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गडकरी पर लगे ग्रहण के निहितार्थ

राजदीप सरदेसाई | Nov 02, 2012, 00:16AM IST
 
 

नितिन गडकरी जुबान संभालकर बोलने के लिए नहीं जाने जाते। भाजपा अध्यक्ष बनने के कुछ हफ्ते बाद उन्होंने पत्रकारों के समक्ष खुद के बारे में बोलते हुए बेबाक ढंग से कहा- ‘आप सोच रहे होंगे कि यह ‘मोटा’ अचानक कहां से आ गया। लेकिन आप सबको बता दूं कि मैं यहां एक मिशन के लिए आया हूं, कमीशन के लिए नहीं!’ तीन साल बाद उनके यही शब्द उनके गले की फांस बन सकते हैं, जब उन्हें हौले-हौले दिल्ली दरबार से निर्वासित किया जा रहा है। 
 
राजनीतिक भ्रष्टाचार के खिलाफ बढ़ते जनाक्रोश के इस दौर में गडकरी एक और हाई प्रोफाइल ‘टारगेट’ हैं। किसी अन्य दौर में जिसे ‘चालाकीपूर्ण’ कारोबारी व्यवहार कहकर आसानी से खारिज कर दिया जाता, अब उसे एक और राजनेता द्वारा छल-कपट के जरिये कानून से बच निकलने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। अन्यथा क्यों कोई स्वयंभू ‘सामाजिक उद्यमी’ छद्म कंपनियां बनाने के गोरखधंधे में पड़ता, यदि उसे यह न लगता हो कि वह राजनीतिक प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए आसानी से बच सकता है? 
 
मगर फिर भी गडकरी पर लगा ग्रहण महज नेता के खिलाफ जनाक्रोश का मामला नहीं है। यह देश के प्रमुख विपक्षी दल के भीतर बढ़ते संकट को भी प्रतिलक्षित करता है। कांग्रेस एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की तरह है, जिस पर एक परिवार का सख्त नियंत्रण है। दूसरी ओर भाजपा लगातार ऐसी छद्म कंपनी की तरह होती जा रही है, जहां डायरेक्टर्स कागजों पर तो मौजूद हैं, लेकिन असल निवेशकों का पता नागपुर के केशव कुंज में है।
 
गांधी परिवार भले ही सख्त जांच से बच जाए, मगर कम से कम इसके शीर्ष नेताओं को चुनाव में जनता का सामना तो करना पड़ता है। दूसरी ओर संघ नेतृत्व एक संविधानेत्तर समूह बना हुआ है, जो चुनावी समर में कूदे बगैर भाजपा की नियति निर्धारित कर सकता है। एक निर्वाचित, जवाबदेह भाजपा नेतृत्व और एक अनिर्वाचित, अनुत्तरदायी संघ परिवार के बीच का यही संघर्ष ही भाजपा के मौजूदा संकट के मूल में है। 
 
गडकरी इसी संघर्ष के नतीजतन पार्टी अध्यक्ष नियुक्त हुए। 2009 की चुनावी हार, लालकृष्ण आडवाणी का शालीनतापूर्वक रिटायर होने से इनकार और भाजपा की अगली पीढ़ी के नेतृत्व के बीच की तकरार को देखते हुए आरएसएस को लगा कि अंदरूनी तख्तापलट के लिए यही उचित समय है। इसलिए उसने भाजपा की दिल्ली संसदीय शाखा के तमाम दावेदारों व तेजी से उभरते मुख्यमंत्रियों को नजरअंदाज करते हुए एक ‘बाहरी’ को इसका अध्यक्ष बना दिया, जिसके बारे में उसे उम्मीद थी कि वह गुटीय राजनीति से ऊपर उठकर काम करेगा।
 
गडकरी को संघ मुख्यालय का करीबी स्वयंसेवक होने के नाते भाजपा की निर्णय-प्रक्रिया पर संघ का प्रभुत्व बहाल करने के लिए रखा गया था। 
 
संघ परिवार भले ही राजनीति से दूर रहने के भ्रम को बरकरार रखने की कोशिश करे, लेकिन तथ्य यह है कि जनसंघ-भाजपा के इतिहास में ऐसे सिर्फ दो मौके आए, जब उसने वास्तव में पीछे लौटने के संकेत दिए। पहली बार ऐसा जनता पार्टी प्रयोग के नाकाम होने के बाद हुआ था, जब भाजपा के तथाकथित गांधीवादी समाजवाद के प्रति लोगों के बढ़ते मोहभंग और इंदिरा गांधी की सॉफ्ट हिंदू पॉलिटिक्स के प्रति आकर्षण के बीच संघ के अनेक सदस्यों को कांग्रेस की ओर झुकते देखा गया। ऐसा दूसरा दौर 1999 के बाद के एनडीए में तब आया, जब अटल बिहारी वाजपेयी ने पार्टी को ज्यादा स्वायत्त बनाने पर जोर दिया। वाजपेयी का आभामंडल तब तक इतना बढ़ चुका था, जिसके आगे आरएसएस बौना हो गया। 
 
लेकिन वाजपेयी-आडवाणी का दौर खत्म होने के बाद संघ परिवार ने भगवा परिवार के मुखिया के तौर पर पुन: प्रभावशाली होने का फैसला किया। नरेंद्र मोदी के उदय के बाद इस प्रक्रिया में और तेजी आई। मोदी कई मायनों में एक स्वयंसेवक की मूल सोच के ठीक उलट हैं। आरएसएस के व्यापक नजरिये में खुद से ज्यादा समुदाय महत्व रखता है। मोदी ने भले ही अपनी जिंदगी के शुरुआती सबक संघ की किसी शाखा से हासिल किए हों, मगर स्पष्ट तौर पर उन्होंने कार्य करने की अति व्यक्तिवादी शैली अख्तियार की, जहां पर संगठन व्यक्ति के आगे गौण हो गया। इस प्रक्रिया में संघ के वफादारों की एक पूरी पीढ़ी को अपेक्षाकृत नए, ज्यादा महत्वाकांक्षी राजनीतिक खिलाड़ियों द्वारा किनारे कर दिया गया। 
 
मोदी के प्रयोग को गुजरात में जबर्दस्त सफलता मिलने के बाद संघ को चिंता होने लगी कि गांधीनगर की राजनीति दिल्ली के अपेक्षाकृत बड़े मंच पर भी दोहराई जा सकती है। इसी आशंका ने संघ परिवार को गडकरी को अपने सुरक्षाकवच के रूप में उभारने के लिए प्रेरित किया। गडकरी से जब भी किसी भी इंटरव्यू में भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद के दावेदार के बारे में पूछा जाता तो वह मुस्कराकर जवाब देते- ‘हमारी पार्टी में छह से सात ऐसे लोग हैं जो प्रधानमंत्री बन सकते हैं। नरेंद्र मोदी उनमें से एक हैं।’
 
मोदी को भाजपा के अन्य नेताओं के समकक्ष ठहराते हुए गडकरी ने दरअसल ‘सामूहिक’ नेतृत्व की उस अवधारणा पर ही जोर दिया, जिसे आरएसएस द्वारा जमकर संरक्षण दिया जाता है। दुर्भाग्य से संघ एक कालचक्र में उलझ गया। इसके विचारों को अतीत के जरिये आकार दिया गया, बदलती हकीकतों के मुताबिक नहीं। यह प्रेसिडेंशियल स्टाइल की राजनीति का दौर है, जहां पर व्यक्तियों को एक ‘ब्रांड’ के रूप में जबर्दस्त ढंग से प्रोजेक्ट किया जाना चाहिए। 
 
हालांकि यह स्पष्ट है कि संघ परिवार अपने गडकरी प्रयोग की नाकामी को स्वीकार नहीं करेगा और न ही अपनी भाजपा के साथ जुड़ी गर्भनाल को ढीला छोड़ते हुए उसे स्वायत्त राजनीतिक इकाई के तौर पर काम करने देगा। समस्याओं से घिरे गडकरी के लिए पार्टी अध्यक्ष के तौर पर दूसरा कार्यकाल पाना अब दूर की कौड़ी लगता है। गडकरी एक ‘बिगड़े’ राजनेता के तौर पर त्यागने योग्य हो सकते हैं, लेकिन संघ को कौन जवाबदेह ठहराएगा?
 
 
राजदीप सरदेसाई
 
आईबीएन 18 नेटवर्क के एडिटर-इन-चीफ   
 

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