संपादकीय.. पंजाब में मतदान का रिकॉर्ड टूटा। उत्तराखंड में भी वोट पड़ने का प्रतिशत ऊंचा रहा। इसके पहले मणिपुर में 82 फीसदी लोग मतदान केंद्रों तक पहुंचे और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सहभागी बने। इन तीनों राज्यों ने हाल के वर्षो में कुछेक अपवादों को छोड़कर उभरे इस रुझान की पुष्टि की है कि लोग बढ़-चढ़कर चुनाव में हिस्सा ले रहे हैं। यह भारत की जनतांत्रिक व्यवस्था को लेकर समाज के संभ्रांत तबकों में अक्सर जताई जाने वाली निराशा के विपरीत तस्वीर है। बल्कि मणिपुर में इस बार एक खास सकारात्मक घटनाक्रमदेखने को मिला।
नगालैंड पीपुल्स फ्रंट ने राज्य के नगा आबादी वाले इलाकों में अपने उम्मीदवार खड़े किए। इस पार्टी को नगालैंड के एक भूमिगत उग्रवादी संगठन की समर्थक बताया जाता है। खबर है कि उसके चुनाव लड़ने का मकसद मणिपुर की राजनीतिक गतिविधियों में खुलेआम भाग लेकर अपनी मांग को जताने का मंच तैयार करना है।
किसी ऐसे संगठन को हिंसक एवं उग्रवादी गतिविधियां निर्थक लगने लगें, यह लोकतंत्र में निहित शक्ति और संभावना दोनों की ही मिसाल है। पंजाब में इस बार मजहबी मुद्दे गायब रहे। विकास का मुद्दा चर्चा में रहा। उत्तराखंड में विकास एवं भ्रष्टाचार के मुद्दों पर चुनाव लड़ा गया। भावनात्मक मुद्दों के पृष्ठभूमि में चले जाने के बावजूद इतनी बड़ी संख्या में मतदाताओं का उमड़ना अपने लोकतंत्र में आती नई परिपक्वता का प्रमाण है।
इसमें चुनाव आयोग की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। आयोग ने चुनावों को स्वतंत्र, निष्पक्ष एवं भ्रष्ट आचरण से मुक्त रखने का प्रशंसनीय उदाहरण प्रस्तुत किया है। चूंकि मतदान से भय एवं अवांछित प्रभावों को हटाने में आयोग के कदम कामयाब रहे हैं, इसलिए मतदाता उत्साह से मतदान करने के लिए प्रेरित हो पाते हैं।
राजनीतिक दलों को आयोग के सख्त रुख से भले असुविधा होती हो, लेकिन सारा घटनाक्रम लोकतंत्र के लिए शुभ है। आशा की जानी चाहिए कि उत्तर प्रदेश, जहां मुकाबला कड़ा है और जो अतीत में तीखे सियासी टकरावों की भूमि रहा है, वहां भी जनतंत्र की जीत के ऐसे ही नमूने देखने को मिलेंगे।