क्या हम कभी घपलों, घोटालों और विपदाओं की खबरों से ऊबते हैं? या क्या हम इन खबरों के आदी हो जाते हैं और एक सीमा के बाद हमें किसी भी बात से कोई फर्क नहीं पड़ता? एक थ्योरी कहती है कि एक समय के बाद हम बुराई पर ध्यान देना बंद कर देते हैं और किन्हीं दूसरी चीजों पर अपना ध्यान केंद्रित करने लग जाते हैं।
हम फुकुशिमा को भुला चुके हैं और भारत में और परमाणु प्लांट बनाने की तैयारी कर रहे हैं, जबकि हमारे यहां पहले ही इस तरह के 20 प्लांट हैं। हालांकि हम अच्छी तरह जानते हैं कि जापान और फ्रांस, जो कि परमाणु ऊर्जा की हिमायत करने वाले सबसे शक्तिशाली और महत्वपूर्ण देशों में से हैं, अन्य वैकल्पिक और सुरक्षित विकल्पों की तलाश में जुट गए हैं।
घोटालों के बारे में भी यही बात कही जा सकती है। एक के बाद एक नए घोटाले सामने आ रहे हैं और इसी के साथ उनके प्रति हमारा आश्चर्य और आक्रोश भी घटता जा रहा है। अब हम उनके बारे में मजाक करने लगे हैं। जिस उत्साह के साथ 2-जी घोटाले का पहले-पहल खुलासा किया गया था, वह अब लगभग ठंडा पड़ चुका है।
कैश फॉर वोट घोटाला, जिसके कारण अमर सिंह को तिहाड़ जेल भेजा गया, एयर इंडिया की स्थिति पर सीएजी की हालिया रिपोर्ट और कृष्णा-गोदावरी बेसिन का अजीबोगरीब घटनाक्रम, ये सभी खबरें चंद लम्हों की सुर्खियां साबित हुईं। एकाध दिन बीतते न बीतते ये समाचार फ्रंट पेज से खिसककर भीतर के पृष्ठों पर चले गए, जबकि इन मामलों में भी बड़े पैमाने पर पैसों का हेरफेर हुआ था।
आपने केतन पारेख के बारे में पिछली बार कब सुना था? क्या उनके विरुद्ध चल रहे सभी मामले अब भी जारी हैं? समय-समय पर खबरें आती रहती हैं कि वे फिर से बाजार में लौट आए हैं। लेकिन क्या मीडिया केतन पारेख के मामले में फॉलो-अप स्टोरी कर रहा है? कोई भी इस बारे में नहीं जानता।
क्या कोई बता सकता है कि तेलगी का क्या हुआ? उनके फर्जी स्टाम्प पेपर घोटाले का क्या हुआ? और इससे भी जरूरी यह कि उस घोटाले में लिप्त राजनेताओं और अफसरों का क्या हुआ? उनके केस का क्या नतीजा निकला? ऐसा क्यों है कि जिस हसन अली के केस में अरबों डॉलर लगे हैं, उसकी जांच आगे नहीं बढ़ रही है?
उन भारतीयों का क्या हुआ, जिनके नाम लेते हुए विकीलीक्स ने कहा था कि स्विस बैंक में उनके खाते हैं? मैं इस तरह के सौ बड़े घोटालों के नाम गिना सकता हूं, जिनमें दोषी चुपचाप सुर्खियों से बाहर सरक आए और फिर उसके बाद उनके बारे में किसी ने कोई बात नहीं की। इनमें से कुछ ने तो अपना कारोबार भी फिर शुरू कर दिया है और वे वही चीजें कर रहे हैं, जिनके लिए उन्हें दोषी ठहराया गया था।
एचडीडब्ल्यू से लेकर बोफोर्स और मौजूदा समय तक, सरकारें और घोटालेबाज एक सीधी-सी रणनीति अपनाते आ रहे हैं: केस को जनता की याददाश्त के दायरे से बाहर ले जाओ। दूसरे शब्दों में जनाक्रोश पर पानी फेर दो। एक बार जनता का गुस्सा ठंडा हो गया तो मामला भी अपने आप ठंडे बस्ते में चला जाएगा।
वे हमारी न्याय प्रक्रिया की धीमी चाल का भरपूर फायदा उठाना जानते हैं। कई मामलों को किसी नतीजे पर पहुंचने में सालों लग जाते हैं। मीडिया में निरंतरता का अभाव भी उनके लिए फायदे का सौदा साबित होता है और यही मूड अवाम का भी है।
हम कुछ देर के लिए उत्साहित और उत्तेजित होते हैं और फिर अपनी रोजमर्रा की जिंदगी के तनावों में लौट जाते हैं। क्या हम अब भी भारतीय क्रिकेट टीम के मैच देखते हैं? क्या हम सचिन या सहवाग या हरभजन या जहीर की चोटों के लिए संवेदना व्यक्त करते हैं? क्या हम अब भी सानिया मिर्जा के कॅरियर में दिलचस्पी लेते हैं? या क्या हम पहले की तरह यह जानने की कोशिश करते हैं कि तिहाड़ में कनिमोझी की डाइट क्या है?
एंडी वारहोल ने कभी यह भविष्यवाणी की थी कि एक न एक समय ऐसा आता है, जब 15 मिनटों के लिए सभी का नाम होता है (या शायद सभी बदनाम होते हैं)। मुझे लगता है यह भविष्यवाणी सच साबित हुई है। हर अपराध, हर घोटाला, हर घपला चंद लम्हों के लिए सुर्खियों में छाया रहता है और फिर हम अपना धर्य गंवा देते हैं और आगे बढ़ जाते हैं।
और इसी कारण अधिक से अधिक घोटाले होते हैं। स्पॉटलाइट हट जाने के बाद इस तरह के लोगों को लगता है कि वे फिर से अपने गलत धंधे शुरू कर सकते हैं। फिर चाहे वह कोई भ्रष्ट मंत्री हो या बेईमान पुलिसवाला, कोई घपलेबाज हो या घृणित अपराधी, वे सभी हमारी क्षणिक दिलचस्पियों की आरामगाह में पनाह लेते हैं।
वे जानते हैं कि एक समय के बाद यह खबर पुरानी पड़ जाएगी और वे फिर से अपनी परिपाटी पर लौट आएंगे। यहीं पर भ्रष्टाचार एक अहम भूमिका निभाता है। एक बार जनता का आक्रोश ठंडा हो जाए, तो गंभीर से गंभीर मामलों को भी आराम से दबाया जा सकता है।
इसलिए यदि अपराध और भ्रष्टाचार से लड़ाई लड़नी है तो हमें अपने लक्ष्य से कभी ध्यान नहीं डिगाना चाहिए। मीडिया को खबरों का फॉलो-अप करते रहना चाहिए। धर्य, उत्साह और निरंतरता के साथ मामलों की पड़ताल की जानी चाहिए। अपराधियों, घोटालेबाजों, भ्रष्टाचारियों को यह पता होना चाहिए कि वे जनता की आंख में धूल नहीं झोंक सकते।
वे कुछ गलत कर गुजरने के बाद मजे से बरी नहीं हो सकते। जहां मौजूदा खबरों पर नजर रखना सुर्खियां बनाने वालों का काम है, वहीं ऐसे पत्रकार और वेबसाइट्स भी होने चाहिए, जो पूरी तरह इस बात के लिए समर्पित हों कि आदर्श सोसायटी घोटाला और जे डे की हत्या जैसे मामले कहीं ठंडे बस्ते में न चले जाएं और एयर इंडिया को लूटने वाले हेडलाइनों से गायब न हो जाएं।
अगर हम ऐसा नहीं कर पाए तो हमें न्याय कभी नहीं मिल पाएगा और आपकी और मेरी जिंदगी भी कभी नहीं बदल पाएगी।