खुदरा के खेल में कैसे-कैसे गणित
Source: एम.जे. अकबर | Last Updated 00:07(27/11/11)
यदि यह जारी आर्थिक सुधारों की ही एक और कड़ी होती, तो खुदरा व्यवसाय में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति का निर्णय कम से कम दो साल पहले ले लिया गया होता। डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार साढ़े सात साल पहले अपनी ताजपोशी के क्षण से ही इसके पक्ष में रही है, पर खटका था तो सिर्फ वामपंथियों का, जिनके समर्थन के बगैर वह अपने पहले कार्यकाल में लोकसभा में बहुमत नहीं जुटा सकती थी।
सो, इसे आसानी से समझा जा सकता है। कोई भी समझदार सरकार किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी के फायदे के लिए अपने अस्तित्व को ही दांव पर नहीं लगा सकती। लेकिन 2009 के आम चुनावों ने लोकसभा के अंकगणित को नाटकीय रूप से बदल दिया और इसके साथ ही बदल गया नीतिगत पैंतरों का बीजगणित।
बहरहाल, वामपंथियों के ह्रास से एक बुनियादी तथ्य नहीं बदला: खुदरा में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के विरोध ने दलगत सीमाओं को मिटा दिया है। सरकार के पास नमनशील कैबिनेट में बहुमत का सहारा तो है, पर कहीं कम आज्ञाकारी लोकसभा में ऐसा नहीं है। भारत पर हुकूमत करने वाले गठबंधन में दरार जरूर पड़ गई है, पर यह टूटा नहीं है।
आखिर किस चीज ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और उनके वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी को एक ऐसे निर्णय पर जोर देकर इस तरह की दरार को सामने लाने के लिए उकसाया, जिसे ठंडे बस्ते में रखा जा सकता था? न ही दोनों ने प्रशासन में इस तरह का बीड़ा उठाने की कोई सैद्धांतिक कसम खाई है। दोनों ही अपनी खूबियों और महत्व वाले किसी नीतिगत बदलाव पर दो-दो हाथ करते हुए खेत रह जाने की बजाय छोटे-मोटे संघर्ष से पीछे हटकर पूरी तरह हारने से बचना चाहेंगे।
और नीतिगत बदलाव भी ऐसा, जो तत्काल ही कलाबाजी सरीखे घुमाव की दरकार नहीं करता। वे जानते थे कि प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को समर्थन बेहद कमजोर है, भले ही वह रक्षामंत्री एके एंटनी सरीखे वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं के बीच हो, जो डांवांडोल सूची में शीर्ष पर थे। और फिर जैसा कि हुआ, एंटनी निर्णायक कैबिनेट बैठक में लड़खड़ाए, लेकिन सीमा से बाहर नहीं गिरे।
एंटनी अकेले नहीं हैं। कांग्रेस के एक हिस्से के बारे में माना जाता है कि अभिमत के मामले में वह वामपंथी है और इंटरनेशनल रिटेल चेन्स के मुद्दे पर खुद को मार्क्सवादी दृष्टिकोण के निकट पाता है। यहां तक कि पार्टी का व्यापक व्यावहारिक बुनियादी हिस्सा भी हैरान है कि उत्तर प्रदेश जैसे अहम राज्य के आसन्न चुनाव के मौके पर असरदार स्थानीय बाजार, छोटे शहरों के विक्रेताओं और आपूर्तिकर्ताओं को दूर कर देने के लिए क्या यही सही पल था? यह बदलाव उन लोगों को प्रभावित कर सकता है, जो भारतीय अर्थव्यवस्था को अंतरराष्ट्रीय सांचे में ढाल रहे हैं, लेकिन घरेलू राजनीतिक मोर्चे पर यह बेमतलब ही है।
अगर मंडी के दुकानदारों को लगता है कि विदेशी लोग आपूर्ति और खरीद की श्रंखला के जरिए अपनी रोजी-रोटी चलाने वालों को पूरी तरह खत्म कर देने की क्षमता से लैस होकर आने वाले हैं और इस धारणा के चलते कांग्रेस यूपी में 10 अतिरिक्त विधानसभा सीटें खो देती है, तो फिर कांग्रेस की किस्मत पर इसका मनोवैज्ञानिक असर गिनती की चंद सीटों की तुलना में कई गुना अधिक हो सकता है।
अगर यह निर्णय एक साल से ज्यादा की कुटाई और चोटों के बाद कायाकल्प दिखाने के ध्येय से था, तो बंगाल में ममता बनर्जी और तमिलनाडु में करुणानिधि के साथ निर्णय-पूर्व समझाने-बुझाने वाली कूटनीति करते हुए सिंह और मुखर्जी को यह सुनिश्चित कर लेना चाहिए था कि गठबंधन अटूट बना रहे। अब तृणमूल और डीमके की एक टांग सरकार के भीतर है, तो दूसरी बाहर! यह बड़ा भद्दा नजारा है।
रेलमंत्री दिनेश त्रिवेदी कोलकाता की अपनी नेता की अनुमति के बगैर इस अहम मंत्रिमंडलीय बैठक के दौरान प्रणब मुखर्जी को आड़े हाथों नहीं ले सकते थे। डीएमके सांसद टीआर बालू ने इससे रोजगार निर्मित होने के सरकारी दावे की दृढ़ता से यह कहकर खिल्ली उड़ा दी कि इससे तो रोजगार के अवसर घटेंगे। इसकी बजाय, सरकार ने अपने ही सहयोगियों के विरोध का निर्णय लिया।
क्यों?
राजनीति में ऐसी भी विरोधाभासी परिस्थितियां होती हैं, जब कमजोरी अस्थायी गुण हो सकती है। शायद कांग्रेस यह समझ गई है कि न तो तृणमूल और न ही डीएमके ऐसी स्थिति में है कि सुनियोजित शोर-शराबे से ज्यादा कुछ कर सके। वे सरकार गिराने का दुस्साहस नहीं कर सकते, क्योंकि मध्यावधि चुनाव में उनके पास पाने को कुछ नहीं होगा, पर खोने को बहुत कुछ होगा।
गठबंधन सहयोगी के तौर पर कीमतों में वृद्धि और गलत नेतृत्व का आरोप उन पर भी होगा। ऐसी संभावना नहीं है कि मतदाता उनकी स्तुति करेगा और अकेले कांग्रेस को ही दंड देगा। विरोधाभास एक कदम आगे भी बढ़ सकता है। हो सकता है कि अपने इस कार्यकाल के चौथे साल में कांग्रेस इतनी कमजोर हो जाए कि गठबंधन सहयोगी किसी जनवादी मुद्दे को दरार डालने और अंतत: गठबंधन तोड़ने के सुअवसर के रूप में देखने के लिए प्रेरित हो जाएं।
लेकिन यहां एक और संभावना है। डॉ. मनमोहन सिंह और प्रणब मुखर्जी को शायद यह एहसास हो चला है कि घड़ी ने उल्टी दिशा में टिक-टिक शुरू कर दी है और सत्ता में उनका कालखंड चुकने लगा है। कांग्रेस के भीतर एक हो-हल्ला करने वाली लॉबी संभवत: श्रीमती सोनिया गांधी के समर्थन से यह तर्क देने लगी है कि पार्टी अगले चुनाव का सामना कर सके, इसके लिए एक ही रास्ता है- नए नेता का चुनाव और वह नेता अगली पीढ़ी के सिर्फ राहुल गांधी ही हो सकते हैं। चूंकि राहुल गांधी को अपनी साख बनाने के लिए कुछ समय जरूरी होगा, यह बदलाव अगली गर्मियों तक हो सकता है। अनुमान है कि राष्ट्रपति चुनाव में अपने प्रत्याशी के निर्वाचन के जरिए बुजुर्ग पीढ़ी पार्टी के लिए अपनी आखिरी सेवा देगी और इसके बाद नए युग की औपचारिक शुरुआत की जा सकती है।
राजनीति में समय का निर्धारण किसी अकेले कारक के आधार पर नहीं होता। लेकिन हमेशा एक निर्णायक कारक होता है। दो पेशकश की गई हैं, अपनी पसंद बताइए। लेकिन 2012 के लिए तैयार हो जाइए। आगे ढेर सारा रोमांच इंतजार कर रहा है। - लेखक द संडे गार्जियन के संपादक और इंडिया टुडे के एडिटोरियल डायरेक्टर हैं।