसका सम्मान भी है और उसकी सहायता भी है।
जंतर-मंतर पर खड़े होकर वक्तागण कोई कानून तो नहीं बना रहे थे। उनके भाषणों के कारण क्या कोई विधेयक अपने आप कानून बन सकता है? नहीं! तो यह कहना बिल्कुल भी तर्कसंगत नहीं है कि अब संसद में नहीं, कानून सड़क पर बनाने की कोशिश है या यह अराजकता की शुरुआत है। वास्तव में जंतर-मंतर की खुली बहस से संसद को कानून बनाने में बड़ी सहायता मिलेगी। जो काम किसी भी सरकार को कानून बनाने के पहले करना चाहिए, वह अन्ना टीम ने कर दिया। सरकार को अन्ना टीम का आभारी होना चाहिए।
जंतर-मंतर की सभा में सिर्फ आठ दल गए। सभी क्यों नहीं गए? उनके अपने-अपने कारण हो सकते हैं, लेकिन कांग्रेस का नहीं जाना सबसे ज्यादा खटका। कांग्रेस को तो सबसे पहले पहुंचना था और सबसे ज्यादा बोलना था। अपनी बात टीवी चैनलों के माध्यम से करोड़ों भारतवासियों तक पहुंचानी थी। अगर राहुल जाते तो बड़ा समां बंधता।
यदि लोग उन्हें ‘हूट’ करते तो सारा देश वह दृश्य देखता। राहुल जाते तो सैकड़ों-हजारों कांग्रेसी कार्यकर्ता भी सभा में जाते। उनके कारण भी कुछ लिहाज-मुरव्वत होती। डॉ. अभिषेक सिंघवी जाते तो वे शायद सारी बाजी ही सरकार और कांग्रेस के लिए पलटा देते, लेकिन कांग्रेस का दुर्भाग्य है कि उसका आत्मविश्वास डिग गया है। उसमें न तो कोई नेता दिखाई पड़ता है और न ही नीति! उसे राजनीतिक लकवा हो गया है।
जंतर-मंतर पर विपक्षी दलों के एकजुट हो जाने के कारण अब उसे बिस्तर पर लेट जाना होगा। अब कांग्रेसी-लोकपाल को अन्ना के लोकपाल के आगे साष्टांग दंडवत करना पड़ेगा। प्रधानमंत्री, समस्त सरकारी कर्मचारी और सीबीआई को अब लोकपाल से बाहर रखना काफी मुश्किल हो जाएगा।
अन्ना टीम पर यह आरोप लगाना भी उचित नहीं है कि वह तानाशाही कर रही है। सरकार ने अपने मसविदे में जितने संशोधन किए हैं, उससे कहीं ज्यादा संशोधन अन्ना टीम ने अपने मसविदे में कर लिए हैं। इससे ज्यादा लचीलापन क्या होगा कि अन्ना ने रामलीला मैदान पर अपना उपवास तोड़ते समय अपनी तीन प्रमुख मांगों का जिक्र तक नहीं किया।
प्रधानमंत्री, न्यायपालिका और सांसदों को लोकपाल के अंतर्गत लाने की मांगें! जहां तक अन्ना और उनकी टीम के सदस्यों के भाषणों का सवाल है, वे लोग कभी-कभी कुछ ऐसे शब्द और वाक्य बोल पड़ते हैं, जो ऊटपटांग-से लगते हैं, लेकिन इस बारे में हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि ये लोग नेताओं की तरह अनुभवी और जवाबदार नहीं हैं। ये बुद्धिजीवी भी नहीं हैं और ये देश के सामाजिक व सार्वजनिक जीवन में अभी नए-नए आए हैं, लेकिन इनके दिलों में आदर्शवाद और समाजसेवा का भाव कूट-कूटकर भरा हुआ है। हमें उनका कृतज्ञ होना चाहिए कि उनके निमित्त से देश में नई चेतना फैल रही है।
इन आंदोलनकारियों पर विदेशियों का एजेंट होने या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मोहरे होने के आरोपों में भी कितना दम है? उल्टे, इससे मालूम पड़ता है कि कांग्रेस बदहवास हो रही है, जैसी कि वह 1975 में हो गई थी। कांग्रेस को चाहिए कि वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा से सीधी लड़ाई लड़े और अगर उसमें दम हो तो उन्हें पटखनी दे।
लेकिन यह अजीब-सी बात है कि उसके प्रवक्तागण अन्ना हजारे और बाबा रामदेव को पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कंधे पर बैठाते हैं और फिर उन दोनों पर एक साथ वार करते हैं। वे जंतर-मंतर पर आए हजारों लोगों को भी विपक्ष के खाते में डाल देते हैं। ऐसा करके क्या वे आपातकाल का माहौल खड़ा नहीं कर रहे हैं?
यह स्पष्ट है कि अन्ना हजारे जेपी के पासंग भी नहीं हैं, लेकिन अगर विपक्ष विश्वनाथ प्रताप सिंह को अपना नेता मान सकता था तो उसे अन्ना हजारे को अपना प्रतीक मानने में क्या आपत्ति हो सकती है? सिर्फ प्रतीक, नेता नहीं! यदि मुठभेड़ की नौबत आ गई तो यह प्रतीक जयप्रकाशजी और विश्वनाथजी से अधिक प्रचंड सिद्ध हो सकता है, क्योंकि भ्रष्टाचार के विरुद्ध इस समय देश में दावानल सुलगा हुआ है। क्या कांग्रेस के नेताओं को यह पता नहीं कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा मूर्तिपूजक या प्रतीकपूजक देश है?
जरूरी नहीं है कि सरकार और आंदोलनकारियों के बीच मुठभेड़ हो ही! दोनों पक्ष इधर नरम पड़े हैं। दोनों अब भी बात करें, अंत तक करते चले जाएं। देश दोनों का है, संसद दोनों की है। संसद इसे 22 दिसंबर को ही क्यों पास करे? जरा जमकर बहस होने दें। सत्र बढ़ा दें या नया बुला लें। हो सके तो सर्वसम्मति करें। संसद के सब दल मिलकर जो फैसला करें, वह आंदोलनकारियों को मान्य होना चाहिए। यही लोकतंत्र है, लेकिन अगर वे यह समझें कि संसद ने जनता को धोखा दिया है तो वे फिर सीधे जनता के पास जाएं। वही लोकतंत्र की सबसे बड़ी अदालत है।
यदि संसद सबल लोकपाल को रद्द कर दे तो आंदोलनकारी वर्तमान संसद को ही रद्द करने के लिए स्वतंत्र हैं। वे जयप्रकाश और विश्वनाथ की तरह नई पार्टी खड़ी करें और नई संसद चुन लाएं। यों तो लोकपाल अपने आप में बड़ा मुद्दा नहीं है, स्वाधीनता या समाजवाद या जातिविहीन समाज की तरह, लेकिन वह बोफोर्स और इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले से तो ज्यादा बड़ा मुद्दा अपने आप ही बन गया है। -लेखक प्रसिद्ध राजनीतिक चिंतक हैं।