राजा ने फकीर से जाना त्याग का महत्व
Bhaskar News
| Jan 04, 2013, 00:58AM IST
सदियों पहले एक राजा था, जो बहुत अभिमानी था। वह एक विशाल राज्य का अधिपति था। उसका खजाना धन से भरा था। उसके पास स्वर्ण निर्मित महल थे और एकबहुत बड़ी सेना थी।
नौकर-चाकर सदैव उसकी सेवा में तैनात रहते और चापलूस सभासद उसके घमंड को हवा देते रहते। एक दिन राजा के दरबार में एक फकीर आया। उसका चेहरा तेजस्वी था और आंखों में प्रेम भरा था। वह राजा को देखते ही समझ गया कि राजा अपनी शक्ति के घमंड में चूर है और उसके मन की आंखें बंद हैं। राजा ने अभिमानी स्वर में फकीर से पूछा- 'फकीर! तुझे क्या चाहिए?' फकीर बोला- 'राजन! मैं आपसे कुछ लेने नहीं, बल्कि आपको कुछ देने आया हूं।
राजा का अभिमान यह सुनकर आहत हुआ। उसने चिल्लाकर कहा- 'तुम्हें छोटे मुंह बड़ी बात करते शर्म नहीं आती? जिसके पास फूटी कौड़ी नहीं, वह किसी को क्या देगा? फकीर हंसकर बोला- 'अकिंचन के पास भी कुछ होता है, जो दुनिया की माया से अधिक महत्व रखता है। राजा ने उसे बकवास बंद करने को कहा तो वह बड़े स्नेह से बोला- 'राजन! बिना त्याग के भोग बेस्वाद है। वैभव में जब त्याग जुड़ जाता है, तो वह आदरणीय व प्रशंसनीय हो जाता है। त्याग के आते ही अहंकार मिट जाता है। आसक्ति दूर हो जाती है और भीतर की आंखें खुल जाती हैं।ञ्ज फकीर के शब्दों ने राजा की आंखें खोल दीं और वह निरभिमानी हो गया।
सार यह है कि भोग यदि अहंकार से परे रहकर निरासक्त भाव से किया जाए, तो वह निंदनीय नहीं होता।






