संत ने डाकू के जीवन को दी नई दिशा
किसी राज्य के लोग एक डाकू से बहुत त्रस्त थे। वह लोगों को लूटने के लिए उनकी हत्या करने से भी नहीं हिचकता था। राजा ने उसे पकडऩे के लिए अपनी पूरी ताकत लगा दी, किंतु कोई नतीजा नहीं निकला। एक बार राजा के दरबार में एक नामी संत पधारे।
राजा ने यथोचित सत्कार के बाद अपनी इस समस्या को उनके समक्ष रखा, जिसे सुनकर संत ने जंगल में जाकर उस डाकू से भेंट करने की इच्छा व्यक्त की। अगले दिन सुबह संत जंगल में पहुंचे। पूरा दिन घूमते रहे, किंतु डाकू नहीं मिला। रात होने पर जब उन्होंने एक पेड़ के नीचे आसरा लिया, तो डाकू अचानक उनके सामने आ पहुंचा।
उसने उन्हें धमकाते हुए कहा - 'तुम्हारे पास जो कुछ है, चुपचाप निकालकर मुझे दे दो। वरना जान से हाथ धो बैठोगे।Ó संत ने बड़े स्नेह से उसकी ओर देखा।
उनकी दिव्य दृष्टि के प्रभाव से डाकू कुछ नरम पड़ा। तब संत ने उससे कहा - 'भाई! सामने के पेड़ से कुछ पत्ते मेरे लिए तोड़ लाओगे?Ó डाकू पत्ते तोड़ लाया।
अब संत ने कहा - 'अब एक काम और कर दो। इन पत्तों को वहीं लगा दो, जहां से तोड़कर लाए थे।Ó डाकू चिढ़कर बोला - 'यह हो ही नहीं सकता। टूटे पत्ते फिर से कैसे लगाऊं?Ó
तब संत ने समझाया - 'जब तुम जानते हो कि टूटी चीज नहीं जुड़ती, तो फिर जिंदगी की डोर क्यों तोड़ते हो? जब जीवन दे नहीं सकते, तो लेते क्यों हो?Ó संत की बात सुनकर डाकू को अपनी भूल का अहसास हुआ और उसने उसी दिन से कुमार्ग का त्याग किया।
निर्माण करने वाला महान माना जाता है, क्योंकि निर्माण में श्रम लगता है, जो सदैव सराहनीय होता है। जबकि विध्वंस अकर्म की पतित श्रेणी में गिना जाता है। इसलिए अपने मस्तिष्क को विनाश के स्थान पर निर्माण की रचनात्मकता में लगाना चाहिए।








