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अब तक चल गया, किंतु नई पीढ़ी को तो उत्तर चाहिए

कल्पेश याग्निक | Dec 15, 2012, 03:58AM IST
अब तक चल गया, किंतु नई पीढ़ी को तो उत्तर चाहिए
‘वे आपको ग़लत प्रश्न पूछना इसलिए सिखाते हैं कि उन्हें सही उत्तर देने की चिंता न करनी पड़े।’ -अज्ञात
 
 
सरकार अचानक दौड़ने लगी है। कल तक बीमार थी। पॉलिसी पैरालिसिस का शिकार। यानी लकवा मार गया था काम करने की गति को। मीडिया ने, विपक्ष से भी अधिक, कई इलाज सुझाए। कुछ न हुआ। फिर गुजरात चुनाव की शुरुआत से ठीक पहले कुछ हरकत हुई। एक बार उठी तो चलने लगी। विपक्ष भी अचानक दौड़ने लगा। कल तक सदमे में था। भाजपा डिप्रेशन में थी। कोई भी टूट सकता है भीतर ही भीतर, यदि बाहर चाहे जितनी हिम्मत की ‘पूर्ति’ करें, कुछ फायदा न हो। सपा और बसपा तो सीबीआई जैसे गंभीर, संक्रामक रोगाणु से ग्रस्त थे। बाकी विपक्षी दलों के अपने रोने थे। फिर सब एकदम चुस्त-दुरुस्त हो गए। अपने-अपने तरीकों से। देखते हैं, कैसे : 
 
सरकार ने एकदम से पेंशन, बीमा कई सेक्टर खोल दिए। साथ ही खोल दिए पीछे के दरवाज़े। एक मुलायम सिंह यादव की सपा के लिए। दूसरा मायावती की बसपा के लिए। संसद, बहुमत से चलती है। बहुमत यदि हो नहीं तो बहुत से मत, मन मारकर जुटाने पड़ते हैं। राजनीति में यूं भी मन का विशेष महत्व नहीं। यूपीए, वो भी द्वितीय, में तो और भी नहीं।
पिछले दरवाज़ों की परेशानी एक ही है। ये मुख्य प्रवेश द्वार से भी ज्यादा दिखलाई पड़ते हैं। एक समय था/रहा, जब किसी ने विशेष कुछ न कहा। नहीं ली आपत्ति। कुछ ने अनदेखा किया। कुछ कुढ़कर रह गए। अधिकतर ने माफ़ कर दिया। अब वह समय और स्थिति जा रही है। युवा, नई जनरेशन, को तो उत्तर चाहिए। हर वो मुद्दा, जो कि ‘जनहित में है’ कहकर पेश किया जा रहा है, सभी पर जवाब मांगेगी नई पीढ़ी। चाहे वो सरकार की पहल हो या विपक्ष का कदम। केंद्र में हो या राज्य में। केंद्रीय मंत्रिमंडल का फैसला हो या चुनावी रैली में कही बात। ईच वर्ड काउंट्स। हर शब्द का अर्थ पूछा जाएगा। आखिर हमने चुना है आप सभी को। यदि आज नई पीढ़ी को अवसर मिले तो वो इन बिंदुओं पर तो निश्चित ही उत्तर मांगेगी। पूर्ण उत्तर। पूर्ण सत्य : 
 
डॉ. मनमोहन सिंह मंत्रिमंडल ने 118 साल पुराना भूमि अधिग्रहण कानून खत्म कर 13 दिसंबर 2012 को नया बिल स्वीकृत कर दिया। इसमें प्रावधान है कि निजी प्रोजेक्ट के लिए ज़मीन ली तो पहले 80% भूमि मालिकों से मंजूरी लेनी पड़ेगी। पब्लिक-प्राइवेट भागीदारी में यह 70% हो जाएगी।
 
- उत्तर दीजिए कि जब संसद में कुछ पास कराना होता है तो, तो 51% की मंजूरी ही चाहिए। मल्टी ब्रांड रिटेल में विदेशी पैसा लगाने की बात लागू करवानी हो तो उतनी भी नहीं। फिर ‘प्रोजेक्ट’ को जल्दी गति देने के लिए ऐसा क्यों? फिर आपके रेकॉर्ड कहां पूरे या सही हैं कि सभी किसान मिल जाएंगे मंजूरी देने के लिए। और भले ही मुआवज़े को कई गुना बढ़ा दिया गया हो, वो जो कुछ विघ्नसंतोषी ‘ब्लैकमेल’ करेंगे, उन्हें कैसे रोकें? वो जो ‘ज़मीन से ज़रूरत से ज्यादा जुड़े’ लोग होंगे जो इस कानून की ‘कीमत’ समझ लेंगे, उनका क्या? फिर इस कानून की बात आते ही 50 प्रतिशत तक कीमतें बढ़ाने की धमकी डेवलपर्स ने तत्काल दे दी है, उस पर रुख? और पुराने मुआवज़े जो रह गए हैं, वे नई दर से क्यों? किसानों को नहीं, बीच के उन कारोबारियों को ही फायदा होगा जिन्हें हेयदृष्टि के साथ बिचौलिए दलाल कहा जाता है। और विपक्ष क्या-क्या करेगा इन सब बिंदुओं पर? सब उत्तर चाहिए।
 
गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने गंभीर आरोप जड़ दिया है कि सिर क्रीक (जिसे अंग्रेजी के एसआईआर के कारण अक्सर सर लिखा जाता है) की जमीन केंद्र सरकार चुपके से पाकिस्तान को सौंपने की तैयारी कर रही है। गुजरात से पूछे बगैर। इसे ‘निराधार’ कह प्रधानमंत्री ने तत्काल खंडन जारी कर दिया है। किन्तु मामला बना हुआ है।
 
- नरेंद्र मोदी से भी उत्तर चाहिए। उन्होंने इतनी गंभीर बात, इतने अधिकारपूर्वक कही है तो आधार क्या है? आधार पूछना इसलिए आवश्यक हो गया है क्योंकि पिछली बार के कुछ गंभीर आरोप झूठे सिद्ध हुए हैं। जैसे कि सोनिया गांधी के इलाज पर केंद्र ने 1880 करोड़ खर्च किए आदि।
 
उनका कहना है कि प्रधानमंत्री ने तेहरान में पाक राष्ट्रपति को ऐसा संकेत दिया था। कैसे संकेत? क्या यह संभव है कि तेहरान जाकर मनमोहन सिंह, जरदारी से कहें कि सिर क्रीक की 96 माइल ज़मीन ले लीजिए? कच्छ के रण को हम पाक को समर्पित करना चाहते हैं। भले ही 100 साल के करीब हुए, सिंध सरकार और कच्छ के राव के बीच विवाद का फैसला मौजूदा पाकिस्तान के खिलाफ गया था। ब्रिटिश प्रधानमंत्री हेराल्ड विल्सन ने 1968 में सिर्फ 10% हिस्से पर पाकिस्तानी दावा माना था। मोदी यह भी बताएं कि यदि उन्होंने मुख्यमंत्रियों की बैठक में इस मुद्दे को उठाया था तो उन्हें क्या उत्तर मिला था? गुजरात के लिए इस इलाके का बिजली, ऊर्जा और गैस के लिए निश्चित अति महत्व हो सकता है, किन्तु जवाब सारे मिलने ही चाहिए।
 
इसी पर प्रधानमंत्री से भी स्पष्ट उत्तर यह चाहिए कि उनकी प्रथम और द्वितीय दोनों पारियों में हम लगातार झुकते क्यों जा रहे हैं? आपने पहले हर आतंकी हमले पर इस्लामाबाद को ‘सुबूत’ सौंपने की एक शालीन किन्तु व्यर्थ परंपरा शुरू की। क्यों? हुआ क्या? फिर शर्म अल-शेख में तो हद कर दी। बलूचिस्तान की चिंता को छह दशक से हमने दूर रखा था।
 
आपने अपने माथे पर लगा ली। पॉलिसी शॉक। फिर आतंक को बातचीत से अलग कर लिया। हाफ़िज़ इसीलिए महफ़ूज़। 26/11 के असली सरगना मज़े में। तो संभव है, सिर क्रीक पर कुछ-न-कुछ तो होगा? नहीं है तो दुगुनी ताकत से, चौगुने गांभीर्य से बिंदुवार खंडन क्यों नहीं किया? चुनाव ही चुनाव का जिक्र क्योंकर किया? इतने संवेदनशील मसले का तो जैसे अदालतों में आरोप क्र. 1, क्र. 2.. या एक्जिबिट नं. 1, 2, 3  के मुकाबले तोड़ नं. 1, 2, 3 पेश किए जाते हैं- वैसा होना था। क्यों नहीं? मेरे राष्ट्र की अस्मिता का प्रश्न है। मेरी सुरक्षा का मामला है। पूर्ण उत्तर अनिवार्य है।
 
फिर पेश हो गया तरक्की में आरक्षण का बिल। समूची संसद इसमें पार्टी है। कहने को मायावती आमादा है। करने को मुलायम सिंह पलायन है। भजने को भाजपा तैयार है। लाभ अजा/जजा को मिलेगा या नहीं, कांग्रेस को श्रेय मिल सकता है मायावती के लिए।
 
- क्या फिर रिटेल ड्रामा की तरह सरकार पर्दा उठाएगी? तीसरी बार लाया जा रहा है ऐसा बिल। मायावती बताएंगी क्या कि जब इलाहाबाद हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से ऐसा आरक्षण खारिज हो चुका है, तब संसद के ऐसे दुरुपयोग की क्या आवश्यकता है? विशेषकर, जो बात मायावती सहित सभी दलों-नेताओं ने दबाकर रखी है, उसका जवाब चाहिए। वह है सरकार के विभिन्न विभागों का सच। इसमें सिद्ध हो रहा है कि अजा/जजा के तरक्की देने की विशेष मुहिम के बाद भी 40% पदों पर तरक्की नहीं दी जा सकी।
 
कोई 31 हजार में से 18 हजार से कम को ही ऐसा लाभ मिल सका। क्योंकि बुनियादी योग्यता का प्रश्न बना रहा। यही प्रश्न है, जिसका उत्तर चाहिए। ऐसा क्यों? और ऐसा है तो भाजपा से जद (यू) तक सभी बताएं कि योग्यता को दबाकर तरक्की से क्या होगा। पतन। और मुलायम सिंह ने कहा है कि ऐसा कानून बनने पर सीनियर, जूनियर हो जाएंगे- जो अन्याय होगा। ऐसा क्यों कह रहे हैं? कानून बनवाने में चोर दरवाजों का इस्तेमाल करने वाले ही उत्तर देंगे इसका। उनका बेनकाब होना अनिवार्य है।
 
वॉलमार्ट ने लॉबीइंग के लिए 125 करोड़ रुपए हमारे देश में खर्च किए जो घूस है। विपक्ष ने इस पर, अपना फर्ज निभाते हुए, जमकर हंगामा किया। सरकार जांच को तैयार हो गई है।
 
- लॉबीइंग, अमेरिका में होती है। इसकी शुरूआत 1892 में हुई जब वाशिंगटन के विलार्ड होटल की लॉबी में राष्ट्रपति सिगार पीते टहलते आते और सिफारिश लेकर आए भ्रष्ट उनसे वहां मिलते थे। वे लॉबीइस्ट कहलाए। लोकप्रिय हो गए। कोई भी, ऐसा, लोकप्रिय हो ही जाएगा। काम के बदले अनाज यानी देअर आर नो फ्री लंचेज इन दिस वर्ल्ड। कहावत के आगे सच और भी रोचक है- लंचेज आर स्पेशली नेवर फ्री। ठीक ही तो है, कोई क्योंकर आपकी व्यर्थ खातिरदारी करेगा? वो भी अमेरिका से आकर। अमेरिकी विदेश विभाग की प्रवक्ता विक्टोरिया नुलैंड ने विपक्ष के आरोपों को खारिज कर दिया है। किन्तु लॉबीइंग के हिसाब की रिपोर्ट तो उन्हीं के पास है। खुद वॉलमार्ट ने किसी गलत काम में शामिल होने से इनकार किया है। तो खर्च का ब्योरा? वो भी 125 करोड़ रु? वो भी उस तिमाही में  जिस दौरान 51 प्रतिशत विदेशी पैसे लगाने के मंजूरी देने की तैयारी हुई? ढेर सारे प्रश्न।
 
धर्म की तरह राजनीति की भी एक परेशानी है। वह हमें उन उत्तरों से संतुष्ट होने को कहती है जो उत्तर हैं ही नहीं। राजनीति को सबसे अधिक रास आता है कि लोग भ्रमित रहें। भ्रम, संशय, आधे-अधूरे उत्तर सबकुछ गड्डमड्ड कर देते हैं। भय पैदा करते हैं। पूर्ण और सच्चे उत्तर मिलें, यह असंभव है। किन्तु लेने ही हैं। इसके लिए अनुभवी पीढ़ी को, नई पीढ़ी में उनके प्रश्नों के प्रति भरोसा जगाना होगा। जीवन से जोड़ना होगा हर मुद्दे को। ऐसे ही उत्तरदायी लोगों में भी आस्था जगानी होगी। कहते हैं, जहां आस्था है, वहां प्रश्न नहीं होते किन्तु बिना आस्था के उत्तर, उत्तर नहीं होते। अभी, काफी कुछ आस्था से परे चल रहा है।
 
(लेखक दैनिक भास्कर समूह के नेशनल एडिटर हैं।)
 
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