वैचारिक कंगाली और हमारी बैसाखियां

लोगों के पास जब विचारों का टोटा होता है तो वे दूसरी चीजों का सहारा लेने लगते हैं। इनमें सबसे पहले आता है 'पैसा', जिसका लोग बेवकूफों की तरह अक्सर सहारा लेते हैं। जिन लोगों को अपने आत्मसम्मान का ख्याल नहीं होता, उनका पहला तर्क अमूमन यही होता है- यदि मेरे पास ढेर सारा धन होता, तो मैं इसे कर सकता था। यह बात कतई सच नहीं है।
यदि आपके भीतर कुछ करने का इरादा नहीं है तो पैसा होने के बावजूद आप कुछ नहीं कर सकते। और यह भी तय है कि आप किसी सटीक आधार, स्पष्ट रणनीति या गेमप्लान के बगैर कुछ कर भी नहीं पाएंगे।
संक्षेप में कहें तो बगैर किसी विचार के आप कुछ नहीं कर सकते। किसी विचार के बगैर, उस विचार के साथ चलने वाली किसी बौद्धिक या भावनात्मक ताकत के बगैर सिर्फ खाली बैठकर यह सपने देखना कि पैसा होता तो मैं यह कर लेता, महज समय की बर्बादी है। यही कारण है कि अच्छे निवेशक पूरी मेहनत करते हैं।
एक और बैसाखी, जिसका हमारे देश में खूब सहारा लिया जाता है, वह है 'ताल्लुकात'। ज्यादातर लोग यही सोचते हैं कि अगर उन्हें अपने जीवन में कोई सही गॉडफादर मिला होता, जो उनकी पूरी देखभाल करता, तो वे कुछ भी हासिल सकते थे। भले ही हम इस बात पर कितना ही यकीन करें, लेकिन सच्चाई इसके उलट है।
आधुनिक भारत में कुछ ही सफलगाथाएं ऐसी हैं, जिनका गॉडफादर्स से कुछ लेना-देना रहा है। सिर्फ राजनीति और व्यापार जगत को छोड़कर, जहां यह परंपरा है कि परिवार के भीतर से ही किसी उत्तराधिकारी को तैयार किया जाए। इसलिए इसमें सेंध लगाना बहुत मुश्किल है।
इससे कहीं ज्यादा आसान तो यह है कि हम बाहर निकलें और खुद अपनी राह तैयार करें। खुद को संवारें। यदि एक बार आपने अपनी यह काबिलियत जाहिर कर दी कि आप अपने वादों पर खरे उतर सकते हैं, तो फिर आपके अमीर अंकल हमेशा आपके पास आएंगे। लेकिन अगर आप इस उम्मीद में उनके इर्द-गिर्द डोलते रहते हैं कि वे आपको पहला मौका देंगे, तो यकीन मानिए कि वे जल्द ही आपको टालना शुरू कर देंगे।
तीसरी बैसाखी है 'किस्मत'। हमें इस पर इतना अधिक यकीन है कि हम अपने जीवन के बेहतरीन साल ऐसे लोगों के पीछे भागने में लगा देते हैं, जो यह ढोंग करते हैं कि वे हमारे भविष्य को पढ़ सकते हैं। हमारे यहां भविष्य बतलाने का कारोबार विशाल रूप ले चुका है।
आपको जहां-तहां ऐसे कई ढोंगी बाबा मिल जाएंगे, जो यह बताते हुए अपनी जेबें भरने में लगे रहते हैं कि हमें किस तरह अपना जीवन जीना चाहिए, कौन-से रंग का पत्थर (नग) पहनना चाहिए, कौन-से भगवान की पूजा-अर्चना करनी चाहिए और किन दिनों में हमें उपवास रखना चाहिए।
जो व्यक्ति किसी खास देवता को प्रसन्न करने के लिए हफ्ते में पांच दिन शुद्ध शाकाहारी भोजन करता है, वही शख्स किसी और अवसर पर किसी अन्य भगवान को खुश करने के लिए निरीह जानवर का वध करने के लिए भी तैयार रहता है। हम अपने दिल की बात सुनने की बजाय दूसरों की राय पर चलते हैं, जो हमें बताते हैं कि हमें क्या करना चाहिए।
हम स्वयं के समाधानों के माध्यम से सोचने के लिए तैयार नहीं हैं। हमें बिचौलियों की जरूरत होती है, जो हमें यह सलाह दे सकें कि हम कैसे रहें, कैसे निवेश करें, कैसे अपने भाग्य का दीपक जलाएं।
मजे की बात तो यह है कि लोग जैसे-जैसे अमीर होते हैं, वे फर्जी बाबाओं और उल्टी-सीधी भविष्यवाणियां करने वाले लोगों पर और भी ज्यादा निर्भर होते जाते हैं।
चौथी बैसाखी अपेक्षाकृत नए किस्म की है। यह बैसाखी है- 'टेक्नोलॉजी'। हमने अचानक टेक्नोलॉजी को हर चीज का इलाज समझ लिया है। डॉक्टर यह भूल गए हैं कि कैसे रोग की पहचान की जाए। लिहाजा हमें तरह-तरह के बेतुके टेस्ट्स करवाने पड़ते हैं। रोबोटिक सर्जरी आज इंसानी दक्षता और प्रतिभा की जगह ले रही है।
टेक्नोलॉजी के बगैर आप अच्छी फिल्म नहीं बना सकते। ३डी मूवी पर जाएं और स्पेशल इफेक्ट्स तथा दृश्यात्मक जादूगरी से हर किसी को अचंभित कर दें। 25 करोड़ डॉलर के बजट की मांग करें, भले ही दुनिया की महानतम फिल्में बहुत कम बजट में बनी हों(सत्यजीत राय की 'पाथेर पांचाली' महज 1,50,000 रुपए में और वित्तोरियो डे सिका की 'द बाइसिकिल थीफ' 1,33,000 डॉलर में बनी थी।)
हम इतने नाकारा हो गए हैं कि अब पोर्न में भी कल्पनाशीलता नहीं दिखा पाते। यही वजह है कि अब 'प्लेबॉय' के हघ हेफनर अपने सेंटरस्प्रेड पेज पर लड़कियों को सेक्सी दिखाने के लिए ३डी तकनीक का इस्तेमाल करते हैं, जबकि एक समय था जब पूरे कपड़ों में ढंकी ग्रेटा गार्बो जैसी अभिनेत्री को देख दुनियाभर के लोग दीवाने हो जाया करते थे।
हम अक्सर यह भूल जाते हैं कि टेक्नोलॉजी का उद्देश्य इंसान की प्रतिभा और कल्पनाशीलता को प्रतिस्थापित करना नहीं, बल्कि उसे सहारा देना है। हमें शेक्सपीयर की तरह लिखने के लिए किसी कंप्यूटर की जरूरत नहीं है। इसके बजाय हमें शेक्सपीयर जैसे नए लोग तैयार करने की जरूरत है।
हमारा भविष्य ऐसी तकनीक में निहित है जो हमारी दक्षताओं को सहारा दे, न कि इनकी जगह खुद काबिज हो जाए। फिल्मों का भविष्य 'अवतार' नहीं है।
मार्ज सिंपसन जैसा कार्टून किरदार भले ही 'प्लेबॉय' पत्रिका के सेंटरस्प्रेड पर आ जाए, लेकिन वह सेक्सुअलिटी का भविष्य नहीं है। क्या आपने कभी मधुबाला को बारिश में भीगे देखा है? अब कोशिश करें। सेक्सुअलिटी की अविस्मरणीय ताकत को पुन: खोजें।






