न बताओ न जानो, बस ढंको-छुपाओ
Source: एम.जे. अकबर | Last Updated 01:48(06/11/11)
बायलाइन .
क्या ‘निम्न मध्यम वर्ग’ का होना अपराध की तीव्रता को कम करने के लिए पर्याप्त है? लंदन के साउथवार्क क्राउन कोर्ट के जस्टिस जेरेमी कुक अलग तरह के नहीं हुए, जब उन्होंने 19 साल के मोहम्मद आमेर को टीम में उसके साथियों की तुलना में नर्म सजा सुनाई। उसके ये साथी थे, पाकिस्तानी क्रिकेट टीम का नियमित खिलाड़ी मोहम्मद आसिफ और कप्तान बनने के लिए पर्याप्त वरिष्ठता रखने वाला सलमान बट्ट।
ईमानदारी से कहें, तो जस्टिस कुक विनम्र होने की तुलना में ज्यादा संरक्षक हो रहे थे, हालांकि उन्हें यह जानकर थोड़ी हैरानी हो सकती है कि जरूरी नहीं, पाकिस्तान के पंजाब का ग्रामीण इलाका अनिवार्यत: गरीबी का आईना ही हो। कोई भी आमेर की मां, नसीम अख्तर की तारीफ जरूर करेगा, जो चंगा बंग्याल नामक गांव में परिवार के साथ रहती है और जिसने अपने प्यार को इजाजत नहीं दी कि वह स्पष्टता पर कुहासा बने। घमंडी बट्टों के आचरण की तरह वह न तो रक्षात्मक हुई, न आक्रामक। उसकी संवेदनाएं और निर्णय पूरी तरह से फरेब या लोभ से रिक्त थे।
उसने अपने बेटे को इसलिए माफ नहीं किया कि वह मासूम था, बल्कि इसलिए क्योंकि वह इतना छोटा था कि जानता ही नहीं था क्या कर रहा है। उसने कहा, ‘बच्चे गलतियां करते हैं। आमेर भले ही क्रिकेट में बड़ा नाम बन गया, लेकिन वह अभी बच्च ही है।’ कोई मां हमेशा ही अच्छी जज नहीं होती, लेकिन नसीम अख्तर ऐसी मां है, जिस पर मांएं गर्व कर सकती हैं।
लेकिन यह समझा जा सकता है कि यह गर्व पाकिस्तानियों द्वारा साझा नहीं होता। एक ऐसी पीढ़ी, जो खून-खराबे के झंझावातों में बड़ी हुई है और चाहे सामान्य आइकॉन हों या राजनेता, जिसने हर आइकॉन से अति विश्वासघात का अवसाद झेला है, उस पीढ़ी ने ताजी के झोंके के तौर पर क्रिकेटरों को देखा था।
क्रिकेट टीम न सिर्फ व्यक्ति उपलब्धि का प्रतीक बन गई, बल्कि यह इस बात का प्रतीक भी बन गई कि कैसे एक सफल पाकिस्तान सामने आ सकता था, अगर यह छल-कपट, बेईमानी, अनेकता और लालच से संक्रमित न हुआ होता, जिन्होंने देश के कर्णधारों को सिर से पांव तक भिगो दिया था। तथ्य यह है कि क्रिकेट अभिजात वर्ग की शिथिल पकड़ से निकलकर शहरी मोहल्लों और गांवों की धूल तक पहुंच चुका है। अब यह यथार्थ में जनता का खेल है, न कि एक्सक्लूसिव क्लबों के बीच दोपहर की मुठभेड़, जहां सदस्य बार खुलने का इंतजार कर रहे होते हैं। किसी अपने के द्वारा छला जाना हमेशा ज्यादा सालता है।
नसीम अख्तर के गांव के एक फेरीवाले ने एक अंग्रेजी अखबार के प्रतिनिधि से कहा कि वह खुश है- या ज्यादा सटीक, चिंतामुक्त है- कि यह कांड इंग्लैंड में उजागर हुआ, क्योंकि पाकिस्तान में कभी भी न्यायसंगत अदालती कार्यवाही और सजा हुई ही नहीं होती।
लोग भरोसा करते हैं, जब इयान बॉथम सरीखे स्पष्टवादी चैंपियन कहते हैं कि भ्रष्टाचार ‘हर जगह है, हम जानते हैं कि यह एक महामारी है’। बॉथम शायद पर्याप्त कह चुके थे, इसलिए उन्होंने यह नहीं जोड़ा कि यह महामारी चारों तरफ एक लंबे समय से रही है और जब तक बहुत ज्यादा सबूत छलक न आए हों, एेसे अपवादों को छोड़कर क्रिकेट प्रतिष्ठानों ने ‘मत बताओ, मत जानो, ढको-छुपाओ’ खेल में ही हिस्सा लिया है। चूंकि भारत और पाकिस्तान जैसे देशों में क्रिकेट और राजनीति ग्लैमर उद्योग हैं, जो एक-दूसरे में पोषण ढूंढ़ते हैं, राजनीति का कांच जितना संभव है, दोषसिद्धि से बचाव करता है और जब-जब कर सकता है, उन्हें प्रमोट करता है।
एक पूर्व भारतीय कप्तान, अजहरुद्दीन पर बीसीसीआई द्वारा आजीवन प्रतिबंध लगाया गया था, जो सत्यनिष्ठा की बात आने पर शायद ही सबसे आक्रामक प्रतिष्ठान होता हो। अजहरुद्दीन अब सांसद हैं, जो उम्मीद करते हैं कि किसी दिन खेल मंत्री बनेंगे। वे बीसीसीआई के निर्णय के खिलाफ न्यायिक अपील रूपी तिनके के जरिए बचे हुए हैं। बुकीज के साथ मेलजोल करते, उनके साथ सफर करते खिलाड़ियों की तस्वीरें छपी हैं और बीसीसीआई उन्हें नहीं देख सकती।
मशहूर है कि एडमिरल नेल्सन के पास एक दृष्टिहीन आंख थी। बीसीसीआई के पास दो हैं। ऑस्ट्रेलियाइयों द्वारा दिए गए संकेतों से क्या हुआ, जब उन्होंने शेन वार्न और मार्क वॉ (लंबे समय तक कप्तान रहे स्टीव वॉ के भाई) पर एक खास ‘जॉन द बुकमेकर’ तक सूचनाएं पहुंचाने को लेकर 10-10 हजार डॉलर का जुर्माना लगाया? यह राशि उनकी आय के आगे कुछ नहीं। वार्न फिलहाल टीवी प्रसारण के हीरो हैं। कोई खिलाड़ी जितना जा सकता है, उतना आगे जाकर अंग्रेज कप्तान एंड्रयू स्ट्रॉस ने क्रिकेट प्रशासकों पर ‘संकल्प शून्य’ होने का अभियोग लगाया। यह संकल्प की गैरमौजूदगी नहीं है, पर बिकाऊपन की मौजूदगी है।
पाकिस्तानी खिलाड़ी और बेशक उनके प्रशासक भी अपनी एक अलग ही श्रेणी में हैं। क्रिकेट की शिक्षाओं में यह कहानी भी शामिल रहती है कि कैसे पूरी टीम ने कराची में इंग्लैंड के साथ टेस्ट मैच में हार का निर्माण किया था। इस तरफ का कम से कम एक सदस्य, एक बढ़िया गेंदबाज, जो व्यापक तौर पर इस कांड के बड़े खिलाड़ी के रूप में देखा जाता रहा है, अब एक स्पोर्ट्स चैनल का चेहरा है। जब मोहम्मद आसिफ के पिता हसन दीन ने अपने पुत्र की अपराध सिद्धि के बारे में जाना, तो उन्होंने एक संक्षिप्त पंजाबी वाक्य में अपने देश के क्रिकेट क्षेत्र का निचोड़ ही बता दिया। उन्होंने क्रिकेट की व्याख्या अपराधियों के खेल के रूप में की।
स्पष्ट है कि यह समूचे सच से काफी दूर है, लेकिन रोष जताने के लिए पर्याप्त अपराध है। इमरान खान पाकिस्तान में राजनीतिक पायदान पर तेजी से क्यों चढ़ गए, इसके अनेक कारण हैं, लेकिन क्रिकेट उनमें से एक है। खलनायकों की लंबी होती अपनी सूची के बावजूद क्रिकेट ऐसा सरोवर उपलब्ध कराता है, जहां से नायक अब भी उभर सकते हैं। एक चमकदार करियर के दौरान इमरान खान की चौकस ईमानदारी उन्हें वह प्रतीक बनाती है, जो लगातार सही दिशा में बढ़ सकता है, भले ही बाकी सब गलत दिशा में जा रहा हो।
- लेखक द संडे गार्जियन के संपादक और इंडिया टुडे के एडिटोरियल डायरेक्टर हैं।