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क्रिकेट के कमाऊ मौसम में इनामों की फसल
एम. जे. अकबर
| Apr 22, 2012, 00:04AM IST

अपने मस्तिष्क में किसी क्षण कौंधी बिजली के बाद इंडियन प्रीमियर लीग का आविष्कार करने वाले जीनियस ललित मोदी ने अगर इसे अमलीजामा पहनाने के दस साल पहले सरपरस्त पा लिया होता, तो वे बड़ी आसानी से नाकामयाब हो गए होते। यदि आइर्पीएल सिर्फ क्रिकेट ही होता, तो फिर यह अपने वर्तमान मौलिक स्वरूप की बजाय इस विधा का एक फीका विस्तार ही होता। यह इतना दर्शनीय इसलिए है, क्योंकि यह लचीली नैतिकता और नए, युवा व सफल भारत की मनोरंजन की जरूरतों के जरिए खेल और तमाशबीन को गूंथ देता है।
यह तर्क दिया सकता है कि आप सामाजिक सुधार के बिना आर्थिक सुधार का लक्ष्य नहीं पा सकते या शायद आर्थिक सुधारों के बगैर सामाजिक सुधार। किसी भी मामले में भारत के पास दोनों ही हैं। आईपीएल ने ‘सिक्स’ को ‘सेक्सुअल सिहरन’ से बांध दिया।
बिकिनी पैंट पहने चियरलीडर्स डांस के कामचलाऊ बहाने की आड़ में अपने अंग मटकाती हैं और मैच के बाद होने वाली मादकता भरी पार्टियों की कहानियां आती हैं- ये चीजें संपूर्ण अनुभव के लिए वैसी ही अनिवार्य हैं, जैसे 22 खिलाड़ियों का प्रतियोगिता से गहरा जुड़ाव।
कभी खेल को अन्य अर्थो में युद्ध कहा गया था। आईपीएल अन्य अर्थो में ‘बात एक रात की’ है। किसी को वाकई इस बात की परवाह नहीं होती कि कौन जीतता है या कौन हारता है। हर किसी को रोमांच और आखिरी ओवर में आदर्श रूप से चरम पर पहुंचने से ही वास्ता होता है। जैसा कि सहवास में होता है, दोनों ही पक्ष जीतते हैं।
जनसमूह का मनोरंजन वास्तव में वैयक्तिक संवेदनशीलता का कुल जोड़ ही है। अन्य उभारों की तरह, भारतीय यौन क्रांति दो दशक पहले से सतह के नीचे सुलग रही है। मुंबई की अगुवाई वाला व्यावसायिक सिनेमा टिकटों की बिक्री के जरिए जीवित रहता है और इसीलिए इसे बदलाव के उभार को पहचानना पड़ता है और फिर फलने-फूलने के लिए उसे आगे बढ़ने में मदद करनी पड़ती
है।
सामान्य-सी बात है कि यह पहला आईना था। करियर का आरंभ छठे दशक की स्कर्ट और अंत नवें दशक की चुस्त-अर्धदर्शना पोशाकों से करने वाली आइकॉनिक फिल्म डांसर हेलन भुला दिए गए दौर से नाता रखती हैं। आज के आइटम नंबर न तो शरीर छोड़ते हैं, न ही कल्पना की संभावनाएं।
और कल्पना सहवास की सर्वसामान्य मुद्रा से परे, लंबा सफर तय कर चुकी है। माहौल से जुड़े सबूत के लिए आपको बस सेक्स स्कैंडलों के वर्णन ही हासिल करने हैं, जो कसकर सुरक्षित रखे गए राजनीतिक वर्ग से भी खबरों तक निकल ही आते हैं।
समकालीन भारतीय कैंपस तो एक सर्वथा अलग ही कहानी है।
सिनेमा सीमित था, इसका बड़ा कारण था सिनेमाहॉल की जगह का सीमाबद्ध होना और सामाजिक सेंसरशिप का संभव होना। यह सेंसरशिप रेटिंग सिस्टम के साथ ही एक और स्पष्ट विकल्प के तहत संभव थी, यानी आप टिकट खरीदने के लिए मजबूर नहीं हैं।
टेलीविजन, खासतौर पर आइटम गीतों से लदे पड़े म्यूजिक चैनलों ने इस क्रांति को ड्राइंगरूम की चीज/घटना में बदल दिया है। प्रिंट माध्यम ने अनिवार्यत: इसका अनुसरण किया। बाजार का दबाव बहुत ज्यादा प्रबल था।
नई नैतिकता ने धर्म को भी नहीं छोड़ा है। अब हम परमसत्ता से गुहार लगाते गाने (ओ दुनिया के रखवाले, सुन दर्द भरी मेरी नालें) या ऊपरवाले को चुनौती देते गाने (भगवान कभी दो घड़ी इनसान बनके देख, धरती पे चार दिन कभी मेहमान बनके देख) नहीं सुन सकते।
लेकिन धार्मिक ग्रंथों की कहानियां अब भी परदे पर हावी हैं और आस्था से प्रेरित कव्वाली हमेशा की तरह लोकप्रिय। धर्म का आकर्षण निरंतर असांप्रदायिक होने की ओर बढ़ रहा है। परंतु नैतिकता अब महज मध्यवर्गीय सद्गुण नहीं रही।
इसकी व्यापक भूमिका शासन में जवाबदेही की ओर खिसक चुकी है। भ्रष्टाचार के खिलाफ जनरोष अपनी कहानी खुद कह देता है और मीडिया को अपने तमाम स्वरूपों में इसे सुर्खी बनाना ही पड़ता है। ‘लाइफस्टाइल’ भी साथ-साथ चल सकती है, लेकिन अंदर के पृष्ठों पर।
ललित मोदी की किस्मत रनआउट हो गई, क्योंकि वे भूल गए थे कि अब सार्वजनिक जीवन में वित्तीय पारदर्शिता ऐसी जरूरत है, जिस पर कोई मोलतोल नहीं हो सकता। बहरहाल, उनके आईपीएल ने जो असर छोड़ा है, हमें उसे भी मान्यता देनी पड़ेगी।
इसके पूरक लाभ तो विस्मयकारी रहे हैं। मेरी पक्की धारणा है कि आईपीएल ने वेस्टइंडीज में क्रिकेट को पुनर्जीवित किया है। अब गुणवत्ता और प्रतिभा के लिए अभूतपूर्व आर्थिक पुरस्कार हैं। अगर सर गारफील्ड सोबर्स आज खेल रहे होते, तो सचिन तेंदुलकर की तरह अमीर होते। और यह ठीक भी है, क्योंकि नाइट की उपाधि तो अच्छी है, लेकिन यह एक सीमा से आगे बिलों का भुगतान नहीं करती। निश्चित तौर पर, वेस्टइंडीज के बच्चों की पीढ़ी क्रिस गेल बनने के स्वप्न देख रही होगी।
क्या आप उस भारी भीड़ की कल्पना कर सकते हैं, जो विवियन रिचर्डस को खेलता देखने के लिए आती? बल्लेबाजी, गेंदबाजी और क्षेत्ररक्षण की तकनीकें बेहतरी के लिए विलक्षण रूप से बदल चुकी हैं। चूंकि बाजार कीमत देता है, इसलिए कैच का छूटना महज गेंद का गिरना ही नहीं होता, बल्कि इसका मतलब अपने बैंक बैलेंस को भी गिरने देना होता है। और हैरानी नहीं कि गिने-चुने कैच ही छूटते हैं।
आईपीएल ने भारतीय क्रिकेट को चयनकर्ता नामक गुप्त समुदाय के किले से मुक्ति दिलाई है। लाइमलाइट में चमकने वाले और गुमनामी में छुपे रहने वाले क्रिकेटरों के बीच कभी इतनी रोशनी नहीं थी। आज, जनता मैदान में कल की प्रतिभाओं को देखती है और उपलब्ध विकल्पों को जानती है।
हो सकता है कि चयन में पूर्वग्रह अब भी संभव हो, लेकिन अब यह आसान नहीं रह गया है। आईपीएल अब क्रिकेट के सालभर चलने वाले मौसमों का हिस्सा है। हर मौसम बराबर नहीं होता, लेकिन हम मौज-मस्ती के साथ फसल का जश्न मनाते हैं। आईपीएल इनामों की फसल है। -लेखक द संडे गार्जियन के संपादक और इंडिया टुडे के एडिटोरियल डायरेक्टर हैं।





