प्रकृति से जुड़ने का अवसर है पौधरोपण
रुकमानंद शर्मा
| Aug 28, 2012, 05:56AM IST

पिछले दिनों गांव गया था, वहीं बालगोपालों की यह सारी कवायद आम के बगीचे में दिखी। छोटी उम्र के ये बच्चे नहीं जानते थे कि पर्यावरण क्या होता है या हमारी धरती पर पनपने वाले पेड़-पौधे हमारे जीवन में कितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, या फिर जरूरी और संतुलित बारिश में उनका क्या योगदान होता है। बस, उन्हें इतना पता था कि आम का रोपा गया पौधा बड़ा होकर कैरी देगा, जो पककर रसीला आम बनेगा। कच्चे आम से टिफिन में रोटी के साथ ले जाने के लिए अचार भी बनेगा। स्वादिष्ट आम चूसने के बाद जो गुठलियां जमीन में दबाएंगे, उनसे निकले नन्हे पौधे बगीचे में सूखे आम के पेड़ों की जगह लेंगे। सावन-भादौ में इनकी शाखाओं पर झूले डाले जाएंगे, जिनमें बड़ों की गोद में बैठकर हम भी झूलेंगे।
बहरहाल, अब बात बड़ों की। हम बखूबी जानते हैं कि पेड़-पौधे पर्यावरण संतुलन में अहम भूमिका निभाते हैं। वैज्ञानिक तथ्य चाहे जो कहें या विज्ञान जिस तरह की व्याख्या करे, लेकिन इस सच से शायद अनपढ़ भी अनजान नहीं कि वृक्ष बारिश के लिहाज से भी बेहद जरूरी हैं। आंकड़े बताते हैं कि जिन क्षेत्रों में सघन वन होते हैं या पेड़-पौधे बहुतायत में होते हैं, वहां कंक्रीट के जंगलों की बनिस्बत बेहतर बारिश होती है। यह बरसात ही है कि जिसकी बदौलत वन क्षेत्रों में पनपी नमी से मिट्टी में दबे बीज वर्षाकाल में अपने आप अंकुरित होते हैं और समय के साथ पूर्ण आकार ले प्रकृति में सहयोग देते रहते हैं।
बावजूद इसके तथाकथित ‘जानकार’ बड़ों के बारे में क्या कहा जाए! हरियाली बढ़ाने के लिए मानसून के दौरान चलने वाले पौधरोपण कार्यक्रमों में उस उत्साह का एक अंश भी नहीं दिखता, जैसा वास्तव में दिखाई देना चाहिए। हां, पौधरोपण करते हुए फोटो खिंचवाने की बारी हो या यह पता हो कि इस आयोजन का समाचार प्रकाशित होगा, तो लोग पौधों को हाथ में लेने के लिए उत्सुक नजर आते हैं। ऐसी मानसिकता के बीच यहां पौधे लगाने के बाद उनकी सेवा-सुरक्षा की जिम्मेदारी लेने का तो प्रश्न ही नहीं उठता। अपने आंगन, बाड़ी या खाली सार्वजनिक जगह पर स्वप्रेरणा से पौधे रोपने की ‘जहमत’ भी कितने लोग उठाते हैं? क्या हम ऐसे रवैये के साथ बिगड़े पर्यावरण संतुलन को कभी साध पाएंगे या फिर कमजोर मानसून के चलते लगातार गहराती पेयजल समस्या के साथ ही गिरते भूजल से सिंचाई में आ रही दिक्कतों से पार पा सकेंगे? जिस तरह से गांव-ढाणियों और शहरी क्षेत्रों से हरियाली का सफाया किया जा रहा है, उसकी पूर्ति कभी हो सकेगी?
यह संभव होगा इसी बारिश में। जरूरी है कि हर व्यक्ति प्रकृति के प्रति अपना दायित्व निभाते हुए फल और छाया के अलावा इमारती लकड़ी देने वाले पौधे भी रोपे। न सिर्फ रोपे, बल्कि अगले मानूसन तक उनकी साज-संभाल भी करे। सम्मिलित प्रयासों से ही हम धरती को हरा-भरा बना सकेंगे। आइए पौधरोपण करके प्रकृति से जुड़ने और उसका ऋण उतारने की एक कोशिश करें।






