भारतीय अफसरों की अकुशलता इतनी बदनाम है कि हाल में हांगकांग की एक कंसल्टैंसी एजेंसी ने एशियाई देशों की सूची तैयार की, तो उसमें भारतीय नौकरशाही सबसे निचले पायदान पर आई। इसीलिए नौकरशाहों पर नकेल कसना जरूरी माना जा रहा है। हाल में सिविल सोसायटी के आंदोलन में उठी सिटीजंस चार्टर की मांग भी इसी से जुड़ा एक पहलू है।
बहरहाल, बनते जन दबाव के बीच सरकार कुछ अन्य कदम भी उठा रही है, जिनमें यह नया नियम है कि अब आईएएस, आईपीएस, आईआरएस तथा अन्य उच्च सेवाओं के अधिकारियों को नौकरी के बीच में ही रिटायर कराया जा सकेगा। 15 और 25 साल की नौकरी पर उनके कामकाज की समीक्षा होगी, लेकिन शिकायत मिलने पर ऐसी समीक्षा कभी भी कराई जा सकेगी। जिस अफसर को अकुशल पाया गया, उसे तीन महीने का नोटिस देकर तुरंत सेवानिवृत्त करा दिया जाएगा। यह कदम दूसरे प्रशासनिक सुधार आयोग की सिफारिश के मुताबिक है।
खबर है कि राय-मशविरे में राज्य सरकारों ने इस पर उत्साहभरी प्रतिक्रिया दिखाई। तो यह आशा की जा सकती है कि ऐसे नियम जल्द ही राज्यों में भी लागू होंगे। मगर क्या इससे नौकरशाही से जुड़ी तमाम शिकायतें हल हो जाएंगी? एक बड़ी समस्या अफसरों के कामकाज में राजनेताओं के बेजा दखल की है। नौकरशाहों को तभी पूरा जवाबदेह बनाया जा सकता है, जब उन्हें तय दायरे में काम करने की आवश्यक स्वतंत्रता भी मिले। नए नियम कहीं असुविधाजनक अफसरों को ठिकाने लगाने और तमाम नौकरशाही में खौफ पैदा करने का जरिया न बन जाएं, यह एक वाजिब अंदेशा है।
दूसरी आशंका यह है कि ये नियम सरकार के केस-मुकदमों में उलझने का एक जरिया बनेंगे, क्योंकि जिन अफसरों पर गाज गिरेगी, वे अदालत की पनाह ले सकते हैं। सरकार ने अगर इन पहलुओं पर कोई एहतियाती सोच बनाई है, तो उसे सार्वजनिक किया जाना चाहिए। यह जरूरी है कि नौकरशाही कानून के नियंत्रण में रहे। लेकिन ऐसा करने की आड़ में उस पर राजनीतिक शिकंजा और न कस जाए, यह भी सुनिश्चित करना होगा।