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यह जीत भी क्या जीत है?

वेदप्रताप वैदिक | Dec 07, 2012, 23:19PM IST
यह जीत भी क्या जीत है?
मनमोहन सरकार की यह जीत भी क्या जीत है? उसने अपनी इज्जत दांव पर लगा दी थी। वह विदेशी पूंजी के स्वागत में पलक पावड़े बिछाए है। विदेशी पूंजी को खुदरा कारोबार में प्रवेश दिलवाकर वह देश की गरीबी दूर करना चाहती है।
 
अपने इस नेक इरादे पर उसे संसद की मोहर लगवानी पड़ी। मोहर तो लग गई, लेकिन उसका हत्था टूट गया। उसे लोकसभा में 253 वोट मिल गए और विपक्ष को सिर्फ 218। लोकसभा में साधारण बहुमत के लिए कम से कम 273 वोट चाहिए, यानी उसे 20 वोट कम मिले।
 
इसका क्या अर्थ लगाया जाए? विदेशी पूंजी का सीधा निवेश आज इतना बड़ा मुद्दा बन गया है, जितना कोई संविधान-संशोधन होता है। इसीलिए सरकार को काफी हीला-हवाली के बावजूद अपने इस कार्यकारी निर्णय को संसद के पटल पर रखना पड़ा। अर्थात यह साधारण बहुमत से नहीं, दो-तिहाई बहुमत से पारित होना चाहिए था। तभी तो माना जाता कि विदेशी निवेश के मामले में सर्वसम्मति हुई है।
 
लेकिन हुआ क्या? उसे साधारण बहुमत भी नहीं मिला। अगर सपा और बसपा की कथनी व करनी में अंतर नहीं होता, तो क्या होता? दोनों पार्टियां विदेशी निवेश के विरुद्ध वोट दे देतीं, तो कांग्रेस की सरकार बुरी तरह से पराजित हो जाती। लेकिन ये दोनों दल सीबीआई के शिकंजे में इस बुरी तरह से फंसे हुए हैं कि उन्हें एफडीआई के विरुद्ध मतदान से बचना पड़ा। सिर्फ इन दलों की ही बात नहीं है। जिन 18 दलों ने संसद की बहस में भाग लिया, उनमें से 14 दलों ने विदेशी निवेश का विरोध किया।
 
विरोध तो सपा और बसपा ने भी किया और यहां तक चेतावनी भी दे दी कि सत्तारूढ़ दल अपने किए का फल पाए बिना नहीं रहेगा। सरकार में शामिल शरद पवार की राकांपा भी पसोपेश में दिखी। इनकी बात जाने दें। यदि सचेतक जारी नहीं होता तो संभवत: कई कांग्रेसी सांसद भी एफडीआई के विरुद्ध मतदान करते।
 
एफडीआई से खुदरा व्यापार के सुपर स्टोर तभी खुल सकेंगे, जबकि संबंधित राज्य उसकी अनुमति दें। अब तक 11 राज्यों ने सहमति जताई है। यानी देश के ज्यादातर राज्य सहमत नहीं हैं। जिन 11 राज्यों ने सहमति जताई है, उनमें छोटे-छोटे राज्य भी हैं। सहमति नहीं जतानेवालों में मप्र, उप्र, बिहार, गुजरात जैसे बड़े राज्य भी हैं। संसद की सांगोपांग बहस सुनकर अब वे राज्य भी असमंजस में दिखाई पड़ रहे हैं, जिन्होंने सहमति पत्र केंद्र को भेज दिए थे। ऐसी स्थिति में एफडीआई को खुदरा कारोबार पर लादना कहां की बुद्धिमानी है, कौन-सा लोकतंत्र है, कौन-सी सर्वसम्मति है?
 
सरकार ने इस मामले को संसद में लाने दिया, इस कदम की सराहना तो करनी पड़ेगी, लेकिन यह मेहरबानी बेलज्जत ही मानी जाएगी। यदि सरकार प्रचंड बहुमत से जीतती तो बात ही कुछ और होती, लेकिन यह जीत तो उसकी नैतिक हार ही मानी जाएगी। अब वह अपने निर्णय को लागू तो कर सकती है, लेकिन इस घटना ने सरकार की वैधता को पहले से भी ज्यादा घटा दिया है। वैधता घटने पर भी सरकारें घिसटती रहती हैं। गिरती नहीं हैं। और यहां स्पष्ट हार हो जाती, तो भी सरकार गिरती नहीं। लेकिन यह नेताओं को स्वयं तय करना होता है कि कौन बड़ा है? उनकी इज्जत या उनकी कुर्सी?
 
यहां मूल प्रश्न यह है कि इतनी घोर असहमति के बावजूद यह सरकार एफडीआई लाने पर आमादा क्यों है? उसने अपनी इज्जत दांव पर क्यों लगा दी? इस संबंध में वामपंथी मित्रों का तर्क, तर्क कम, आरोप ज्यादा प्रतीत होता है। उनका मानना है कि रिश्वत देने के लिए कुख्यात ‘वालमार्ट’ आदि ने हमारे नेताओं को पटा लिया है। अमेरिकी पूंजीवादी प्रभाव का यह आरोप चार-पांच साल पहले भी उन्होंने लगाया था, परमाणु सौदे के वक्त! प्रमाणों के अभाव में इस तरह के आरोप हमें रद्द ही करने पड़ेंगे। लेकिन यह संभावना तो तर्कसंगत लगती है कि इस सरकार के नेता अपने स्वभाव, अनुभव और चरित्र के बंदी हैं, जैसे कि हर आदमी होता है। कांग्रेस के मौजूदा नेतागण (उसके कार्यकर्ता नहीं) जनता से कटे हुए हैं।
 
उन्हें सिर्फ उन मुट्ठीभर लोगों की चिंता, राष्ट्रीय चिंता प्रतीत होती है, जिनके बीच वे उठते-बैठते हैं। ये खाये-पिये-धाये लोग पूरे देश में 10-15 करोड़ से ज्यादा नहीं हैं। खुदरा कारोबार में बहुराष्ट्रीय कंपनियों की जरूरत इन्हीं लोगों को ज्यादा है। ये अपना पैसा पानी की तरह बहाते हैं। विज्ञापन देखकर इनका उपभोक्तावाद उद्दीप्त होता है। इस अमेरिकी वासना को तृप्त करने का काम बड़े-बड़े स्टोर्स करेंगे। ये स्टोर्स 10 लाख आबादी वाले शहरों में खुलेंगे। ये पहले तो लालच देंगे सस्ती चीजें बेचने का, साग-सब्जियों और फलों को सड़ने से बचाने का, किसानों को उचित दाम दिलाने का, अपने कर्मचारियों को ऊंची तनख्वाह देने का; लेकिन कोई इनसे पूछे कि आप भारत क्यों आ रहे हैं? क्या आपका कोई दान-पुण्य या धर्मादे का इरादा है? उनका एक ही मंत्र है। एक डालर फेंकें और अनेक डॉलर उठाएं।
 
इंडोनेशिया, मलयेशिया और थाईलैंड की मिसाल सामने है। एक वालमार्ट स्टोर का खुलना 1400 खेरची दुकानों को ले बैठेगा। देश के चार करोड़ दुकानदारों के सिर पर तलवार लटकेगी। 20 करोड़ लोगों की रोजी-रोटी प्रभावित होगी। करोड़ों छोटे किसान इन विदेशी कंपनियों की जमाखोरी और मुनाफाखोरी के शिकार होंगे। इससे बचने के लिए ही अमेरिकी सरकार अपने किसानों को 20 हजार करोड़ डॉलर की सालाना मदद देती है। 
 
क्या विदेशी कंपनियों की जेबें भरने के लिए भारत सरकार भी अपना खजाना लुटाएगी? अगर बाद में यही करना है, तो अभी देश में फसलों के लिए गोदामों और उनके परिवहन की व्यवस्था पर वह खर्च क्यों नहीं करती? अगर विदेशी कंपनियों को लालच देकर यहां बुलाने के पीछे मंशा यह है कि उनके व्यापार का बाद में राष्ट्रीयकरण करकेउनका माल हड़प लें तो और बात है। इस उस्तादाना इरादे के लिए बधाई!
 
वेदप्रताप वैदिक
 
प्रसिद्ध राजनीतिक चिंतक     
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