‘होमवर्क’ से छुट्टी नहीं!
Source: चेतन भगत | Last Updated 00:21(01/12/11)
रिटेल में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) पर संसद में जो कोहराम मचा है, उससे मुझे अपने बचपन की एक घटना याद हो आई। बात तब की है, जब मैं सातवीं क्लास में था। हमारी सख्त टीचर ने हमें एक मुश्किल होमवर्क दिया। निर्धारित दिनांक आई, लेकिन बहुत कम स्टूडेंट्स होमवर्क पूरा कर पाए थे। यह लगभग तय था कि हमें पनिशमेंट मिलेगी। तभी हमारे एक साथी के दिमाग में एक आइडिया आया। उसने एक खाली डेस्क के नीचे दिवाली का बम लगा दिया।
जैसे ही टीचर आईं, जोर से धमाका हुआ। वे घबराकर बाहर चली गईं और अपने साथ हेड मिस्ट्रेस को लेकर लौटीं। तफ्तीश चलती रही कि यह हरकत किसने की थी। हमें अपने अभद्र व्यवहार पर लेक्चर भी दिए गए, लेकिन दोषी को पकड़ा नहीं जा सका। क्लास का समय निकल गया। हमने राहत की सांस ली।
रिटेल एफडीआई भी हमारी सरकार का ऐसा ही एक बम है, ताकि शीतकालीन सत्र के दौरान उसके वास्तविक Rहोमवर्कञ्ज से जनता का ध्यान हट सके। इस सत्र में लोकपाल विधेयक, कालेधन की जांच और महंगाई जैसे अहम मसलों पर विचार किया जाना है, लेकिन रिटेल एफडीआई के धमाके ने उस हर सांसद को नए उत्साह से भर दिया है, जो स्थानीय कारोबार का हिमायती होने का दम भरता है।
आर्थिक असुरक्षा से ग्रस्त अवाम के समक्ष उन्हें केवल ‘देशी बनाम विदेशी’ का नारा बुलंद करना था और उन्हें समर्थन मिलना तय था। इस शोर-शराबे में नई नीति के गुण-दोषों पर चर्चा करना बेतुका होगा। अब यह मसला भावनात्मक हो गया है और अब इसमें तर्क व विवेक का कोई जोर नहीं चलने वाला। लेकिन तर्क और विवेक का तकाजा तो यही है कि हम एफडीआई पर नाक-भौं नहीं सिकोड़ सकते।
भारत की विशाल आबादी की आकांक्षाओं की पूर्ति केवल पूंजी के आंतरिक प्रवाह से नहीं हो सकती। हम आज भी एक गरीब देश हैं और देश में जितना पैसा आएगा, उससे अंतत: देश को ही लाभ होगा। हमारे कई क्षेत्रों में एफडीआई के कारण सेवा का स्तर सुधरा है और घरू उद्योग भी अपना अस्तित्व बनाए हुए हैं। हां, प्रत्यक्ष विदेशी निवेशकों को भी रिटर्न मिलता है, लेकिन हैंडआउट की तरह नहीं।
भारत में विदेशी बैंकों के आगमन के बावजूद हमारी बैंकें फलती-फूलती रहीं। टेलीकॉम, इंश्योरेंस, सॉफ्टवेयर जैसे कई क्षेत्रों में एफडीआई के प्रभावी परिणाम रहे। अगर किन्हीं क्षेत्रों में एफडीआई अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाया तो इसकी वजह थे हमारे भारी-भरकम नियम-कायदे, जिन्होंने वास्तव में कभी उन क्षेत्रों को व्यवसाय के लिए सुलभ नहीं बनाया था।
रिटेल एफडीआई एक संवेदनशील विषय है, लेकिन इसकी संभावना कम ही है कि वह हमारे घरू किराना बाजार को समाप्त कर देगा। भारत के मेगा कॉपरेरेशन पहले ही रिटेल क्षेत्र में पदार्पण कर चुके हैं, लेकिन इसके बावजूद हमारे पड़ोस की किराने की दुकानें चल रही हैं। इन मेगा रिटेल चेन्स ने उपभोक्ताओं को शॉपिंग का बेहतरीन अनुभव प्रदान किया है। उन्होंने रोजगार के अवसर भी निर्मित किए हैं। फिलीपींस, थाईलैंड, मलयेशिया, चीन सभी ने विदेशी रिटेल स्टोर्स को हरी झंडी दिखाई है और इसका उनके रोजगार पर उल्लेखनीय सकारात्मक प्रभाव पड़ा है।
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बहरहाल, यूपीए की मंशा भले ही सही मालूम पड़ती हो, लेकिन उसने इस मामले को बहुत खराब तरह से हैंडल किया है। इससे एक बार फिर सर्वसम्मति के निर्माण में कांग्रेस की अक्षमता और अनिच्छा उजागर हुई है। विपक्षी दलों और गठबंधन के सहयोगियों को तो छोड़ ही दें, कांग्रेस के भी कई सदस्यों को यह नीति नहीं भायी। फेमिली ब्रांड की ताकत अब भी असहमति के सुरों को दबाए रखती है, लेकिन फिर भी यदा-कदा कुछ कर्कश स्वर उभर ही जाते हैं। रिटेल एफडीआई के ड्रामे ने भाजपा की भी एक चिरस्थायी समस्या को उजागर किया और वह है अनाप-शनाप बयानों पर रोक लगाने में उसकी अक्षमता।
भाजपा की एक नेत्री ने इच्छा जताई कि वे वालमार्ट स्टोर्स को जलाकर राख कर देना चाहती हैं। बहुत खूब। अमेरिका में हमारे हजारों सॉफ्टवेयर प्रोग्रामर काम कर रहे हैं। हमारे कॉल सेंटर्स ने अमेरिका से कई नौकरियां छीन ली हैं। क्या उन्हें भी हमें जलाकर राख कर देना चाहिए? भाजपा के पास कई अच्छे नेता और वक्ता हैं, लेकिन दुख की बात है कि ऐसे अवसरों पर उन्हें किनारे कर दिया जाता है और इस तरह के वक्ताओं को मंच पर केंद्रीय स्थान प्रदान कर दिया जाता है। क्या हमारे देश के युवाओं को ऐसे नेताओं को वोट देना चाहिए, जो वैध व्यवसायों को जला देने की बात करते हैं?
अभी तक रिटेल एफडीआई एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने का फ्री-फॉर-ऑल आयोजन बना हुआ है, लेकिन अगर हम इस मामले को लेकर विवेकसंगत होना चाहते हैं तो तीन सुझावों पर विचार किया जाना चाहिए। पहली बात यह कि हमारे सांसदगण पहले अपना होमवर्क पूरा करें और वह है लोकपाल सहित कई अन्य प्रस्तावित विधेयकों पर निर्णय। वालमार्ट कुछ दिन प्रतीक्षा कर सकता है।
टीशर्ट पर सुपरस्टार ऑफर की तुलना में भ्रष्टाचार मुक्त भारत अधिक महत्वपूर्ण है। दूसरी बात यह कि इस बवाल के कारण संसद के शीतकालीन सत्र में कार्य के जितने घंटों का नुकसान हुआ है, उनकी भरपाई सांसदों द्वारा ओवरटाइम कर की जाए, फिर चाहे इसके लिए उन्हें छुट्टियों के दिन भी काम क्यों न करना पड़े। तीसरी बात यह कि सरकार विनम्रतापूर्वक एफडीआई के मसले पर एक नीतिगत सर्वसम्मति का निर्माण करे और वह भी केवल रिटेल ही नहीं, बल्कि हर क्षेत्र में, ताकि आगे कभी किसी क्षेत्र में एफडीआई हो तो देश में गतिरोध की स्थिति न निर्मित हो।
मैं अपने स्कूल की कहानी पर वापस लौटता हूं। अगले दिन टीचर क्लास में आईं और उन्होंने होमवर्क के बारे में पूछा। जिन बच्चों ने होमवर्क नहीं किया था, उन्हें पनिशमेंट मिली और पिछले दिन के बम धमाके के कारण पनिशमेंट पहले से भी ज्यादा सख्त थी। ध्यान भटकाना क्षणिक रूप से उपयोगी जरूर हो सकता है, लेकिन अंतत: होमवर्क तो करना ही पड़ता है! - लेखक अंग्रेजी के प्रसिद्ध युवा उपन्यासकार हैं।