गुरु परहित की पाठशाला होते हैं
संसार में रहना आना चाहिए बजाय संसार को छोडऩे की जिद के। अभी भी कुछ लोगों को यह गलतफहमी है कि परमात्मा को पाने के लिए संसार छोडऩा पड़ेगा।
स्वामी रामसुखदासजी कहा करते थे- जैसे कोई रसोई बनाता है, पर उसे रसोई बनानी नहीं आती, तो रसोई नहीं बनती। अगर उसे रसोई बनानी आती है, पर वह रसोई बनाता ही नहीं, तो भी रसोई नहीं बनती। इसलिए किसी भी कार्य में ज्ञान और कर्म दोनों की आवश्यकता है।
एक पुराना सिद्धांत है, जैसे ही हम किसी से कुछ चाहते हैं, बस उसी समय हम उसके पराधीन होने लगते हैं। इसलिए अपनी चाहत को नियंत्रण में रखें और दूसरों की चाहत पूरा करने के लिए प्रयासरत रहें। ये दो बातें आने पर संसार में जीने की कला आ जाती है।
दूसरे की चाहत पूरा करने के लिए खुद के भीतर अपना कुछ छोडऩे की हिम्मत जागती है। यह भाव हमारे भीतर जागता है कि हम इस संसार में अपने लिए ही नहीं रह रहे हैं, बल्कि संसार के लिए संसार में हैं। यहीं से संसार द्वारा दिए जाने वाले कष्ट कम हो जाते हैं।
दूसरों को कैसे दिया जाता है, यह तरीका सीखना हो तो गुरु से सीखा जाए। गुरु परहित की पाठशाला होते हैं। जब हम किसी गुरु से यह पूछेंगे कि संसार में कैसे रहें? तो वे कोई चमत्कारी आशीर्वाद या मंत्र नहीं देंगे, वे एक विधि देंगे। हो सकता है वह मंत्र भी हो।
और यहीं से शिष्य, गुरु-शिष्य के नाते में पारंगत हो जाता है, संसार में रहते हुए परम शक्ति को पाने के लिए। गुरु कृपा से शिष्य ऐसा बर्फीला व्यक्तित्व बन जाता है, जो बाहरी गर्मी से नहीं पिघलता, बल्कि संसार रूपी सागर में बिना पिघले हुए सहज रूप से तैरता रहता है। पानी में रहकर भी पानी से अलग रहना, यही जीने की कला है।






