स्टीव जॉब्स की मृत्यु की खबर दुखद थी, लेकिन इस खबर का एक रोचक परिणाम जरूर रहा। ऐसा लगा जैसे एक अरसे के बाद हमारे अखबारों के पन्ने और हमारी खबरिया चैनलों के बुलेटिनों की सुर्खियों में धोखेबाजों, घपलेबाजों, चोरों के स्थान पर कोई महान व्यक्ति जगह पाने में कामयाब हो पाया है।
आमतौर पर हमारी खबरों की सुर्खियां घपलेबाजों और धोखेबाजों के लिए ही स्थायी रूप से आरक्षित रहती हैं। जॉब्स एक ऐसे व्यक्ति थे, जिसके लिए हम सभी ने गर्व का अनुभव किया था। वे केवल एक विलक्षण उद्यमी ही नहीं थे, वे एक नेक व्यक्ति भी थे, जिनका जीवन उनके कार्यो और उनकी उपलब्धियों का दर्पण था। यही वह चीज है, जो आज लगातार दुर्लभ होती जा रही है।
आज भलाई को एक ओल्ड फैशन गुण माना जाने लगा है। आज नेकी, अच्छाई और भलाई के गुण गाने वाले लोग कम ही हैं। नेकी की राह चलने वालों की तादाद अब ज्यादा नहीं रह गई है। वास्तव में अधिकांश लोग भले लोगों का मजाक उड़ाते हैं और उन्हें दकियानूसी कहकर बुलाते हैं। आज बुरा भला और भला बुरा हो गया है।
आज सभी लोग अचीवर्स की ओर नजर उठाकर देखते हैं और जितने वे बुरे होते हैं, वे हमें उतने ही आकर्षक और रोमांचक मालूम होते हैं। मार्क जुकेरबर्ग एक उदाहरण हैं। यदि वे इतने खब्ती, सामाजिक रूप से असामान्य, अहंमन्य और चतुर व्यक्ति नहीं होते तो क्या उनके जीवन पर द सोशल नेटवर्क जैसी फिल्म बनाई जाती? यदि सलमान खान ने अपने जीवन में इतने अविवेकपूर्ण कृत्य नहीं किए होते, क्या तब भी वे आज उतने ही लोकप्रिय होते? मजे की बात यह है कि आजकल तो ब्रांड्स को भी बुराई से कोई परहेज नहीं है।
हां, अगर मीडिया में कोई चीज तूल पकड़ ले, तब जरूर ब्रांड और बाजार की ताकतें पीछे हट जाती हैं, जैसा कि टाइगर वुड्स के मामले में हुआ। लेकिन जैसे ही स्थितियां सामान्य होती हैं और यदि सितारे की लोकप्रियता बरकरार है तो वे पुन: उसे भुनाने में मुब्तिला हो जाते हैं। बिग बॉस शो के दोनों मेजबानों को ही देख लीजिए। आज किस ब्रांड को यह याद है कि वे दोनों किन्हीं आपराधिक आरोपों के चलते जेल की सजा भुगत चुके हैं?
तो क्या इसका मतलब यह है कि उपलब्धियां नकारात्मकता को दबा-छुपा देती हैं? नहीं, पूरी तरह तो नहीं।
सफलता नकारात्मकता को कुछ हद तक ढांक पाती है। आप आर्म रेसलिंग या क्ले पिजन शूटिंग या जुजित्सू में दुनिया के नंबर वन खिलाड़ी हो सकते हैं, लेकिन आपको तब तक कोई भी प्रायोजित नहीं करेगा, जब तक कि ये खेल बड़े पैमाने पर पैसा कमाने वाले साबित नहीं होते। यह बात केवल खेल पर ही लागू नहीं होती। यह सभी पर लागू होती है, फिर चाहे वह फिल्में हों, किताबें हों, टीवी शो हों, कंपनियां और ब्रांड हों, सितारे हों, पैसा सभी को चलाता है। नसीरुद्दीन शाह देश के बेहतरीन अभिनेताओं में से एक हो सकते हैं, लेकिन हम नाटकों में अभिनय के लिए उन्हें याद नहीं रखते।
हम केवल उन्हें उनकी हिट फिल्मों के लिए याद रखते हैं, फिर चाहे उन फिल्मों में उनकी भूमिका कैसी भी रही हो। आप मेंसा इंटरनेशनल के टॉपर हो सकते हैं, लेकिन लोग आप पर तब तक ध्यान नहीं देंगे, जब तक कि आप केबीसी में पांच करोड़ रुपए नहीं जीत लेते।
आज कामयाबी का फॉमरूला है : बुराई प्लस पैसा। यदि आप इस फॉमरूले को साध पाए तो दुनिया आपके कदमों में होगी। यहां तक कि जो लोग कतई बुरे नहीं थे, वे भी भरसक यह साबित करने का प्रयास करते रहे कि वे बुरे थे। मिसाल के तौर पर माइकल जैक्सन। वे बीती सदी की महानतम प्रतिभाओं में से एक थे। वे एक गरीब परिवार में जन्मे थे, लेकिन आगे चलकर उन्होंने खूब सारा पैसा और खूब सारी बदनामी कमाई।
उनके पास इतना पैसा था कि वे यह बिल्कुल समझ नहीं पाते थे कि उसे खर्च कैसे किया जाए। लेकिन जब उनकी मृत्यु हुई, तब वे अकेले और निर्धन थे और उनकी मृत्यु के बाद ही उनके एस्टेट का पुराना वैभव लौटकर आ सका।
मैं कोई शुद्धतावादी नहीं हूं। मैं सफलता के उत्सवों के विरुद्ध भी नहीं हूं। मुझे पता है कि सफलता के अपने कारण होंगे। मुझे केवल इसी बात का डर है कि कहीं स्टारडम का फॉमरूला अपराध और मूर्खताओं के लिए उत्प्रेरक न साबित हो। उत्कृष्टता, अच्छाई, प्रेम, सत्य, न्याय, इन सभी मूल्यों को स्टारडम की खातिर दरकिनार किया जा रहा है।
अब हमें अल्बर्ट श्वाइट्जर जैसे परोपकारी चिकित्सक नजर नहीं आते। अब अधिकांश डॉक्टर बड़ी फार्मास्यूटिकल कंपनियों के राजदूत बन गए हैं। अब वकील गरीबों और शोषितों के लिए काम नहीं करते। अब अभिनेता बेहतरीन स्क्रिप्ट की खोज में नहीं रहते। अब संगीतकार अपना जीवन संगीत को उस तरह समर्पित नहीं कर देते, जैसाकि अलाउद्दीन खां साहब ने किया था। और हम, जो कि अब केवल ग्राहक बनकर रह गए हैं, उनका आकलन उनकी सफलता के आधार पर करते हैं, उनके काम के आधार पर नहीं।
सफलता, आपराधिक रिकॉर्ड और बुराई की चेतना, एक सुपर सितारे के लिए इससे ज्यादा और क्या चाहिए। हम उसकी सराहना करेंगे, स्वयं को उससे जोड़कर देखेंगे और उसके लिए चीख-पुकार मचाएंगे। बुराई प्लस पैसे के दौर में वह एक और सितारा होगा। लेकिन उम्मीद अब भी बाकी है। जब हम स्टीव जॉब्स जैसे किसी व्यक्ति की मृत्यु पर दुनिया को शोक मनाते देखते हैं तो हमें लगता है कि उम्मीद अभी बाकी है। जॉब्स चुपचाप दुनिया को अलविदा कह गए। मुझे याद नहीं आता पिछली बार कब मैंने किसी व्यक्ति की मृत्यु पर इतना प्रेम और सम्मान उमड़ते देखा हो।
शायद इसका मतलब यह है कि आज भी हमारे बीच कुछ ऐसे लोग हैं, जो अच्छाई की राह पर चलना पसंद करते हैं, फिर चाहे वह राह कितनी भी नीरस क्यों न हो। ऐसे लोग हैं, जो छीनने के बजाय देने में भरोसा करते हैं। और जब तक ऐसे लोग हैं, तब तक हम सभी के लिए उम्मीदें बाकी हैं।