जब गांधीजी ने शारीरिक श्रम की पैरवी की
बात उन दिनों की है, जब महात्मा गांधी नौआखाली में थे। चूंकि देश के स्वातंत्र्य आंदोलन के वे प्रणेता थे, इसलिए समाज के हर वर्ग से लोग उनसे मिलने आया करते थे। इन्हीं में एक वर्ग था- प्रेस। गांधीजी जहां भी जाते, अखबार वाले वहां पहुंच ही जाते थे।
जब पत्रकार उनसे भिन्न-भिन्न मुद्दों पर कई तरह के सवाल पूछते तो गांधीजी बिना नाराज हुए बड़े प्रेम से उनका जवाब देते थे। एक बार गांधीजी विभिन्न समाचार-पत्रों के प्रतिनिधियों के साथ बैठे थे। उन प्रतिनिधियों में से किसी एक ने उनसे पूछा- क्रगांधीजी! आपने सन् १९२५ में कहा था कि मैं शासन-विधान में यह धारा रखूंगा कि स्वतंत्र भारत में मत देने का अधिकार उसी को होगा, जो शारीरिक परिश्रम से राज्य की कुछ न कुछ सेवा कर सके। क्या आप अब भी इस बात पर कायम हैं?
गांधीजी ने दृढ़ता से उत्तर दिया- क्रमैं मरते दम तक अपनी इस बात पर कायम रहूंगा। भगवान ने मनुष्य को हाथ और पैर इसीलिए दिए हैं कि वह उनसे मेहनत करके खाए और स्वयं पर निर्भर परिवार के सदस्यों का भी पालन-पोषण सही ढंग से करे। बुद्धि से धन कमाकर महज भोग-विलास के साधन पैदा करना और ऐशो-आराम से जीवन बिताना पाप है।ञ्ज गांधीजी की यह बात वर्तमान मौजूदा परिस्थितियों में भी सार्थक प्रतीत होती है।
कथा का सार यह है कि शारीरिक परिश्रम एक ओर जहां हमारे शरीर को स्वस्थ रखने का साधन है, वहीं दूसरी ओर समाज की प्रगति का श्रेष्ठ मार्ग भी है। परिश्रम के माध्यम से ही लोग यथेष्ट सफलता प्राप्त कर सकते हैं।








