चाहें तो इसे संघर्ष कह लें, या टकराव, या फिर इसे विकास की द्वंद्वात्मकता कहकर पुकारें। शायद सच यही है कि दुनिया संघर्षो और टकरावों के सहारे ही आगे बढ़ती है। हम शांति और स्थायित्व के बारे में चाहे जितनी बातें कर लें, लेकिन निरंतरता बड़ी क्रूर होती है। जो भी चीज बदलाव लाती है और नए विचारों, नए बाजारों, नए अवसरों का पथ प्रशस्त करती है, वह हमेशा संघर्षपरक और द्वंद्वात्मक ही होती है। इसी से यथास्थिति भंग होती है और परिवर्तन की लय विकसित होती है। इसी प्रक्रिया में दुनिया परिवर्तन के रास्ते पर आगे बढ़ी चली जाती है।
हर बार जब कोई व्यक्ति, ब्रांड या संस्थान सवालों के दायरे में आता है या चुनौतियों का सामना करता है तो हम समझ सकते हैं कि दुनिया बदल रही है। इसी से हमारी सोच में ताजगी रहती है। इसका एक क्लासिक उदाहरण है पेप्सी और कोक। जब पेप्सी ने कोक को चुनौती दी, तभी हम सभी ने पहली बार एक झागदार शीतल पेय पदार्थ की मांग के अद्भुत लचीलेपन को पहचाना था।
जब पेंटहाउस ने प्लेबॉय को चुनौती दी तो इसके फलस्वरूप एक छोटा-सा हाशिये का व्यवसाय दुनिया के सबसे बड़े उद्योगों में से एक बन गया। हाल ही का एक उदाहरण लें। जब मुकेश और अनिल अंबानी के बीच मनमुटाव हुआ तो ऐसा लगा कि यह एक आत्महंता कदम है और विशालकाय अंबानी साम्राज्य के पतन के बारे में शोककथन लिखे जाने लगे, लेकिन दो साल बाद ही हमने पाया कि हुआ इससे ठीक विपरीत।
इस विवाद के कारण उनकी कुल संपदा बढ़कर चौगुनी हो गई। इसी तरह, अगर कोई एक चीज हमारी मरणासन्न राजनीति को पुनर्जीवित कर सकती है तो वह अन्ना हजारे का आक्रामक आंदोलन ही है, जिसने एक आलस्यपूर्ण और भ्रष्ट सरकार को अपने उत्तरदायित्वों के प्रति सचेत कर दिया है। साथ ही उसने इतने ही आलस्यपूर्ण और भ्रष्ट विपक्ष को भी जगा दिया है।
यदि टकराव ही बदलावों के उत्प्रेरक हैं तो हम बार-बार सामंजस्य, समझौते, संघर्षो से मुक्ति के महत्व पर जोर क्यों देते हैं? हर आध्यात्मिक गुरु इसी बारे में बात करता है। राजनेता भी यही भाषा बोलते हैं। यहां तक कि कारोबारी भी कहते हैं कि दुनिया के विकास और समृद्धि के लिए स्थायित्व ही एकमात्र रास्ता है। यदि स्थायित्व चला गया तो बाजार ध्वस्त हो जाएगा और बाजार के साथ ही संसार भी समाप्त हो जाएगा।
वास्तव में सच इससे उलट है। संघर्ष और टकराव चाहे कितने ही रक्तरंजित और अनुचित जान पड़ें, लेकिन वे व्यवसाय, राजनीति और अक्सर मानवाधिकारों के लिए भी अच्छे होते हैं। यथास्थिति कमोबेश शोषण, भ्रष्टाचार और अनुचित की निरंतरता का प्रतिनिधित्व करती है। वह स्वतंत्र विचार के अभाव का भी प्रतिनिधित्व करती है। यदि दुनिया में संघर्ष न होते, तो वह अभी तक सड़ चुकी होती।
महान धर्मो का उदय संघर्षो से हुआ है। हर संप्रदाय और उपसंप्रदाय को अपने उद्भव के समय टकरावों का सामना करना पड़ा है। इसलिए भले ही धर्म हिंसा का परित्याग करने की बात कहते हों, लेकिन सच्चाई यही है कि उनके साम्राज्य का विस्तार हिंसा के आधार पर हुआ है। उदार नेता हमारे दिलों में राज करते हैं, लेकिन वे हमारे द्वारा निर्मित उस दुनिया में अब बिल्कुल प्रासंगिक नहीं रह गए हैं, जहां केवल बैर और बखेड़े से ही आगे बढ़ा जा सकता है। यदि ओसामा का कोई अस्तित्व नहीं होता, तो हमने एक ओसामा रच लिया होता (या शायद उसे हमने ही रचा था)।
गोडसे ने गांधी की हत्या की और उनका संदेश अमर हो गया। नहीं तो संभव है कि हमीं ने उन्हें भुला दिया होता। ठीक उसी तरह, जैसे दुनिया ने मिखाइल गोर्बाचेव को भुला दिया है। हम इतिहास में उन क्षणों का सर्वाधिक उत्सव मनाते हैं, जो रक्त से सने हुए होते हैं। जो हिंसा और आक्रोश से भरे पड़े होते हैं। हमारी राष्ट्रीय पहचान युद्धों से ही तय होती है, क्योंकि दुनिया का नक्शा लगातार बदलता जा रहा है। साम्राज्य सिकुड़ रहे हैं। नए देश जन्म ले रहे हैं। संघर्ष के नए-नए उपकरणों की ईजाद की जा रही है। ये उपकरण ही बदलाव के एजेंट हैं, वाहक हैं।
इसीलिए जब कपिल सिब्बल सोशल नेटवर्किग साइट्स के विरुद्ध रुख अख्तियार करते हैं, तब वे ठीक वही कर रहे होते हैं, जो हर सरकार करना चाहती है : यथास्थिति को यथावत रखना। क्योंकि यथास्थिति में ही उनके सत्ता में बने रहने की संभावनाएं जीवित हैं। इसीलिए हर सत्तारूढ़ दल अपने दूसरे चुनाव अभियान का प्रारंभ स्थायित्व के वादे के साथ करता है। यह इस मिथक का परिणाम है कि जो मौजूदा है, उपस्थित है, वही संपूर्ण है। उससे श्रेष्ठ और कुछ नहीं। जो भविष्य के गर्भ में है, आने वाला कल है, वह खतरनाक साबित हो सकता है।
लेकिन दुनिया का अस्तित्व इसीलिए है कि वह खतरों के साथ खेलती है। संघर्ष से ही बाजार चलते हैं, नए अवसर निर्मित होते हैं, सामाजिक ढांचे पुनर्परिभाषित होते हैं। संघर्ष हमें निरंतर परिवर्तन का महत्व समझाते हैं। हमारे समय के दार्शनिक सुनत्सू हमें यही सिखाते हैं कि हमें संघर्षो से दूर नहीं भागना चाहिए, बल्कि कुशलतापूर्वक उन पर विजय प्राप्त करनी चाहिए और उनका उपयोग अपने जीवन में बदलाव लाने के लिए करना चाहिए।
श्रीमद्भगवद्गीता भी हमें यही सिखाती है कि सभी संघर्षो का सामना करना और उन पर विजय प्राप्त करने का प्रयास करना ही हमारा नैतिक दायित्व है, हमारा कर्म है। इन अर्थो में, गीता हमारे अतिरेकपूर्ण समय में निश्चित ही एक युगांतरकारी ग्रंथ है। वह रक्तपात और हिंसा के युग में अपना अस्तित्व बचाए रखने की एक दुर्लभ और अद्वितीय नियम पुस्तिका है। गीता पर प्रतिबंध लगाने की बात करना तो निश्चित ही मूर्खतापूर्ण होगा, इससे कहीं बेहतर होगा उससे अपने लिए कुछ सीखने का प्रयास करना। -लेखक वरिष्ठ पत्रकार और फिल्मकार हैं।