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डरावनी कहानियों का रोमांच

रस्किन बॉन्ड | Aug 25, 2012, 00:38AM IST
 
 

अनिल की मां के पास लोककथाओं का खजाना था और कई बार तो वह नटखट परियों तथा शरारती भूतों की कहानियों से हमें अचंभे में डाल देती थीं। एक रात अनिल के पिता शहर से बाहर गए थे। कमल और मुझे उसके बाजार स्थित घर में रात रुकने के लिए बुलाया गया था। वहां उसकी मां ने हमें उन तमाम तरह के भूतों के बारे में बताना शुरू किया, जिन्हें वह जानती थी। तभी मुलिया नाम की नौकरानी नहाने के बाद अपने बाल खोले हुए बरामदे में पहुंची।
‘बिटिया, तुम्हें इस तरह अपने बाल खुले नहीं रखने चाहिए।’ अनिल की मां बोलीं, ‘बेहतर है कि तुम इन्हें बांध लो।’ मुलिया ने कहा, ‘लेकिन अभी तो मैंने इनमें तेल भी नहीं लगाया है।’


‘कोई बात नहीं, लेकिन तुम्हें सूरज डूबने के बाद अपने बाल खुले नहीं छोड़ने चाहिए। कुछ जिन्न लंबे बालों और तुम्हारी तरह खूबसूरत आंखों से खिंचे चले आते हैं। हो सकता है कि वे तुम्हें फुसलाकर भगा ले जाएं।’ मुलिया के मुंह से निकला, ‘कितनी भयंकर बात है!’ और उसने झटपट बालों को बांधा और फिर भीतर सुरक्षित जगह की ओर भाग गई। कमल, अनिल और मैं एक खाट पर बैठे थे और ठीक सामने दूसरी खाट पर अनिल की मां। वह 32 साल से ज्यादा की नहीं थीं और अक्सर अनिल की बड़ी बहन समझ ली जाती थीं। वह मथुरा के पास के एक गांव से आई थीं, जो इलाका देवताओं, आत्माओं और दैत्यों के लिए प्रसिद्ध है।


मैंने पूछा, ‘आंटीजी, क्या आप जिन्नों को देख सकती हैं?’ वह बोलीं, ‘कभी-कभार। मथुरा में एक उर्दू मास्टर हुआ करते थे, जिनके छात्र तुम्हारी ही उम्र के थे। एक लड़का अपने सबक याद करने में बड़ा अच्छा था। एक दिन जब वह कक्षा के कोने में अपनी मेज पर बैठा था, तभी मास्टरजी ने उससे कमरे के पीछे की ओर रखी अलमारी में से एक किताब निकालकर लाने के लिए कहा। वह लड़का सुबह से ही अलसाया हुआ था। उसने बस अपना हाथ बढ़ाया, किताब निकाली और मास्टरजी को थमा दी। हर कोई भौचक रह गया, क्योंकि अलमारी तक पहुंचने के लिए लड़के का हाथ चार गज लंबा हो गया था। तब उन्हें पता चला कि वह तो जिन्न था। यही वजह थी कि वह खेल और कसरत में बहुत बढ़िया था, जिनमें चुस्ती-फुर्ती की जरूरत होती है।’ अनिल बोला, ‘काश, मैं जिन्न होता, खासतौर पर वॉलीबॉल मैचों के लिए।’


फिर उसकी मां ने हमें उजाड़ पीपल के पेड़ पर रहने वाले शरारती भूत मुंजिया के बारे में बताया। उनका कहना था कि जब कोई मुंजिया कुपित हो जाता है, तो वह पेड़ से बाहर आकर तांगा, बैलगाड़ियों और साइकिलों को उलट-पलट देता है। यहां तक सुनते हैं कि एक बार उसने एक बस को भी उलट दिया था। अनिल की मां ने हमें चेताया, ‘जब कभी रात में पीपल के नीचे से गुजरो, तो मुंह ढंके बगैर या उसके सामने अपनी उंगलियां रखे बिना जम्हाई मत लो। यदि तुमने भूल से भी ऐसा कर दिया, तो मुंजिया तुम्हारे गले में कूदकर पेट को पूरी तरह बिगाड़ देगा।’
विषय बदलने की कोशिश में कमल ने अपने एक दोस्त के बारे में बताया, जिसे एक सुबह अपने बिस्तर पर सांप मिला था।


अनिल की मां ने चिंतित स्वर में पूछा, ‘क्या तुम्हारे दोस्त ने उसे मार डाला?’ कमल ने जवाब दिया, ‘नहीं, वह सरककर भाग गया।’ वह बोलीं, ‘यह अच्छा हुआ। सुबह-सुबह सांप देखना सौभाग्य की बात होती है।’
मैंने पूछा, ‘लेकिन यदि सांप काट ले, तो?’ उन्होंने कहा, ‘अगर तुम उससे छेड़छाड़ न करो और अकेला ही छोड़ दो, तो वह तुम्हें नहीं काटेगा।’


इस बीच हमने खाना खाया तथा कुछ और भूतिया कहानियां सुनीं। इनमें अनिल की दादी मां के बारे में भी एक कहानी थी कि किस तरह उनकी आत्मा परिवार में विचरने आई थी। तब तक ग्यारह बज चुके थे। कमल और मैं इस मंडली को बरामदे में छोड़कर सोने के लिए दूसरे कमरे में जाने से कतरा रहे थे। अनिल की मां ने कहा कि शरारती प्रेतात्माओं को दूर रखने के लिए हमें कुछ चमत्कारिक छंदों का पाठ करना चाहिए, लेकिन हमारा डर इनसे जरा भी कम नहीं हुआ। हमने यह एक कविता दोहराने की कोशिश की-
‘भूत, प्रेत, पिशाच, दाना
छू-मंतर, सब निकल जाना,
मानो, मानो, शिव का कहना..’


..परंतु हम जितना ज्यादा इसे दोहराते, उतना ही असहज होते जाते थे। मैंने बिस्तर पर जाने से पहले बहुत जांच-परख कर यह देखने की कोशिश की कि कहीं वहां सांप तो नहीं है। पर मैं स्थिर सो ही नहीं पाया। लगातार करवटें बदलता रहा और मुड़-मुड़कर दीवार पर चलती-फिरती छायाओं की टोह लेता रहा। कमल ने धीमी आवाज में गाकर हौसला बढ़ाने की कोशिश भी की, लेकिन इससे उल्टे माहौल और भी डरावना हो गया। थोड़ी ही देर बाद हमने दरवाजे पर दस्तक सुनी, साथ ही अनिल व नौकरानी मुलिया की आवाज भी आई। मैंने उठकर दरवाजा खोला। वे पीले पड़ गए थे और चिंतित लग रहे थे। अनिल की मां द्वारा सुनाई गई कहानियों के असर से वे भी डरे हुए थे। अनिल ने पूछा, ‘तुम लोग ठीक तो हो? क्यों नहीं तुम हमारे साथ ही सोते? ऐसा करना ज्यादा सुरक्षित होगा। बिस्तर वहां तक पहुंचाने में मुलिया हमारी मदद कर देगी।’


‘हम तो बिल्कुल ठीक हैं।’ कमल और मैंने अपने भय को छुपाते हुए प्रतिवाद किया। लेकिन हम लोग लगभग धकियाते हुए घर के दूसरे हिस्से में ले जाए गए, मानो भूतों की कोई टोली हमारे खिलाफ साजिश रच रही हो। इन तमाम गतिविधियों के दौरान अनिल की मां वहां नहीं थीं, तभी अचानक हमने उस कमरे की ओर से आती उनकी चीख सुनी। यह वही कमरा था जिसे हम अभी-अभी छोड़कर आए थे। वह दहाड़ें मार रही थीं, ‘लॉरी और कमल गायब हो गए हैं। उनके बिस्तर भी जाने कहां उड़ गए हैं।’


और फिर जब वह बरामदे में पहुंचीं और हमें अपने-अपने पैजामों में मुस्तैद देखा, तो उन्होंने एक बार फिर चीख मारी और गश खाकर वहीं खटिया पर गिर पड़ीं।
इसके बाद हमने फिर कभी उन्हें रात में हमें भुतहा कहानियां सुनाने का मौका नहीं दिया।

लेखक पद्मश्री से सम्मानित ब्रिटिश मूल के साहित्यकार हैं।
 
 
 

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